सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है
दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंडे
पत्थर की तरह बे-हिस-व-बेजान-सा क्यूं है
तन्हाई की यह कौन-सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता हददे-नज़र एक बयाबान-सा क्यूं है
हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की
वह ज़ूद-ए-पशीमान, पशीमान-सा क्यूं है
-शहरयार
तन्हाई का मौसम...
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जब
ज़िन्दगी की वादियों में
तन्हाई का मौसम हो
और
अरमान
पलाश से दहकते हों...
तब
निगाहें
तुम्हें तलाशती हैं...
जबकि
दिल जानता है
तुम कभी नहीं आओगे...
*-फ़िरदौस ख़...

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