सुरेश नौटियाल
आज पूरे विश्व की निगाह आगामी दिसंबर में संयुक्त राष्ट्र के कोपेनहेगेन सम्मेलन पर टिकी है। इस सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन से जुड़े उन तमाम विषयों पर चर्चा होनी है जिनका संबध संपूर्ण मानवता, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की सुरक्षा, संरक्षण और संवर्धन से है। आज के हालात में जलवायु परिवर्तन गंभीर और संवेदनशील मामला बन गया है इसलिए जलवायु में आ रहे बदलाव को रोकने के लिए तरह-तरह के उपाय जारी हैं।

इस चिंता के बीच इस बहस ने भी जोर पकड़ा है कि औद्योगिक सहित मानवीय गतिविधियों से जलवायु में परिवर्तन नहीं हो रहा है। अर्थात् इसके लिए दूसरे कारण भी जिम्मेदार हैं। लेकिन 'साइन्स' नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में इसी सितंबर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार बर्फ से ढका आर्कटिक क्षेत्र हाल के दशकों में बढ़ी गर्मी के कारण जलवायु परिवर्तन का शिकार हुआ है। अध्ययन के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ने से यह सब हो रहा है। नॉदर्न एरिजोना विश्वविद्यालय में जलवायु विशेषज्ञ और इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक डैरेल कॉफमैन का कहना है कि पहले तापमान बढ़ने की गति धीमी थी पर 1950 के बाद इसमें तेजी आयी। जहां प्रत्येक मिलेनियम (सहस्राब्दि) में आधा डिग्री फॉरेनहाइट से भी कम तापमान बढ़ा, वहीं वर्ष 1900 के बाद से तापमान 2.2 डिग्री बढ़ा है। वर्ष 1998 से लेकर 2008 तक का दशक तो दो हजार वर्षों में सबसे गर्म रहा है। अर्थात ऐसी जलवायु परिवर्तन वाली गतिविधियों के कारण ठेठ ध्रुवीय देशों में भी जलवायु परिवर्तन का असर देखने में आने लगा है। ऐसा होना कुछ वैज्ञानिक प्राकृतिक घटनाक्रम का हिस्सा मानते हैं। यह विचार सच हो तब भी जलवायु परिवर्तन ठीक करने के उपाय करने जरूरी हैं। लेकिन हमारे सामने उपस्थित संकट का समाधान तो तत्काल चाहिए।

औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक धरती का औसत तापमान काफी बढ़ चुका है। यह नि:संदेह ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि के कारण हुआ है। इनमें कटौती न की गयी तो धरती के औसत तापमान में आने वाले समय में बड़ी भारी बढ़ोतरी की आशंका है। यदि यह सच हुआ तो फ्रेंच पोलिनेशिया से लेकर मालदीव तथा श्रीलंका-मॉरीशस जैसे देशों के लिए खतरा और बढ़ जाएगा। इन देशों के बड़े हिस्से समुद्र के नीचे चले जाने से वहां की आबादी का विस्थापन कहीं न कहीं तो होगा ही और उसका पुनर्वास भी करना पड़ेगा। इस मायने में जलवायु परिवर्तन ठीक करना वैश्विक जिम्मेदारी है। और हम इसे नहीं निभा रहे हैं। जंगल साफ हो रहे हैं। पेट्रोलियम जैसे ईंधनों का उपयोग बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ फैक्टरियां काला धुआं उगल रही हैं। वातावरण में लगातार कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ रहा है। इन ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ोतरी के लिए स्पष्ट रूप से धनी और औद्योगिक देश जिम्मेदार हैं। उन्हें आज दुनिया के तमाम वंचित समाजों का कर्ज चुकाना है। धरती की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाकर जितना पर्यावरण चंद देशों ने बिगाड़ा है, उसका पैसे में हिसाब लगाया जाए तो उस पैसे से पूरी धरती याने दुनियाभर के वंचित समाजों की गरीबी दूर की जा सकती है। और ऐसा हो जाए, तब वास्तव में धरती को बचाने की कोशिशें ईमानदारी से फलीभूत हो सकती हैं।

यूएनडीपी की वर्ष 2007-08 की मानव विकास रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन की ओर विशेष ध्यान दिलाया गया है। इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खासतौर पर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सामाजिक उत्थान में गतिरोध पैदा होंगे। भारत के संदर्भ में यह टिप्पणी विशेष महत्व रखती है क्योंकि भारत जैसे विकासशील देश में गरीबी, अशिक्षा, ढांचागत अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य चिकित्सा की बदतर हालत इत्यादि को ठीक करने के लिए धन की जरूरत बढ़ती ही रहेगी। और यदि जलवायु परिवर्तन की मार पड़ती रहेगी तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। इन मानकों पर भारत आज भी 177 देशों में से 128वें पायदान पर है, अर्थात बहुत नीचे। अर्थव्यवस्था की मोटाई देखें तो काफी है पर वस्तुस्थिति बहुत खराब है। यूएनडीपी की इस रिपोर्ट में विश्वविख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने ठीक ही लिखा है कि सही विकास मानव को सही मायने में स्वतंत्रता प्रदान करता है और उसकी चंगाई भी सुनिश्चित करता है। साथ ही विकास की प्रक्रिया पर्यावरणीय और पारिस्थितिक सरोकारों से अभिन्न भी है। मानव विकास की सही परिभाषा तभी फलीभूत होगी यदि साफ हवा-पानी, रोगमुक्त वातावरण और तमाम जीव-जंतुओं का संरक्षण सुनिश्चित हो सके। नीतियों में माकूल बदलाव से ही आम भारतीय का जीवन ठीक किया जा सकता है।

धरती का तापमान बढ़ने से जहां जलवायु परिवर्तन आम आदमी से लेकर वैज्ञानिकों को साफ दिखने लगा है, वहीं यह सच भी अधिक मुखरता से सामने आने लगा है कि जलवायु परिवर्तन अर्थात पर्यावरण के लिए बढ़े खतरे का सीधा संबंध गरीबी से है। गरीबी से अर्थात् वंचित समाजों के हाशिये पर चले जाने से। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि गरीबी मिटेगी और हाशिये पर पड़े वंचित समाजों की भलाई के बारे में ठोस प्रकार से सोचना शुरू होगा तो पर्यावरण की स्थिति सुधरने की संभावना बढ़ेगी। पर्यावरण और पारिस्थितिकी ठीक होंगे तो जलवायु परिवर्तन का दुष्चक्र धीमा पड़ेगा और स्थितियां सुधरेंगी। हां, हो सकता है कि स्थिति जितनी बिगड़ चुकी है उसे ठीक करने में लंबा समय लग जाए। जिस तर्क के साथ यह बात रखी जा रही है वह नयी नहीं है। नॉर्वे में 1972 में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में यह बात स्पष्ट हो चुकी थी और इस सम्मेलन के घोषणापत्र में माना गया था कि पर्यावरण संतुलन बिगड़ने के खतरे का सवाल दुनिया में बढ़ती गरीबी के साथ सीधा जुड़ा हुआ है। अर्थात् जब तक गरीबी खत्म नहीं होगी, पर्यावरण की सुरक्षा कर पाना भी कठिन होगा। यह बात आज साफ दिखायी दे रही है। भारत इसका उदारहण है जहां गरीब, आदिवासी, दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और दलितों जैसे वंचित समाज आज भी हाशिये पर हैं और इन्हीं को पर्यावरण खराब करने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन आज बड़ा मुद्दा है। सरकारों से लेकर तमाम तरह के संगठन और एजेंसियां इस विषय को लेकर चिंतित हैं क्योंकि हवा, पानी, पिघलते ग्लेशियर, सागरों का बढ़ता जलस्तर, आबोहवा में बदलाव, बारिश के मौसम में सूखा और बेमौसमी बरसात इत्यादि सब देख रहे हैं। फरवरी 2007 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा डॉ. आरके पचौरी की अध्यक्षता में गठित आईपीसीसी की रिपोर्ट में विस्तार से यह मुद्दा आ चुका है। जलवायु परिवर्तन के कारण पानी का संकट बढ़ा है, खाद्य सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है और गरीबी बढ़ी है। भारत के विभिन्न हिस्सों में किसानों की आत्महत्याओं के पीछे सूदखोरों के जुल्म के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन भी कारण है। यह दुर्भाग्य ही है कि कॉर्बन सिंक के नाम पर भी गरीबी से जूझ रहे देशों को ही निशाना बनाया जा रहा है। धनी देशों के लोगों की उपभोग की विकृत प्रवृत्तिायों के पोषण के लिए दुनिया के वंचित समाजों को मूलभूत आवश्यकताओं से आज भी वंचित रखा जा रहा है। पहले से ही पश्चिमी मुल्कों की ज्यादातियों को ढो रहे विकासशील देशों पर यह नया अत्याचार है। उनकी गरीबी का नाजायज फायदा उठाने की तरकीब के तौर पर कॉर्बन सिंक की राजनीति चलायी जा रही है।

जलवायु परिवर्तन पर चल रहे शोधों और अध्ययनों की मानें तो वर्ष 2050 तक जलवायु में इतना परिवर्तन आ जाएगा कि यूरोप में स्प्रिंग फरवरी में ही शुरू हो जाया करेगा। यह बात तो आने वाले समय की है पर यह उत्ताराखंड में पहले ही देखने में आ रहा है। अभी पिछले सीजन में बुरांश के फूल ऐसे समय में खिले देखे जब उन्हें नहीं होना चाहिए था और जब होना चाहिए था तब पेड़ों से फूल झड़ चुके थे। मोनाश विश्वविद्यालय आस्ट्रेलिया के मैल्कम क्लॉर्क और यूनिवर्सिटी ऑव एडिनबर रॉय थाम्पसन के एक अध्ययन के अनुसार भी 'बॉटेनिकल कैलेंडर' काफी बदल चुका है। उनके अनुसार ऐसे परिवर्तन से वनस्पतियों, पेड़-पौधों, चिड़ियों सहित अन्य जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए खतरे बढ़ गये हैं। फूल जब खिलते हैं तो पक्षी और मधुमक्खी जैसे कीट-पतंग पॉलिनेशन की प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाते हैं पर यह समय से न हो तो फूलों के फल में बदलने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इससे पूरा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होता है।

यह होने से पहले हमें टिकाऊ और सतत जीवन प्रक्रिया के लिए उपभोग के तौर-तरीके बदलने पर भी चिंतन करना होगा। एक तरफ कुपोषण और दूसरी तरफ अत्यधिक उपभोग से पैदा संकट सामने हैं। इन चुनौतियों से साझेदारी से ही निपटा जा सकता है।

अत्यधिक उपभोग के कारण ही दुनियाभर में हजारों-हजार शहर प्रतिदिन लाखों-करोड़ों टन कचरा पैदा करते हैं जिसे आम तौर पर खुले में डम्प किया जाता है। इससे भी धरती का तापमान बढ़ता है। मीथेन गैस तो इन कचरे के ढेरों से खूब निकलती है और इस गैस की क्षमता कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले 21 गुना ज्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करने की है। मीथेन गैस उत्सर्जन पर नियंत्रण जरूरी होने के मद्देनजर इस विषय पर भी गौर करना होगा कि हम अपने शहरों के कचरे का निपटारा कैसे करें और शहरों पर बोझ कैसे कम करें। गांधी और थोरो के दर्शन के हिसाब से सरल जीवन पकृति अपनाकर इस मसले का हल बड़ी सीमा तक खोजा जा सकता है। अनुमान है कि मानव गतिविधियों यानी एंथ्रोपोजेनिक कारणों से हुए जलवायु परिवर्तन से बनी विपरीत परिस्थितियों के कारण पिछले एक दशक में 10 लाख से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं। कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन ने मानव और जीव-जंतुओं की सेहत के लिए बड़ा भारी खतरा पैदा कर दिया है।

आज विश्व की आबादी का छठा हिस्सा पानी की समस्या से जूझ रहा है। वर्ष 2025 आते-आते दुनिया की आधी आबादी पानी के लिए जूझ रही होगी। यह खतरा इतना बड़ा है कि पर्यावरणीय समस्याओं से आगे बढ़कर सुरक्षा और विकास को चुनौती देने वाला बन गया है। इसमें कोई शक नहीं दिखायी देता कि अगला विश्व युद्ध जलस्रोतों पर अधिकार जमाने के लिए हो। आज जो पेट्रोलियम के लिए हो रहा है वह अगले दशकों में पानी के लिए होगा। लिहाजा, प्रत्यके राष्ट्र को अपने हिसाब से इन समस्याओं से जूझने के उपाय खोजने होंगे।

ऐसे में वर्ष 2050 में 10 अरब लोगों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले ऊर्जा स्रोत ही आने वाले समय में समाधान के तौर पर दिखायी देते हैं। इंटरनैशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी (इरेना) के नाम से 26 जनवरी 2009 को जर्मनी में गठित संस्था इन्हीं प्रश्नों के हल निकालने में लगी है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना इस एजेंसी का लक्ष्य है। आज की तारीख में ऊर्जा की 18 प्रतिशत पूर्ति रिन्यूएबल एनर्जी से ही होती है। भविष्य में इसे बढ़ाना नितांत आवश्यक है। इरेना की स्थापना में भारत की भूमिका सराहनीय रही है। अब उसे रिन्यूएबल ऊर्जा स्रोतों के संवर्धन की दिशा में काम करने की जरूरत है।

जलवायु परिवर्तन से बनी परिस्थितियों को सही तो निस्संदेह किया जा सकता है, भले ही इसमें समय लगे। धनी और प्रौद्योगिकी संपन्न राष्ट्रों के पास साधन, संसाधन और तकनीकें सब हैं। भारत सहित अनेक देश इसलिए इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन को ठीक करने के लिए धनी राष्ट्रों को अपनी उच्च प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण करना होगा। इस काम को अंजाम देने में जितना विलम्ब होगा, नुकसान उतना ही ज्यादा। लिहाजा, धनी देशों को इस पर चिंतन करना होगा।

जलवायु परिवर्तन के कारणों से वैश्विक स्तर पर राजनीतिक आर्थिकी और भू-राजनीतिक परिदृश्य पर नकारात्मक प्रभावों के संदर्भ में हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों की भूमिका पर भी गौर करना होगा। कहना न होगा कि राजनीतिक आर्थिकी और भू-राजनीतिक परिदृश्य कुछ भी हों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों को सख्ती से नियमों का पालन करने को कहना होगा। विश्व की राजनीतिक आर्थिकी और भू-राजनीतिक परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो पता चलेगा कि अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निगमों की विश्वस्तर पर औकात कई छोटे देशों से ज्यादा है। इसे शर्मनाक ही कहा जाएगा कि किसी भी सार्वभौम राष्ट्र से ज्यादा आभामंडल किसी कंपनी का हो, लेकिन यह सच्चाई है। इसी संदर्भ में कहना होगा कि इन कंपनियों और निगमों पर जब तक नकेल नहीं कसी जाएगी तब तक जलवायु परिवर्तन के कारण उपजे खतरों से निजात पाने की कोशिशें पूरी तरह से कारगर नहीं हो सकती हैं। ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने के तहत जो भी उपाय हों, उनकी परिधि में इन बड़ी और बहुराष्ट्रीय निगमों को शामिल किया जाना अत्यंत आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं होगा तो कोपेनहेगेन समझौता लागू हो जाने के बाद भी ये कंपनियां निर्बाध गति से पर्यावरण कानून की धज्जियां उड़ाती रहेंगी। अर्थात जिन देशों को आवश्यक रूप से कोपेनहेगेन समझौते की शर्तों को मानना पड़ेगा, वहां से ये कंपनियां पलायन कर ऐसे देशों में अपने संयंत्र लगा लेंगी जिन्हें समझौते के पालन में कुछ छूट दी जाएगी। स्पष्ट शब्दों में कहें तो यह सुनिश्चित करना होगा कि बहुराष्ट्रीय निगम धरती के किसी भी कोने में चले जाएं, उन पर कोपेनहेगेन समझौते की शर्तों के पालन की बाध्यता हो। इस विषय पर श्य्रूडर की चर्चित पुस्तक 'द कॉरपोरेट ग्रीनहाउस: क्लाइमेट चेंज पॉलिसी इन ग्लोबलाइजिंग वर्ल्ड' में चर्चा की गयी है।

जलवायु परिवर्तन ठीक करने के लिए पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा संरक्षण और न्यायोचित उपभोग की चुनौतियां सबके सामने हैं। इसके लिए वैश्विक तालमेल और सहयोग आवश्यक है। क्षेत्रीय या निजी लोभ-लालच और व्यापारिक हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा। धरती जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के साथ-साथ समस्त मानव समाज की है। हमारा एक अंग या एक हिस्सा भी बीमार या खराब होगा तो पूरी धरती का स्वास्थ्य गड़बड़ाएगा। इसलिए जब हम जलवायु परिवर्तन और धरती के गर्म मिजाज पर बात करें तो पूरी पृथ्वी का परिप्रेक्ष्य सामने रखें। किसी क्षेत्र या देश की बात न करें। पूरे विश्व और धरती को बचाने की कोशिशें हों। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि पहल स्थानीय स्तरों पर ही होगी। थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली की सार्थकता इसी में है। तभी वंचित समाज बचेंगे और धरती भी।

कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन का खतरा साफ-साफ नजर आ रहा है। जो लोग इसे प्रकृति की सहज प्रक्रिया मानते हैं, वे अपनी जगह सही हो सकते हैं लेकिन यह तो वे भी मानेंगे कि जलवायु परिवर्तन से गरीब तो मरेंगे ही, लेकिन धनी लोग भी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे। आज वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञों से लेकर तमाम संगठनों और आम लोगों पर खास जिम्मेदारी है कि किन उपायों के जरिये आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकें।

वर्ष 1972 से लेकर अब तक 37 साल निकल चुके हैं। रियो के पृथ्वी सम्मेलन से लेकर क्योतो और बाली के सम्मेलन हो चुके हैं तथा कोपेनहेगेन की तैयारी है। लेकिन क्या इन वर्षों में जलवायु परिवर्तन रुक सका है? नहीं। स्थिति पहले से बदतर हुई है। भारत के पर्वतीय, आदिवासी और अन्य वंचित समाजों के इलाकों से लेकर दुनियाभर के वंचित समाजों पर पारिस्थितिक कहर तेज हुए हैं। विकास, औद्योगीकरण, ढांचागत व्यवस्था की मजबूती जैसे मुहावरों ने वास्तव में वंचित समाजों का बहुत बुरा किया है। इन मुहावरों के साथ दुनियाभर में और खासतौर पर भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में प्राकृतिक धरोहरों पर हमले तेज हुए हैं। इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत और भारत जैसे देशों में जहां-तहां प्राकृतिक धरोहरें आज भी किसी सीमा तक संवर्धित हैं- वे पर्वतीय, आदिवासी या उपेक्षित क्षेत्रों में हैं। और इन इलाकों में रहने वाले समाज मुख्यधारा का हिस्सा नहीं समझे जाते हैं। ये समाज समग्र राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा नहीं हैं। शायद एक कारण यह भी हो सकता है कि उपेक्षा के चलते ही ऐसे अनेक इलाकों में माओवाद का प्रसार हो रहा है। हम ऐसे किसी 'वाद' के विरोधी नहीं, पर इतना तो अवश्य ही कहेंगे कि सरकारें जिस माओवाद का रोना रो रही हैं वह उनके कारण ही उपजा है। जिन वंचित समाजों को आजादी के दशकों बाद भी उम्मीद की कोई किरण न दिखायी देती हो, उनका रुझान किधर होगा, यह कहने की आवश्यकता नहीं।

भारत के संदर्भ में एक-दो बातें और कहना चाहेंगे। पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली एक प्रमुख संस्था 'टेरी' ने पिछले दिनों एक सरकारी उपक्रम एनएचपीसी को पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने का पुरस्कार देकर स्वयं को ही कटघरे में ला खड़ा किया है। एनएचपीसी जैसी संस्था किस प्रकार उत्ताराखंड सहित देश के अन्य हिस्सों में जनभावनाओं के विरुद्ध बांध बनाने का काम करती रही है, वह किसी से छिपा नहीं। इस पुरस्कार से मिली ख्याति के बूते इस संस्थान ने अपना आईपीओ बेचने की कोशिश भी की। इस प्रकरण ने टेरी और एनएचपीसी दोनों संस्थाओं को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। जलवायु परिवर्तन की बात करते समय हमें वंचित समाजों के अधिकारों के बारे में भी सोचना होगा। इसी क्रम में एक और बात। देश के विभिन्न संगठनों के प्रयासों के बाद बना वनाधिकार अधिनियम, 2006 भी ठीक से लागू नहीं होने दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश इसका उदाहरण है जहां वन विभाग के लोग अंग्रेजों के जमाने से आदिवासियों के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए बनाये गये इस कानून का गला घोंटने में लगे हैं। यह विभाग आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों को वनभूमि से खदेड़ने के बरसों पुराने रवैये पर कायम है। नतीजन वनवासियों को उनके पारंपरिक कब्जे की वनभूमि पर व्यक्तिगत अधिकार और गांव की पारंपरिक सीमा के भीतर की वन संपदा पर सामुदायिक अधिकार दिये जाने का काम नहीं हो रहा है। यह उदाहरण मात्र है। शेष जगह की स्थिति ऐसी ही है। ऐसी स्थिति कुल मिलाकर वंचित समाजों को और वंचित कर रही है। विश्व के अनेक भागों में भी यही स्थितियां हैं। वह चाहे विकसित जापान हो या घने जंगलों वाला ब्राजील। कुल मिलाकर वंचित समाजों की मानवीय गरिमा के साथ खिलवाड़ बढ़ा है। उनका सशक्तीकरण नहीं होगा तो जलवायु परिवर्तन सुधार कार्यक्रम की बातें बेमानी होंगी।

यह अच्छी बात है कि भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो पर्यावरण निगरानी के लिए दो उपग्रह बनाने की योजना बना रही है। एक उपग्रह मुख्य रूप से वायुविलय और संबंधित चीजों के अध्ययन के लिए होगा तो दूसरा कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रिक ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी गैसों का पता लगाएगा। इसरो के अनुसार पर्यावरण और वन मंत्रालय की जरूरतों के हिसाब से बनने वाले इन उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल जलवायु परिवर्तन अध्ययन में किया जाएगा। विचार अच्छा है, लेकिन कितनी इच्छाशक्ति से इस पर काम होगा, देखना बाकी है। फिलहाल तो यह सच्चाई है कि भारत में सूखे से प्रभावित राज्यों ने केन्द्र से 72 हजार करोड़ रुपये मांगे हैं और 11 राज्यों के 278 जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं। सरकारें इस स्थिति से कैसे निपटेंगी, यह कहना मुश्किल है।

पिछले दिनों मालदीव के राष्ट्रपति और पूर्व में पत्रकार रहे मोहम्मद नशीद के उस वक्तव्य पर ध्यान देने की आवश्यकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की कोपेनहेगेन में होने वाली बैठक में किसी समझौते पर पहुंचना आवश्यक है। उनका स्पष्ट तौर पर मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए कोपेनहेगेन में कोई समझौता नहीं हुआ तो सभी को कीमत चुकानी पडेग़ी। उनके इस तर्क में भी दम है कि यह मामला पर्यावरण के साथ-साथ सुरक्षा से भी जुड़ा है। उनकी चिंता इसलिए भी सही है क्योंकि वैज्ञानिकों के एक वर्ग का मानना है कि आने वाले समय में समुद्र का जलस्तर बढ़ने के बाद मालदीव नामक कोई देश धरती के नक्शे पर नहीं होगा। यह खतरा तमाम समुद्र तटीय देशों के लिए अलग-अलग सीमा तक बना हुआ है। अर्थात् भारत इसमें अपवाद नहीं है। भारत का हजारों किमी लंबा तटवर्ती क्षेत्र खतरे में है।

कोपेनहेगेन बैठक में वैश्विक समझौता होना इसलिए भी प्रासंगिक है कि दिसंबर 1997 में जापान के क्योतो में अंगीकार किया गया क्योतो समझौता बमुश्किल 16 फरवरी 2005 को प्रभावी हो पाया था और अमेरिका जैसे कुछ प्रभावशाली राष्ट्रों ने इसे अंगीकार नहीं किया था। यह समझौता 2012 में समाप्त हो जाएगा और इसका स्थान कोपेनहेगेन समझौता लेगा, यदि सर्वमान्य समझौता हो पाया तो।

कोपेनहेगेन की सफलता का दारोमदार बड़ी सीमा तक अमेरिका पर है। क्योतो प्रोतोकोल अर्थात् समझौते पर सही ढंग से अमल इसलिए नहीं हो पाया था क्योंकि अमेरिका ने स्वयं को इससे अलग रखा। अब कुछ परिवर्तन की आस है। डेमोक्रेट बराक ओबामा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान धरती के बढ़ते तापमान से जूझने, ईंधन की खपत कम करने और विदेशी ऊर्जा स्रोतों पर अमेरिका की निर्भरता कम करने का भरोसा दिलाया था।

कोपेनहेगन सम्मेलन उनके इस आश्वासन की परीक्षा को तैयार है। अमेरिका को चाहिए कि वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को आपसी समझबूझ वाली वार्ता में शरीक करे। कोपेनहेगेन में किसी नतीजे तक पहुंचने के लिए ऐसा करना आवश्यक है। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलैरी क्लिंटन का यह वक्तव्य गौर करने लायक है कि अमेरिका जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े मुद्दों से जूझने के लिए पूरी गंभीरता और ऊर्जा के साथ काम करेगा। फिलहाल तो इस वक्तव्य पर विश्वास ही किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन पर बात आगे बढ़ाते हुए यह दोहराना आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन का संबंध पूरी धरती से तो है लेकिन इसके प्रभाव क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। इनका निदान भी स्थानीय स्तरों पर किया जा सकता है और इस कार्य में वंचित समाजों की भागीदारी आवश्यक है। सच कहें तो आज धरती को बचाने की जिम्मेदारी कठिन है। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले वर्षों में किसी अन्य ग्रह के प्राण्ाी धरती पर आकर यह पता लगाने की कोशिश करें कि क्या धरती पर कभी जीवन रहा होगा?

इसे देखते हुए मानव और प्रकृति के पवित्र रिश्ते को बहाल करते हुए ही औद्योगिक और तमाम तरह के विकास की परिभाषाएं फिर गढ़नी होंगी। पानी के सदुपयोग अर्थात कम पानी से अधिक परिणाम हासिल करने की तकनीकें विकसित करनी होंगी। लेकिन एक लीटर कोका कोला या पेप्सी कोला बनाने के लिए चार-पांच लीटर पानी बर्बाद करते रहने से यह लक्ष्य कैसे हासिल होगा? बोतल में बंद पानी पीने से पहले भी विकल्पों के बारे में सोचना पड़ेगा। एक लीटर बोतल बंद पानी बनाने में एक लीटर से ज्यादा पानी बर्बाद होता है। प्लास्टिक की बोतल से होने वाला पर्यावरण को खतरा सो अलग।

आज हम सबकी निगाहें संयुक्त राष्ट्र के कोपेनहेगेन सम्मेलन पर लगी हैं। यदि कोपेनहेगेन सम्मेलन भी किसी आम सहमति तक नहीं पहुंचता है तो क्या होगा, कहा नहीं जा सकता। अमेरिका ने क्योतो में साथ नहीं दिया। अमेरिका आज प्रीडेटेर होने के नाते बड़ी संख्या में मुल्कों को प्रभावित करता है। उसे कोपेनहेगेन में जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। उसके जैसे दूसरे देशों को भी गंभीरता से सोचना होगा। इस संदर्भ में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना की प्रासंगिकता पर विचार करने की भी आवश्यकता है। भारत जैसे विकासशील देशों को भी अपनी भूमिका तलाशनी होगी, जिसका जिक्र पहले किया जा चुका है। कुल मिलाकर यह वैश्विक जिम्मेदारी है, जिससे कोई भी भाग नहीं सकता। वस्तुत: भारत को भी जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बहानेबाजी और अपना बचाव करने की नीति त्यागकर विश्वनेता के रूप में अपनी भूमिका अंगीकार करनी होगी तथा विश्वनेता के तौर पर ही ग्रीनहाउस गैसों में कमी और अनुकूल नीतियां अपनाने के लिए वातावरण तैयार करना होगा। विकासशील देशों में तभी भारत का सम्मान बढ़ेगा।

इसके अतिरिक्त हजारों वर्षों के बारे में सोचने से पहले हमें अगले कुछ सौ साल के बारे में सोचना होगा। छोटा लक्ष्य बनाना ठीक होगा। अगले चार-पांच सौ साल की योजना बना लेंगे तो तब के लोग अपना रास्ता स्वयं खोज लेंगे। हमारी जिम्मेदारी तो आने वाली कुछ पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य बनाने की सर्वप्रथम है। हजारों-लाखों वर्षों का दर्शनशास्त्र पढ़ने लगेंगे तो कुछ बचने वाला नहीं है। और इससे भी जरूरी है तात्कालिक पारिस्थितिक समस्याओं के बारे में सोचना। उदाहरण के लिए भारत के विभिन्न हिस्से पीने के पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। फसलों और मवेशियों के बारे में तो सोचना बंद सा ही हो गया है। पर सोचना तो पड़ेगा ही। पानी कम या नहीं होगा तो सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर आता है। पनबिजली उत्पादन भी कम होगा और इस प्रकार पर्यावरण अनुकूल विकास संबंधी गतिविधियों पर गलत असर पड़ेगा। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स अर्थात सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने का संकट और बढ़ जाएगा। पानी, बिजली और खाद्यान्न की कमी के चलते इन लक्ष्यों को छूना नितांत कठिन है। संयुक्त राष्ट्र के कर्ताधर्ताओं को इस बारे में गंभीरता से विचारना होगा।

(लेखक 'उत्तराखंड प्रभात' पाक्षिक पत्र के संपादक और अंग्रेजी पत्रिका 'कॉम्बैट लॉ' के सीनियर एसोसिएट एडीटर हैं)

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