सुर्ख़ गुलाबों का दिन...
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मेरे महबूब!
आज रोज़ डे है... सुर्ख़ गुलाबों का दिन...महकती यादों का दिन...सोचती हूं कि
तुम्हें गुलाब कैसे भेजूं...तुम तो बहुत दूर हो... शायद तुम्हें याद भ...
ग़ज़ल
हादसों से, उबर गया कैसे ?
यह करिश्मा, मैं कर गया कैसे ?
मेरी आंखों का एक ही आंसू,
रास्ते में, ठहर गया कैसे ?
मुझको जीने की तमन्ना देकर,
मेरा विश्वास, मर गया कैसे ?
मैंने पूछी जो खैरियत उसकी,
उसका चेहरा, उतर गया कैसे ?
जिसने इल्ज़ाम लगाए आखिर,
उसके इल्ज़ाम, सर गया कैसे ?
मैंने तूफ़ान सैकड़ों देखे,
फिर हवाओं से, डर गया कैसे ?
गाँव रहकर यह समझ में आया,
गाँव चलकर, शहर गया कैसे ?
सांप हैरान, सोचते होंगे,
आदमी में, ज़हर गया कैसे ?
-अतुल मिश्र
