इक नई खुशबू कहां से पास मेरे आ गई
सोच की धारा बदलकर जिन्दगी में छा गई
रोज मिलते जो हजारों लोग कितने याद हैं
आँख से उतरा हृदय में प्रीत मुझको भा गई
फिर मेरी मुस्कान लौटे था यकीं ऐसा कहां
स्निग्ध सी मुस्कान जैसे भ्रम के गम को खा गई
कुछ न कुछ तो शेष रहतीं जिन्दगी में चाहतें
जिन्दगी कहती कि मानो सारी खुशियां पा गई
बात करते कम सुमन की प्यार लेकिन खास है
याद उस एहसास की दिल से अभी तक ना गई
-श्यामल सुमन
इश्क़ की नज़्म...
-
मैं
उम्र के काग़ज़ पर
इश्क़ की नज़्म लिखती रही
और
वक़्त गुज़रता गया
मौसम-दर-मौसम
ज़िन्दगी की तरह...
*-फ़िरदौस ख़ान*

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