आर.के.सुधामन
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की मेरूदंड है और एक अरब से अधिक की भारतीय आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब भी कृषि पर निर्भर है। हालांकि जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटता जा रहा है लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग कृषि में लगे हुए हैं।

2012 तक की ग्यारहवीं योजना में चार प्रतिशत कृषि विकास दर का लक्ष्य है जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और सतत आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था को 9 प्रतिशत के विकासदर पर ले जाने के लिए बहुत ही जरूरी है। पिछले दो वर्षों में चार प्रतिशत के वृध्दिदर का स्तर हासिल करने में कृषि के विफल रहने के बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने 2010-11 के बजट में इस क्षेत्र को केंद्र में ला दिया है। यह तथ्य सामने आने के बाद कि 2009-10 में खराब मानसून से प्रभावित हुए खरीफ फसल के कारण कृषि क्षेत्र में नकारात्मक वृध्दि होने की संभावना है, इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया गया है।

वित्त मंत्री ने कृषि विकास में तेजी लाने के लिए बजट में चार सूत्री रणनीति की घोषणा की है। यह रणनीति कृषि उत्पादन बढ़ाने, उत्पाद के नुकसान में कमी लाने, किसानों के लिए बेहतर ऋण सहायता और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।

कृषि के लिए योजना व्यय 2009-10 के अनुमानित 10,765 करोड़ रुपये से 50 प्रतिशत बढ़ाकर 15,042 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

जैसा कि कृषि मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा है, रणनीति का पहला तत्व कृषि उत्पादकता बढ़ाना है। पंजाब, हरियाणा और अब महाराष्ट्र एवं दक्षिणी भारत में हुई हरित क्रांति का बीज पूर्वी भारत में नहीं पनपा है। इन राज्यों में कृषि उत्पादकता अब भी निम्न है और कई हिस्सों में तो यह पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों की तुलना में करीब-करीब आधा है।

बजट में प्रस्तावित 400 करोड़ रुपये की पहल से बिहार, छत्तीसगढ,झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओड़िसा जैसे राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। इन राज्यों में कृषि उत्पादकता अब भी काफी कम है। इस पहल में कोई रॉकेट साइंस शामिल नहीं है। बस, सभी को ग्राम सभा और कृषक परिवारों की भागीदारी से कृषि विस्तार कार्यक्रम के जरिए पंजाब और हरियाणा के उदाहरणों को दोहराना है।

इस पहल में पूर्वी राज्यों में कृषि के बीच अंतर को दूर करने के लिए योजनाओं का सृजन भी शामिल है। राज्य केंद्र सरकार के साथ परामर्श कर नये उप अवयव तैयार करेंगे।

यह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का हिस्सा बनेगा। यह राज्य स्कीम है और इसे अतिरिक्त संसाधनों द्वारा राज्यों को कृषि के लिए प्रेरित करने के लिए ग्यारहवीं योजना में शुरू किया गया था। यह राशि गंभीर अंतर को पाटेगी। पहले जिला योजना बनायी जाएगी और फिर उस आधार पर हर क्षेत्र की कृषि एवं जलवायवीय दशाओं को ध्यान में रखकर कृषि एवं अन्य संबध्द क्षेत्रों के लिए राज्य योजना तैयार की जाएगी।

2010-11 के बजट में कृषि विकास योजना के लिए 6722 करोड़ रुपये प्रदान किए गए हैं। योजना में तिलहन एवं दलहन उगाने वाले कुछ चयनित गांवों में इन फसलों के विकास पर विशेष पहल प्रावधान भी है।

वर्ष 2010-11 के दौरान देश के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में 60 हजार गहन तिलहन एवं दलहन गांव विकसित करने के लिए 300 करोड़ रुपये दिए गए हैं। इन गांवों में शुष्क कृषि क्षेत्रों की उत्पादकता बढाने के लिए जल संचयन, जल संभरण, प्रबंधन एवं मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार पर विशेष बल दिया जाएगा।

वित्त मंत्री ने हरित क्रांति क्षेत्रों में हासिल उपलब्धियों को संरक्षण कृषि के जरिए कायम रखने के लिए जलवायु संबंधी कृषि पहल शुरू करने के लिए 200 करोड़ रुपये प्रदान किए हैं। इसके तहत मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार, जल संरक्षण और जैवविविधता के परिरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इन उपायों से कृषि क्षेत्र में चार प्रतिशत वृध्दिदर हासिल करने की सरकार की कटिबध्दता को पूरा करने में मदद मिलेगी। गंभीर अंतरों को दूर करने के लिए छोटे निवेश के जरिए कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय वृध्दि हासिल की जा सकती है और इस बात का बजट में स्पष्ट रूप से प्रयास किया गया है।

रणनीति का दूसरा तत्व भंडारण में और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के संचालन में होने वाले नुकसान में कमी लाना है। इससे खेत पर फसल की कीमतों, थोक मूल्यों और खुदरा मूल्यों के बीच अंतर को बहुत हद तक पाटने में सहायता मिलेगी। उदाहरणस्वरूप, देश के विभिन्न हिस्सों में 1000 वितरकों को जारी एक एक क्विंटल खाद्यान्नों की तुलना में एक वितरक को जारी किए गये 1000 क्विंटल खाद्यान्न के दामों पर भिन्न प्रभाव होता है।

मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने इस उदाहरण की चर्चा करते हुए कहा कि इस वर्ष जनवरी से ज्यादा बिक्री केंद्रों को कम मात्रा में खाद्यान्न आवंटन करने से खाद्य पदार्थों के दाम नीचे लाने में मदद मिली।

बफर स्टाक एवं देश में जनवितरण प्रणाली के लिए खरीदा गया अनाज भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पास भंडारण की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण बड़ी मात्रा में नष्ट हो जाता है। इस समस्या से निजात पाने के लिए वित्त मंत्री ने एफसीआई द्वारा किराये पर पांच साल के लिए लिये जाने वाले निजी गोदामों की अवधि बढ़ाकर सात साल कर दी है ताकि इस दौरान खाद्यान्न के लिए भंडारण सुविधाओं में वृध्दि की जा सके। इससे एफसीआई के अपर्याप्त भंडारण सुविधा से खाद्यान्न नुकसान में भारी कमी आएगी।

जब हम रणनीति के तीसरे तत्व कृषि ऋण पर आते हैं तो हम देखते हैं कि मंत्री ने बजट में कृषि ऋण लक्ष्य मौजूदा वित्त वर्ष के 3,25,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2010-11 में 3,75,000 करोड़ रुपये कर दिया है।

किसानों के लिए त्रऽण माफी और ऋण राहत योजना सरकार द्वारा किसानों खासकर सूखा प्रभावित क्षेत्रों के गरीब किसानों के दुख दर्द को दूर करने के लिए उठायी गयी प्रमुख पहल है। सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में गरीब किसानों को बहुत बड़ी राहत प्रदान करते हुए 71,000 करोड़ रुपये का कृषि ऋण माफ कर दिया है। बजट में ऋण अदायगी की अवधि 31 दिसंबर, 2009 से छह महीने बढ़ाकर 30 जून, 2010 कर दी गई है। इससे खरीफ सीजन में सूखे से प्रभावित किसानों को बहुत राहत मिलेगी। मौजूदा रबी सीजन अच्छा होने की उम्मीद है और सरकार द्वारा किए जाने वाले सहायता उपाय भी किसान के लिए मददगार साबित होंगे।

जो किसान लघुकालीन फसल ऋण समय पर चुका देते हैं उनके लिए 2009-10 में ब्याज दर में एक प्रतिशत की अतिरिक्त छूट 2010-11 में बढ़ाकर दो प्रतिशत कर दी गयी है। वित मंत्री ने कहा कि इस कदम के बाद किसानों के लिए प्रभावी ब्याज दर महज 5 प्रतिशत रह जाएगी। उन्होंने कहा कि 2010-11 में इस छूट का आवश्यक प्रावधान किया गया है।

फलों, सब्जियों, फूलों और फसलों की खेती को बढावा देते हुए इनका उत्पादन दोगुणा करने के लिए राष्ट्रीय बागवानी मिशन की शुरूआत की गयी है। इसका लक्ष्य निर्यात के लिए बागवानी उत्पादों की ज्यादा उपलब्धता सुनिश्चित करना और किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है।

कृषि को बढ़ावा देने के लिए चारसूत्री रणनीति का अंतिम तत्व खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में तेजी लाना और अत्याधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना करना है।

वित्त मंत्री ने घोषणा की कि देश में पांच और मेगा फूड पार्क स्थापित किए जाएंगे जिससे इनकी संख्या 15 हो जाएगी। उन्होंने कृषि उत्पादों के लिए शीत भंडारण सुविधा की स्थापना के लिए विदेशी वाणिज्यिक उधार की भी अनुमति दी।

देश में शीत भंडारण सुविधा की कमी और खाद्य प्रस्संकरण उद्योग के अपर्याप्त विकास के कारण करीब 40,000 करोड़ रुपये के फल और सब्जियां नष्ट हो जाती हैं। इन कदमों से कृषि आय बढ़ाने, नुकसान घटाने और गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी क्योंकि इन क्षेत्रों में श्रम की अधिक आवश्यकता होती है।

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