स्टार न्यूज़ एजेंसी
नई दिल्ली. भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लॉग में विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर श्वेत पत्र जारी करने पर ज़ोर दिया है.  उन्होंने कहा है कि " जब वर्ष 2008 में भारतीय जनता पार्टी ने सबसे पहले स्विस बैंकों और अन्य टैक्स हेवन्स में भारतीय धन के गुप्त रुप से जमा होने के मुद्दे को उठाया तो कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने इसका मजाक उड़ाया। वे सवाल करते थे कि जब एनडीए 6 वर्ष के लिए सत्ता में थी,तब इस मामले में क्यों कार्रवाई नहीं की गई। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने इसे चुनावी स्टंट कहा।

इसलिए, जब भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस मुद्दे का उल्लेख किया गया तो मुझे प्रसन्नता हुई। संसद की संयुक्त बैठक को सम्बोधित अभिभाषण में कहा गया कि: ”भारत कर सम्बन्धी सूचना के आदान -प्रदान को सुगम बनाने तथा कर चोरी की सुविधा देने वाले क्षेत्रों के खिलाफ कार्रवाई करने से सम्बन्धित वैश्विक प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभा रहा है।”

संसद में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने न केवल इस मुद्दे के महत्व को स्वीकारा अपितु बताया भी कि सरकार इस मुद्दे पर सक्रिय है और बीस देशों से उन भारतीय नागरिकों के बारे में सूचनाएं आदान-प्रदान करने हेतु बातचीत कर रही है जिन्होंने अपना धन कर बचाकर या गलत तरीके से कमाकर विदेश में रखा है।

अब देश केवल स्वीकारोक्तियों और घोषणाओं से शांत होकर बैठने वाला नहीं है। दो वर्ष पूर्व जब भाजपा ने इस मुद्दे को उठाया था तब से कांग्रेसी नेता, भाजपा टास्क फोर्स द्वारा विदेशों में रखे गए ऐसे धन के अनुमानों को रफा-दफा करने की कोशिशों में लगे रहे। एक वरिष्ठ कांग्रेसी मंत्री ने कहा था कि ये अनुमान अपुष्ट स्रोतों और इंटरनेट पर आधारित है।

भाजपा द्वारा गठित टास्क फोर्स के सदस्य थे श्री एस. गुरुमूर्ति (चाटर्ड एकाउंटेट और खोज परक लेखक, चेन्नई), श्री अजित ढोवाल (सुरक्षा विशेषज्ञ, नई दिल्ली), डा. आर. वैद्यनाथन (वित्त प्रोफेसर, भारतीय प्रबंध संस्थान, बंगलुरु) और श्री महेश जेठमलानी (वरिष्ठ अधिवक्ता, मुंबई)। इस टास्क फोर्स ने विभिन्न स्रोतों का अध्ययन करके यह अनुमान बताया कि 25 लाख करोड़ से 70 लाख करोड़ रुपए के बीच का भारतीय धन विदेशों के टैक्स हेवन्स में जमा है।

यह महत्वपूर्ण है कि गत् सप्ताह संसद में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए भाषण को मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक ने प्रमुखता से प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने बताया कि भारत ने स्विटजरलैंड सहित बीस देशों से इस संबंध में बातचीत पूरी कर ली है,और साथ ही दैनिक ने विदेशों में जमा ऐसे भारतीय धन की अनुमानत: राशि उतनी ही बताई है जो भाजपा के टास्क फोर्स ने बताई थी। मुंबई का दैनिक डीएनए (6 मार्च, 2010) लिखता है: हालांकि स्विटजरलैंड सहित ऐसे टैक्स हेवन्स में जमा राशि के बारे में कोई अधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, फिर भी अनुमान है कि भारतीय नागरिकों का ऐसा काला धन 140 बिलियन अमेरिकी डालर है ।

जब तक पश्चिम प्रभुत्ववाली अर्थव्यवस्था अमेरिका और भारत सहित अन्य पश्चिमी देशों के लिए अच्छी चल रही थी तब तक इन टैक्स हेवन्स के बैंकों के गोपनीय नियमों से कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन हाल ही के वैश्विक आर्थिक संकट ने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा अपितु ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे अनेक यूरोपीय देशों ने अपने रुख में बदलाव कर, इन देशों में बैंकिग गोपनीय नियमों को बदलने के प्रयासों में एकजुट होकर प्रयास शुरु किए हैं।

गत् वर्ष वाशिंगटन ने बड़े स्विस बैंक यूबीएस को उन 4450 अमेरिकी ग्राहकों के नाम बताने पर बाध्य किया जिन पर स्विटजरलैंड में धन छुपाने का संदेह था।

संयोगवश,मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि स्विस बैंकों इत्यादि में गुप्त ढंग से जमा भारतीय धन के बारे में एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है और इसमें पुणे के एक स्टड-फार्म स्वामी, हसन अली खान का विशेष रुप से उल्लेख है जिसने स्विटजरलैंड के यूबीएस बैंक में भारी राशि जमा की हुई है। यह भी ज्ञात हुआ है कि सम्बंधित बैंक ने इसकी पुष्टि की है लेकिन भारतीय अधिकारी,स्विस सरकार द्वारा मांगे गए उपयुक्त दस्तावेजों को अभी तक दे पाने में सफल नहीं हो पाए हैं!

मैंने डा.मनमोहन सिंह के साथ सबसे पहले यह मुद्दा तब उठाया था जब जर्मनी ने सार्वजनिक रुप से घोषणा की कि उसे लीशेंस्ताइन (Liechenstein) से टैक्स हेवन्स में खाता रखने वाले जर्मन नागरिकों की सूची मिली है, और संयोग से इसमें कुछ भारतीय नाम भी सम्मिलित थे। यदि उनसे अधिकारिक तौर पर पूछा जाता तो वह भारत को साथ सूचना देने को इच्छुक थे। ऐसा माना जाता है कि तब से अब तक हमारी सरकार को पचास नामों की सूची प्राप्त हुई है। भारत सरकार ने इन नामों को सार्वजनिक करने से इस आधार पर मना कर दिया है कि जर्मनी ने ऐसे रहस्योद्धाटनों पर कुछ कानूनी शर्तें लगा दी है। यह बड़ा अटपटा है कि जर्मनी ने अपनी सूची तो जारी कर दी है और वह चाहता है कि भारतीय नाम पर्दे में ही छिपे रहें। या यह हमारी अपनी झिझक है?

अब सरकार ने संसद को औपचारिक रुप से बताया है कि स्विटजरलैंड सहित बीस देशों से उसकी बातचीत पूरी हो गई है।

मैं मानता हूं कि आज यह जो स्थिति बनी है वह मुख्य रूप से इसलिए बनी हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया। मुझे प्रसन्नता है कि चुनाव अभियान के दौरान यह मुद्दा लोगों में चर्चा का गरमागरम मुद्दा बना। स्वामी रामदेवजी जैसे संन्यासियों ने इसका अपने प्रवचनों में उल्लेख किया। फाइनेंसियल टाइम्स में "इंडिया’स कर्स ऑफ ब्लैकमनी” शीर्षक से प्रकाशित लेख के लेखक रेमण्ड बेकर (निदेशक, ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी) ने लिखा है कि: ”भारत ने दिखा दिया है कि यह मुद्दा मतदाताओं को छूता है। अन्य विकासशील लोकतंत्र के राजनीतिज्ञों को इसे ध्यान में रखना समझदारी होगी।”

मैं इस पर जोर देना चाहता हूं कि यह सरकार का कर्तव्य है कि वह लोगों को बताए कि बीस देशों से हुई बातचीत का क्या नतीजा निकला है। मैं आग्रह करना चाहूंगा कि इस मुद्दे पर एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया जाए और पूरे देश को विश्वास में लिया जाए।"

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