रवीन्द्र कुमार पाठक
सोन कमांड एरिया के बीच भी अनेक गांवों की सिंचाई दो हजार बरस पुरानी आहर-पईन प्रणाली से ही होती है। इन इलाकों का हाल मिश्रित रहा। जहां मरम्मत, देखरेख का काम ठीक से हुआ है, वहां तो सिंचाई हो गई। बाकी जगहों में फसल बर्बाद भी हुई है। राजनैतिक समाज सेवियों के दुर्भाग्य से सूखा भी इस साल ठीक से नहीं हुआ। न जिले की दृष्टि से, न चुनाव क्षेत्र की दृष्टि से, न पार्टियों के जनाधार की दृष्टि से। आंकड़ेबाज औसत-प्रेमी वैज्ञानिक-इंजीनियर, पदाधिकारियों की दृष्टि से भी सूखा ठीक-ठाक नहीं रहा। बेतरतीब ही सही, वर्षा हो भी गई, कुछ इलाकों में फसल भी हो गई, कमजोर ही सही। बड़ा बैराज, जैसे- सोन नद पर बना इन्द्रपुरी बैराज और छोटे बैराज (अनेक) बड़े इलाके में फसल बचाने में सहायक हुए। बड़े बैराज ने सोन पानी के बंटवारे को लेकर बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच विवाद शुरू तो किया पर ठीक मौके पर आसपास के जल से चालू हो गया। झगड़े का मुद्दा ही ठंडा हो गया। कुछ विधायकों ने पानी लूट की राजनीति की, कुछ ने सफल पईन कमीटियों को तोड़ने की। फिर भी कमोबेश छिटफुट रूप से मगध के इलाके में धान की खेती 20 प्रतिशत हो गई। दक्षिण बिहार के क्षेत्रफल की दृष्टि से 30 प्रतिशत से 50 प्रतिशत इलाके में धान की खेती महंगी और बीमार फसलों वाली रही।

इस बार दक्षिण बिहार में सूखा होने पर भी मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के रिहंद के बाद में फैले हुए सोन के जल ग्रहण क्षेत्रों में तीन-चार बार वर्षा हो गई। कुछ पानी झारखंड के जंगलों से आ गया। बाद में बाणसागर से भी कुछ पानी मिला। किसी तरह काम चल गया। वितरणियों के दूरस्थ क्षेत्रों में सिंचाई नहीं हो सकी।

सोन कमांड एरिया के बीच भी अनेक गांवों की सिंचाई दो हजार बरस पुरानी आहर-पईन प्रणाली से ही होती है। इन इलाकों का हाल मिश्रित रहा। जहां मरम्मत, देखरेख का काम ठीक से हुआ है, वहां तो सिंचाई हो गई। बाकी जगहों में फसल बरबाद भी हुई है।

बनावट की दृष्टि से मगध क्षेत्र एक मिश्रित भौगोलिक संरचना वाला क्षेत्र है। इसके दक्षिण भाग में झारखंड का पठार है। इनसे निकलने वाली नदियों का अंत मगध के मैदानों में या गंगा में होता है। गंगा से दक्षिण की ओर अधिकतम 110 किलोमीटर के लगभग पहुंचते ही पठारी क्षेत्र आ जाता है। कई स्थानों पर यह दूरी 50 किलोमीटर से भी कम है। दक्षिण की पहाड़ियों और उसके पास की पठारी भूमि से ही अधिकांश छोटी-बड़ी नदियों का उद्गम होता है।

इसमें कुछ इलाके ग्रेनाइट और नाइस वाली चट्टानों के हैं तो कुछ क्वार्जाइट के। सोन से पूरब का इलाका मुख्यतः ऐसा ही है। गया से शेखपुरा तक की राजगीर श्रृंखला क्वार्जाइट वाली है। फतेहपुर के आसपास मिश्रित क्षेत्र है। संधिस्थल है गया। गया से डोभी के पास अमारुत तक एक बड़ा घाटी-क्षेत्र है, जिससे बना ऊंचा मैदानी भाग है। ऐसी संरचनाएं अन्यत्रा भी हैं किंतु छोटी हैं, जमीन की तीव्र ढाल पहाड़ी भाग में तो है किंतु दूसरी जगह वह बहुत कम हो जाती है। परिणामतः नदियां आरंभ से कुछ ही दूर जाकर बूढ़ी हो जाती हैं।

सोन, पुनपुन, गंगा बड़ी नदियां हैं। सोन के उग्र स्वभाव के कारण इसे नद भी कहा जाता है। इसका पुराना नाम हिरण्यवाह भी है। हिरण्यवाह अर्थात सोने को ढोने वाला। मोरहर, सोरहर, फल्गु, निरंजना, ढाढर, तिलैया, मंगुरा, जकोरी, धनार्जय, खूरी, पंचाने, सकरी, किउल आदि अन्य प्रमुख नदियां हैं। इनमें गर्मी में पानी रेत के भीतर बहता है। इसके साथ कुछ ऐसी छोटी नदियां भी हैं, जो वर्ष भर बहने वाली सदानीरा हैं, जैसे- जमुने और पैमार।

जमीन के नीचे जो बालुका राशि है, वह कहीं किसी ढेर के समान है तो कहीं टापू के समान। अधिकांश स्थानों पर वह जमीन में दबी नदी ही होती है क्योंकि वस्तुतः वह एक पुरानी नदी का भाग है और वर्त्तमान नदी की धारा से भी कई स्थानों पर उसका जुड़ाव होता है।

उत्तर में गंगा नदी और दक्षिण में 150 मीटर समोच्च रेखा से आबद्ध छोटा नागपुर उच्च भूमि के बीच औरंगाबाद, गया, नवादा, जहानाबाद, पटना और नालंदा जिलों में विस्तृत क्षेत्र को मगध क्षेत्र कहा जाता है। यह क्षेत्र भारत के अति-प्राचीन जनपद मगध का समक्षेत्री है। गया, राजगीर और पाटलिपुत्र इसकी प्राचीनता के साक्षी हैं। इसका क्षेत्रफल 17,913 वर्ग किलोमीटर और जनसंख्या 1.236 करोड़ है।

पुराने भारतीय वैज्ञानिक वराहमिहिर के अनुसार मगध क्षेत्र को दो भागों में बांटा जा सकता है- अनूप अर्थात् उपजाऊ मैदानी भू-भाग, जो जलोढ़ सामग्रियों से बना है तथा जांगल प्रदेश अर्थात् पठार तथा घाटियों से भरा भू-भाग। मगध में मरुस्थल नहीं है।

ढाल कम होने तथा गंगा नदी के द्वारा सरिता निर्माण की प्रक्रिया में अपने तटों को ऊंचा करने के कारण एक बड़ा भू-भाग पानी से भरा रहता है। यह मगध का उक्तारी क्षेत्र है। बाढ़ से बख्तियारपुर-मोकामा तक का टाल सभी जानते हैं। यह इलाका डूब क्षेत्र का है। गर्मी में कुछ इलाकों से तो पानी उतर जाता है किंतु कुछ क्षेत्र पानी से भरे ही रह जाते हैं। मगध क्षेत्र की पर्वत शृंखला तथा गंगा नदी के बीच पश्चिम में दूरी अधिक है पर पूरब में बहुत कम हो जाती है।

सोन कमांड एरिया में बड़ी नहर और वितरणियों का जाल है। लगभग 120 किलोमीटर लंबी तथा 20 से 30 किलोमीटर चौड़ी पट्टी में इन नहरों से सिंचाई होती है। इसी प्रकार बरसाती पहाड़ी नदियों पर बने छोटे-छोटे बैराज भी कई इलाकों में काफी सफल रहे हैं। स्वयं सो जाने वाले छोटे-छोटे फाटकों से युक्त ये बैराज बहुत विचित्रा और संरक्षणवादी हैं। इनमें जल स्तर किसी भी हाल में 8 फुट से ऊंचा नहीं उठता। अगर नदी का जल स्तर इससे अधिक उठा तो स्वयं इसके फाटक सो जाते हैं, विध्वंस नहीं करते। इनके फाटकों को दो व्यक्ति मिलकर खड़ा कर सकते हैं। तीन सौ से चार सौ मीटर चौड़ाई में बने सौ सवा सौ फाटकों को खड़ा करने के लिए दस लोग काफी हैं। एक बैराज से कम से कम सौ वर्ग किलोमीटर में सिंचाई आसानी से हो जाती है। पूरे मौसम में सौ दो सौ मानव दिवस लग ही जाएं तो क्या हर्ज है। लेकिन आधुनिक बटन दबाकर काम करने वाली जनता, ठेकेदार और इंजीनियर इससे प्रसन्न नहीं हैं।

ये बैराज प्रायः वैसे स्थानों पर हैं, जहां पहले भी कच्चा बांध बनाकर किसान अपनी पईन से सिंचाई करते रहते थे। इस साल भी उन्होंने ऐसा किया, फसल उगाई लेकिन आबपाशी कानून की ढाल में सरकार को जायज और नाजायज किसी भी तरीके से राशि नहीं दी। निराकार सरकार का वास्तविक रूप तो सगुण साकार कर्मचारी ही होते हैं, इनके ही भीतर तो शक्तिमान संप्रभुता निहित होती है। दूसरी नाराजगी इसलिए कि पता नहीं किस इंजीनियर ने ऐसी सस्ती, सुविधाजनक और विध्वंस शक्ति से रहित तकनीक स्थापित की है कि ये न तो अचानक बिगड़ते हैं, न बाढ़ लाते हैं, न तटबंध तोड़ते हैं न त्राहि माम् संदेश का अवसर देते हैं। टेंडर-वेंडर का मौका ही नहीं, और होता भी है तो लाख-दो लाख का बस। अब महंगाई के जमाने में इससे कैसे काम चले?

नई पीढ़ी के सुस्त नौजवान किसान भी कम दुखी नहीं हैं कि इनमें बड़े बांधों की तरह साल भर पानी नहीं रहता। नौका विहार, बिजली उत्पादन कुछ नहीं होता। ये क्या कि जल स्तर फाटक के आकार से तीन फुट भी ऊंचा हुआ नहीं कि ‘सो’ गए। बेचारी नदी की गहराई अधिकतम (बालू की परत जोड़कर) 100-125 फुट, तटबंध 20-25 फुट ऊंचे और स्रोत बरसाती पानी, बांध बने तो कैसे?

इस बार बुरा हाल रहा चंबल की तरह रिसाव आधारित मैदानी नदियों का, जो पहले कभी सफलता के शिखर पर थीं। तीन साल से लगातार कम वर्षा और अत्यधिक नलकूपों ने उस जमुने को सुखा दिया, जिस पर तीन वीयर बांध हैं, जो 200 वर्ग किलोमीटर में सिंचाई करती है। जमुने सूखी तो ‘पैमार’ ‘वंशी’ आदि का भी बुरा हाल रहा। फिर भी बाद की बारिश में जमुने बहने लगी। जमुने दसईन पईन से चार-पांच गांवों में धान की रोपनी हो गई और बाद में पटवन का भी काम कई गांवों में हुआ। फिर भी स्थिति दुखद ही रही।

पठारी इलाकों में कुछेक स्थानों पर लगभग 10-15 साल बाद लघु सिंचाई विभाग द्वारा आहरों (तालाबों) की मरम्मत की गई। इनमें विलंब से पानी भरा।

अतः किसान ठीक से लाभान्वित नहीं हो सके किंतु जलभृतों में जलसंभरण का काम और रबी के लिए जमीन में नमी बनाने का काम तो हो गया। शेष स्थानों पर वह भी नहीं हो सका।

अब तक की सारी कहानी धान की दशा पर आधारित है। अगर किसान पुरानी पद्धति से मिश्रित खेती करते तो स्थिति इतनी विकराल नहीं होती। ऊंची जमीन पर कम पानी वाली फसलों की जगह सब जगह धान उपजाने की लालच ने भी कम तबाही नहीं की है। इससे खाद्यान्न विविधता, मिट्टी संरक्षण, पौष्टिकता सभी प्रभावित हुए हैं। इन कम पानी पीने वाले अन्नों की न तो पौष्टिकता में कोई कमी है, न बाजार में इनकी कीमत चावल या गेहूं से कम है। फिर भी किसानों के सामूहिक निर्णय तथा दूरदर्शिता की कमी से ये संकट खड़े हो रहे हैं। यह जरूरी तौर पर समझने की बात है कि कोई दो-चार किसान अपनी मर्जी से सभी जगह अपनी पसंद की खेती नहीं कर सकते। ऐसा करने पर सिंचाई वाले पानी के आने, निकास, पशुओं से फसल की रक्षा, चोरी-चकारी जैसी इतनी उलझनें आती हैं कि किसान अंततः वही करता है, जो पास-पड़ोस के किसानों की इच्छा होती है।

कई बार खेती के काम में ‘एकला चलो’ व्यावहारिक नहीं हो पाता।

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