अतुल मिश्र
मोटापे को लेकर ग़ैर मोटे लोगों में कई तरह की गलतफहमियां हैं, जो किसी भी हालत में दूर नहीं की जा सकतीं! उनका कहना है कि जो बच्चे कम सोते हैं, वे किन्हीं प्राकृतिक वजहों मोटे हो जाते हैं और मरने के बाद उनकी अर्थी को कंधा देने वाले लोग बिना बात के परेशान हो जाते हैं! पतले लोगों के साथ ऐसा नहीं है! उनकी अर्थी आसानी से उठ जाती है और उनके बच्चे भी उसमें को कोओपरेट करते हैं कि उनके मां-बाप को अब तो किसी किस्म की कोई तकलीफ न हो! जो तकलीफें उनके जीते-जी उनकी अपनी वजहों से उन्हें मिल गयी होंगी, उनके लिए भी वे लोग रो-धोकर उनकी अर्थी का वजन से भूल जाते है! वर्ना मोटे मां-बापों की अर्थी को कंधा देने वाले बच्चों की बददुआए लगती हैं और जो उनके स्वर्ग-नरक जाने के रास्ते आड़े आती हैं!

मोटे लोग कई तरह के काम आते हैं! मैंने एक वाकया ऐसा सुना है कि "एक घर में कोई दुबला-पतला चोर घुस गया! मकान-मालकिन मोटी थीं और चोर को दबोचकर उसके ऊपर बैठ गयीं और अपने नौकर से कहा कि "भाग कर पुलिस को बुला ला!" नौकर अपनी चप्पलें ढूंढने लगा! पंद्रह मिनट बाद भी जब चप्पलों ने मिलकर नहीं दिया तो चोर चीख पड़ा कि "ले, मेरी चप्पलें ले जा, लेकिन पुलिस को बुला ला, वरना मेरा दम निकल जाएगा!" आदतन पुलिस के देर से पहुंचने की वजह से उस दुबले-पतले चोर का कचूमर निकल गया! पुलिस ने उसे एनकाउन्टर दिखाकर शाबाशी ले ली!

हमने अपनी विल में यह बात खासतौर पर लिखवा रखी है हमारे मरने के बाद हमारी अर्थी को उठाने का खर्चा हमारी रोज जमा होने वाली रेज़गारी में से ही दिया जाए, ताकि हमारी औलादों को हमारा नब्बे किलो का वजन उठाने में कोई तकलीफ न हो और हम नरक पहुंचकर अपने दोस्तों के साथ एन्जॉय कर सकें! स्वर्ग हम इसलिए नहीं जाना चाहते कि हमें यकीन है कि हमारा कोई दोस्त वहां नहीं होगा और हम बोर होने के अलावा और कुछ नहीं कर पायेंगे!

हमारी वसीयत में एक ख़ास बात और लिखी है कि "हमारे तमाम दोस्तों को हमारी तेरहवीं पर यूं.पी. की जगह दिल्ली की असली कही जाने वाली शराब भोजन के साथ ही पिलवाई जाए, ताकि सनद रहे और आबकारी विभाग के होश दुरुस्त करने के काम आये!" कहने को तो बहुत सारी ख्वाहिशें हमने अपनी वसीयत में दर्ज़ करा रखी हैं, मगर हमारी धर्म वाली पत्नी को पता चल गया तो वह बवाल खड़े कर देगी और हम यह कभी नहीं चाहेंगे कि हमारे मरने से पहले हमें और हमारे शरीर को लेकर कोई बवाल हो!

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