ग़ज़ल
हादसों से, उबर गया कैसे ?
यह करिश्मा, मैं कर गया कैसे ?

मेरी आंखों का एक ही आंसू,
रास्ते में, ठहर गया कैसे ?

मुझको जीने की तमन्ना देकर,
मेरा विश्वास, मर गया कैसे ?

मैंने पूछी जो खैरियत उसकी,
उसका चेहरा, उतर गया कैसे ?

जिसने इल्ज़ाम लगाए आखिर,
उसके इल्ज़ाम, सर गया कैसे ?

मैंने तूफ़ान सैकड़ों देखे,
फिर हवाओं से, डर गया कैसे ?

गाँव रहकर यह समझ में आया,
गाँव चलकर, शहर गया कैसे ?

सांप हैरान, सोचते होंगे,
आदमी में, ज़हर गया कैसे ?
-अतुल मिश्र

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

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एक झलक

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