जिनको किसी से, कोई, शिकायत नहीं रही
वे क्या करें, वफ़ा की, रिवायत नहीं रही

कांटों की तरह चुभने लगे, 'प्रेम-दिवस' पर
फूलों में, पहले जैसी, मुहब्बत नहीं रही

वो बेवफ़ा था, छोड़ के, परदेस चल दिया
फिर भी बिना लिखे वो, उसे ख़त नहीं रही

उसको भी आसमान पे पूरा यक़ीन था
जिस पर कि आज अपनी, कोई छत नहीं रही

ईमान बिक रहा हो, बिना भाव के जहां
सुनते हैं सच की कोई भी, कीमत नहीं रही

आवाम को लिखे जो, रोज शब्द, बिक गए
अपनी क़लम भी बेच दें, नीयत नहीं रही

दुनिया में और कुछ भी, बहुत है तेरे लिए

यह बात अलग है कि शराफ़त नहीं रही

जो मिल नहीं सका तू, उसे भूल जा 'अतुल'
परछाइयों को तेरी, ज़रूरत नहीं रही
-अतुल मिश्र

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