मीनाक्षी अरोरा
विकसित देशों को दोगुने कार्बन उत्सर्जन की छूट देने, कार्बन उत्सर्जन की कोई समयसीमा न बनाने के साथ ही कई मामलों में भेदभाव वाले डेनमार्क मसौदे ने पूरी जलवायु वार्ता की गर्मी को ठंडा कर दिया है। कोपेनहेगेन कॉन्फ्रेंस के दो-तीन दिन बाद ही अचानक षड्यंत्रों और रहस्यों से पर्दे उठने से अब ऐसा वातावरण बन गया है जिसमें कोई नतीजा निकलना दूर की कौड़ी नजर आ रही है।

जी-77 और चीन के गुट में 130 देश शामिल हैं जो भौगोलिक, विकास और जनसंख्या की दृष्टि से भिन्न हैं। इसमें ओपेक, द्वीपीय देश, अफीकी संघ और चीन, भारत और ब्राजील जैसी उभरती शक्तियां शामिल हैं।

ओपेक देशों की रुचि आधुनिक ऊर्जा के वर्तमान महत्व को बनाए रखने में है। इसलिए उन सभी ने 2 फीसदी तक की सीमा तय किए जाने का विरोध किया। उधर चीन के भी एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने चेतावनी देते हुए कहा कि चीन के विकासात्मक कार्यों के लिए 2 फीसदी की सीमा उचित नहीं है। संस्थान के उपप्रमुख दाई यांदे ने कहा, चीन को 2 डिग्री का लक्ष्य पूरा करने के लिए नहीं कहा जाना चाहिए, यह तो एक विजन है, असलियत वास्विकता से दूर है।

2 डिग्री का लक्ष्य क्यों
बीबीसी के अनुसार धरती के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा की वृद्धि नहीं हो, इसके लिए ज़रूरी है कि वातावरण में कार्बन की मात्रा में 250 अरब टन या 2.5 लाख मेगाटन से ज़्यादा की वृद्धि नहीं हो। 2.5 लाख मेगाटन कार्बन क़रीब 9 लाख मेगाटन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर होगा। वैज्ञानिकों ने अलग-अलग ढंग से गणना करके ये निष्कर्ष निकाला है कि वातावरण में कार्बन की मात्रा को 7.5 लाख मेगाटन तक सीमित रखा जाए तो इस बात की 75 प्रतिशत संभावना है कि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस के दायरे में समेटा जा सकेगा। इस 7.5 लाख मेगाटन कार्बन में से 5 लाख मेगाटन कार्बन मानवीय गतिविधियों, मुख्यत: जैव ईंधन को जलाने और जंगलों को काटने के कारण, पहले ही वायुमंडल में प्रवेश कर चुका है। यानि गुंजाइश सिर्फ़ 2.5 लाख मेगाटन अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन की रह जाती है. इसके लिए ज़रूरी है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी की जाए, जंगलों की कटाई कम की जाए और ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए।

2 डिग्री के लक्ष्य के लिए करना क्या होगा
2 डिग्री का लक्ष्य के लिए हमें कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसदी कटौती करनी होगी, जैसा कि विज्ञान के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए जरूरी है। वरना कई द्वीपों को डूबने से रोका नहीं जा सकता।

बांटो और राज करो यानी बांटो और अपना भोगवाद जारी रखो
विकासशील देशों के बीच उस समय से रोष पैदा हो गया है, जब से डेनमार्क, अमेरीका और ब्रिटेन द्वारा तैयार किया गया मसौदा सामने आया है। जिसमें क्योटो प्रोटोकाल के दौरान विकसित और विकासशील में बंटे देशों में विकासशील देशों में एक और नया गुट वल्नरेबल कंट्रीज का बना दिया गया। डेमनार्क मसौदे के लीक होने के बाद से ही विकासशील देशों के लिए कोपेनहेगेन वार्ता ठंडी पड़ती जा रही है।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जी-77 के प्रमुख सूडान के लूमुंबा स्टानिस्लास डी पिंग ने कहा, "डेनमार्क मसौदा विकासशील देशों के लिए खतरनाक है। इस तरह की वार्ता के लिए यूएनएफसीसीसी ही एकमात्र वैधानिक प्रक्रिया है। पर चूंकि यह मसौदा डेनमार्क के प्रधानमंत्री के ऑफिस से बनकर आया है, इसलिए अब विकासशील देशों की कोपेनहेगेन से जुड़ी सारी उम्मीदें नाउम्मीद हो गई हैं। इसमें सामान्य तौर पर बात न करके विकसित और विकासशील की अलग-अलग भूमिका निर्धारित कर दी गई है। वातावरण को प्रदूषित करने के लिए विकसित देशों के लिए पूर्व में जो दायित्व निश्चित किए गए थे उन सबको नकार दिया गया है। इतना ही नहीं क्योटो प्रोटोकोल को दरकिनार करते हुए अब एक नई संधि की तैयारी हो रही है। यह रहस्यमय मसौदा असल में विकासशील देशों को दो गुटों में बांटने के लिए है जो बहुत खतरनाक स्थिति है। असलियत में यह एक दूसरा साम्राज्यवाद है जो सभी प्राकृतिक संसाधन विकासशील देशों से छीनकर विकसित देशों को सौंप रहा है। यह एक तरह से ब्रेटन वुड्ट प्रक्रिया का ही दूसरा रूप है।"

पिंग ने यह भी स्वीकार किया कि डेनमार्क समझौते की प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही इसके ठीक विपरीत दो मसौदे तैयार किए गए थेः एक तो तथाकथित बेसिक देशों-भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका और दूसरा छोटे महाद्वीपीय देशों द्वारा। उंहोंने कड़े शब्दों में यह भी कहा कि प्रक्रिया के इस अंतिम दौर में जी-77 वार्ता से वॉक आउट नहीं करेगा, क्योंकि हम असफलता बर्दाश्त नहीं करेंगें। जब उनके सामने यह रिपोर्ट रखी गई कि भारत और दूसरे बेसिक देशों को अगर वार्ता स्वीकार नहीं हुई तो वे उस स्थिति में वॉक आउट करने को तैयार हैं, तब पिंग ने बात पर रोशनी डालते हुए कहा कि भारतीयों का ऐसा कहने का मतलब है कि वे ऐसी डील पर हस्ताक्षर नहीं करेंगें। चूंकि अब भारत, चीन और ब्राजील की अर्थव्यवस्था उभर रही है इसलिए वे जी-77 की अपेक्षा सौदेबाजी के लिए अधिक मजबूत स्थिति में हैं।

पिंग ने आगे कहा कि सचिव को जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपना विचार रखना चाहिए। उसे न्यायपूर्ण डील का साथ देना चाहिए न कि किसी एक ग्लोबल पावर का, तभी एक ग्रीन रेवोल्यूशन आ सकती है। संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य विश्व स्तर पर सहयोग और समन्वय बढ़ाना था और यह अमरीका और ओबामा की उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता। अमरीका को इसमें शामिल होना चाहिए और 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में कमीं करने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूं कि "अमरीका ही सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैंसों का उत्सर्जन करता है उसके मात्र 4फीसदी कटौती से अफ्रीका और दूसरे विकासशील देशों को डूबने से बचाया नहीं जा सकता। ओबामा ने जिस डेनमार्क मसौदे का समर्थन किया है वह न्यायपूर्ण नहीं है। इसलिए मेरा नम्र निवेदन है कि ओबामा बहुपक्षीय बातचीत के लिए दरवाजे बंद करने की कोशिश न करें।"

पत्रकारों के पूछने पर कि डेनमार्क के प्रधानमंत्री जलवायु वार्ता से वॉक आउट करने की सोच रहे हैं तो पिंग ने उत्तर दिया कि डेनमार्क के प्रधान मंत्री हर कीमत पर इसे सफल बनाना चाहेंगे। अपने राजनीतिक करियर को बचाने के लिए वह वार्ता को भी विफल कर देंगे। ऐसा करने के बजाय उन्हें संतुलित नजरिये से देखना चाहिए, दुनिया के खत्म होने के बाद डील का क्या मतलब रह जाएगा।

उन्होंने इन शब्दों के साथ अपनी बात खत्म की कि अगर जी-77 अपना मसौदा अलग तैयार कर ले तो कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। कॉन्फ्रेंस को पारदर्शी रूप से कराना ही प्रधान मंत्री का दायित्व होना चाहिए।

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