मलिक असगर हाशमी
‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया।’ यह शीर्षक है एक उर्दू अखबार के संपादकीय का। उसे लगता है लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट से ऐसी कोई चौंकाने वाली बात सामने नहीं आई, जिसे लोग पहले से न जानते रहे हों। साजिश किसने रची, किसने आंदोलन का रूप दिया, किसने कारसेवकों को बरगलाया, किसने उनकी पीठ ठोकी, किसने खुशियां मनाईं, किसने संविधान और कानून की पीठ में छुरा घोंपा। सबको सब पता है। गवाहों से कहीं ज्यादा चश्मदीद हैं।
आठ करोड़ रुपये खर्च कर 17 साल में नौ सौ पेज की रिपोर्ट तैयार करना। समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं। अखबार कहते हैं। रिपोर्ट की सिर्फ दो बातें थोड़ी चौंकाने वाली लगीं। एक, बाबरी मस्जिद ढाने के 68 आरोपियों की सूची में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम शामिल होना। दूसरा, तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को क्लीन चिट देना।
एक अंग्रेजी अखबार में कमीशन की रिपोर्ट लीक होने के बहाने उर्दू मीडिया जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान की नियत पर भी सवाल उठा रहे हैं। अखबार कहते हैं। नरसिंह राव को क्लीन चिट देने का क्या मतलब निकाला जाए? ‘जदीद खबर’ ने ‘नरसिंह राव क्यों नहीं?’ में बाबरी मस्जिद की शहादत के विरोध में राव मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने वाले एमएल फोतेदार के हवाले से कहता है- मस्जिद ढाने की खबर मिलने पर वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा से मिलने राष्ट्रपति भवन गए।
उन्हें देखते ही राष्ट्रपति बच्चों की मानिंद रोने लगे। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के कहने पर कि यूपी के गवर्नर को रिपोर्ट देने को कहा है। वहां के राज्यपाल वी. सत्यनारायण रेड्डी को दिल्ली तलब किया तो पता चला। उन्हें ऐसी कोई हिदायत दी ही नहीं दी गई। यहां तक कि दोपहर में कारसेवकों के मस्जिद ढहाने की शुरुआतकरने पर मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने गवर्नर को इस्तीफा भेज दिया। लेकिन राव ने उन्हें इस्तीफा शाम से पहले मंजूर न करने के निर्देश दिए।
जस्टिस लिब्रहान का राव के बचाव में तर्क है कि प्रधानमंत्री सीधे प्रदेश सरकार के काम में दखल नहीं दे सकते। इसका पालन करने की खातिर राव ने तत्कालीन राज्यपाल को रिपोर्ट भेजने की हिदायत दी थी। उर्दू अखबारों को अफसोस है कि सदन में कमीशन की रिपोर्ट रखने के साथ ही देश में फिर बाबरी मस्जिद की सियासत शुरू हो गई। सपा महासचिव अमर सिंह का राज्यसभा में ‘या अली’ का नारा बुलंद करना, शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे का गर्व के साथ मस्जिद ढाने की जिम्मेदारी लेना और कल्याण का ‘सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा उछालना इसी रणनीति की कड़ी है।
‘सियासत’, ‘मरकजी हुकूमत और एटीआर’ में कहता है कि कांग्रेस भी लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट के सहारे यूपी में सियासी खेल खेलना चाहती है। मायावती के भी बयान आ रहे हैं, ‘लिब्रहान रिपोर्ट पर लीपापोती कर रही है मरकजी हुकूमत।’ एक्शन टेकन रिपोर्ट में किसी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश न करने से उर्दू अखबार और मुस्लिम वर्ग बेहद नाराज है। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के केंद्र सरकार के लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट की जांच पुलिस अथवा सीबीआई से कराने का भरोसा दिलाने पर भी उन्हें इस पर यकीन नहीं हो रहा।
‘ मनसूबाबंद साजिश’, ‘लिब्रहान कमीशन रिपोर्ट’, ‘फिर वही खेल’, ‘मरकजी हुकूमत और एटीआर’, ‘लिब्रहान रिपोर्ट मुसलमानों के साथ धोखा’, ‘बाबरी मस्जिद और हमारे सियासतदां’ वगैर शीर्ष से छपे लेख और संपादकीय का लब्बोलुबाब है। मस्जिद ढाने के सारे आरोपी बच जाएंगे। कमीशन और एक्शन टेकन रिपोर्ट आने तक उनमें भय बना हुआ था। इसके आने पर उनके मन से वह भी जाता रहा। सांप्रदायिक ताकतों के हौंसले फिर से बुलंद होने लग जाएंगे। ‘हमारा समाज’ बिहार मुंगेर के खानकाह और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव मौलाना वली रहमानी के हवाले से कहता है। दोषियों को सजा नहीं मिली तो कानून और इंसाफ से ऐतमाद उठ जाएगा।
एक अन्य अखबार कहता है कि कार्रवाई नहीं होने पर मुसलमान समझोंगे, देश में उनकी कोई औकात नहीं। उर्दू अखबार कमीशन की रिपोर्ट के बहाने मुलायम, अमर और कल्याण सिंह पर भी निशाना साध रहे हैं। अखबारों का कहना है कि कल्याण की हकीकत जानते हुए भी सपा नेताओं ने सियासी फायदे के लिए आजम खान को उन पर कुर्बान कर दिया। वैसे ‘इंकलाब’ जैसे कुछ अखबार भी हैं। जिन्हें लगता है। लिब्रहान कमीशन ने वाजपेयी सहित बाबरी कांड के सभी आरोपियों को बेनकाब कर बड़े हौसले का काम किया है। ‘जिंदाबाद लिब्रहान’ में अखबार कहता है। अब तक उनके नाम ही आते रहे, कोई दस्तावेजी सबूत नहीं थे। इस रिपोर्ट की मदद से अब इंसाफ के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
(लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं)

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