बौना हूं मैं , कोई खिलौना नहीं
चलता हूं जब भी मैं सड़कों पे, तो नज़रे खुद-ब-खुद झुक जाती हैं,
जब उठती है, तो देखता हूं की इंसान की नज़रें किस तरह से सताती है,
भूल जाते हैं वो कि
बौना हूं मैं, कोई खिलौना नहीं !
हंसते हैं वे मुझपे, जैसे मैं कोई एक नुमाइश हूं ,
याद दिलाओ उन्हें, कि मैं भी खुदा की पैदाइश हूं ,
कभी नाटा-नाटा,तो कभी बौना-बौना कह कर चिड़ाते हैं,
भूल जाते हैं वो कि
बौना हूं मैं, कोई खिलौना नहीं !!
शुक्र है, क्योंकि इस नाम पे ही तो मैं अपनी ज़िन्दगी बिताता हूं ,
हंसाता हूं उन्हें सर्कस मैं, और बौना-बौना कहलाता हूं ,
दो वक़्त की रोटी मिल जाती है, पर ज़िन्दगी तडपाती है
फ़रियाद करता हूं ,खुदा से और बोलता हूं उस इंसान से
कि क्यों भूल जाता है तू कि
बौना हूं मैं कोई खिलौना नहीं !!
-अमित तनेजा
मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की
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*फ़िरदौस ख़ान*
भौतिकवादी संस्कृति ने जहां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है,
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