सेक्स का औद्योगिकीकरण

Posted Star News Agency Sunday, April 11, 2010

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी 
मौजूदा दौर की विशेषता है सेक्स का औद्योगिकीकरण। आज सेक्स उद्योग है। पोर्न उसका एक महत्वपूर्ण तत्व है। पोर्न एवं उन्नत सूचना तकनीकी के अन्तस्संबंध ने उसे सेक्स उद्योग बना दिया है। 

भूमंडलीकरण के कारण नव्य-उदारतावादी आर्थिक नीतियों के आधार पर नयी विश्व व्यवस्था का निर्माण किया गया है। इस व्यवस्था में निरंतर स्ट्रक्चरल एडजेस्टमेंट पर जोर है। उसी के आधार पर रीस्ट्रक्चरिंग हो रही है। इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना। इसके लिए जरूरी है कि जनता की स्वीकृति हासिल की जाए।

जनता की सहमति के बगैर यदि रीस्ट्रक्चरिंग की जाती है है तो तनाव पैदा होगा,झगड़े होंगे और अराजकता फैलेगी। इस सबसे निबटने के लिए बल प्रयोग करना होगा। यही वह बिन्दु है जिसे केन्द्र में रखकर नव्य उदारतावादी नीतियों की सारी रणनीति काम कर रही है। अब जोर व्यक्तिवादी विचारधारा पर है।प्रतिस्पर्धी रूपों पर है। व्यवसायिकता पर जोर दिया जा रहा है।ये सारी चीजें मिलकर संरचनात्मक असमानता पैदा कर रही हैं।निरंतर शोषण,गरीबी, हताशा, डेसपरेशन आदि पैदा कर रही हैं। इस स्थिति से ध्यान हटाने के लिए समूचा मनोरंजन उद्योग, इच्छा उद्योग और सेक्स उद्योग सक्रिय है। वह असल मुद्दों या समस्या से ध्यान हटाने या गलत दिशा देने का काम कर रहा है।

नव्य-उदारतावाद सामान्य लोगों को यह बताने में व्यस्त है कि नव्य विश्व व्यवस्था लोगों को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है। वह व्यक्ति के उपभोग, व्यक्तिगत चयन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। यह धारणा भी प्रसारित की जा रही है कि माल और व्यक्ति का विनिमय हो सकता है। निजी उद्योग का लक्ष्य सार्वजनिक भलाई करना है। कारपोरेट सक्षमता विकसित करने के लिए वस्तुकरण जरूरी है।

तीसरी दुनिया के देशों में श्रम का नव औपनिवेशीकरण हो रहा है। नस्लवाद और सेक्सवाद को, स्वाभाविक और सहनीय बनाया जा रहा है। नस्लवाद, सेक्सवाद, नव्य उपनिवेशवाद मूलत: नयी विश्व व्यवस्था के एजेण्ट के रूप में सक्रिय हैं। सामाजिक मुक्ति के नाम पर बहुराष्ट्रीय मीडिया एवं सूचना कंपनियों ने इच्छाओं और सहजजात वृत्तियों पर हमला बोला है। इच्छाओं के आधार पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक लाभ, कामुक शांति,वेश्यावृत्ति, जिस्म फरोशी तार्किक परिणति के रूप में सामने आई है।

ऐतिहासिक नजरिए से वेश्यावृत्ति के बारे में विचार करें तो यह पेशा संभवत: दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक है। बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। सेक्स के सभी विचारधारा के इतिहासकार इस पर एकमत हैं कि वेश्यावृत्ति की शुरूआत मंदिरों अथवा मंदिर क्षेत्र से हुई।
कालान्तर में रजवाडों की राजनीतिक हमलावर कार्रवाईयों ने इसे नयी ऊँचाईयों पर पहुँचाया। गुलाम व्यवस्था में गुलामों के मालिक गुलाम वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। असल में जो औरतें गुलाम थीं उनसे वेश्यावृत्ति करायी जाती थी। वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। वेश्यावृत्ति के विस्तार ने अन्य व्यक्ति के लिए संपदा और सामाजिक हैसियत की सृष्टि की।इसी क्रम में बच्चों की बिक्री का मामला भी सामने आया। बच्चों को श्रम के लिए बेचा जाता था।

सामाजिक विकास के क्रम में स्त्री के लिए कानून बनाए गए,उसे सम्मानित नजरिए से देखा जाने लगा। फलत: स्त्री शुचिता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।खासकर बेटी की शुचिता को सम्मानित नजरिए से देखा गया।पवित्र बेटी परिवार की संपत्ति मानी गई। कालान्तर में वेश्यावृत्ति ने अपना रूपान्तरण किया और मर्द की सामाजिक और शारीरिक जरूरतों की पूर्त्ति के रूप में अपना विकास किया। इसी क्रम में स्त्रियों के बीच में छोटे-बड़े के भेदभाव, ऊंच-नीच आदि की केटेगरी का उदय हुआ। स्त्री को नैतिकता आधार पर वर्गीकृत किया गया। ये सारे अंतर स्त्री की कामुक उपलब्धता पर आधारित थे। इसमें सबसे ऊपर विवाहिता को दर्जा दिया गया,इसके बाद शादी लायक पवित्र कन्या ,इन दोनों के बीच उपपत्नी,सबसे नीचे अविवाहित देवदासी और गुलाम औरत को स्थान दिया गया।

वेश्यावृत्ति के पेशे में वे औरतें ठेली गईं जो शोषित थीं। गुलाम थीं। कामुक संपत्ति थीं। जिनका सामाजिक उपहार के रूप में आदान-प्रदान होता था। जिन्हें तरह-तरह के काम दिलाने के बहानों से फुसलाया जाता था। सामन्ती दौर में स्त्री के विनिमय या उपहार स्वरूप देने की प्रथा ने स्त्री के शोषण को एक आकर्षक वैध व्यवस्था बनाया।

आधुनिक समाज में पुरूष के अधिकार और स्वतंत्रता की स्थापना हुई। स्त्री को किन्तु ये दोनों अधिकार नहीं मिले। वह पहले की तरह पराधीन बनी रही। इसके कारण वेश्यावृत्ति का एक खास किस्म की सामाजिक रूप से अवैध व्यवस्था के रूप में विकास किया गया।

आधुनिक काल के पहले वेश्यावृत्ति सामाजिक व्यवस्था का वैध हिस्सा थी। किन्तु आधुनिक काल में इसे समाज का अवैध हिस्सा घोषित कर दिया गया। सवाल उठता है कि वेश्यावृत्ति अवैध है तो इसके उन्मूलन के प्रयास क्यों सफल नहीं हुए,पूंजीवादी व्यवस्था ने वेश्यावृत्ति को क्यों बनाए रखा ?

क्या कारण है कि वेश्यावृत्ति खत्म होने की बजाय बढ़ी है। वेश्यावृत्ति के खात्मे का संघर्ष स्त्री मुक्ति के संघर्ष से अभिन्न रूप से जुड़ा है। पूंजीवादी समाज में वेश्यावृत्ति के फलने-फूलने का प्रधान कारण है सामाजिक तौर पर स्त्री का वस्तुकरण , विनिमय के रूप में उसका इस्तेमाल और स्त्री विरोधी भेदभावपूर्ण सामाजिक परिवेश। वेश्यावृत्ति सिर्फ स्त्री हिंसा या पितृसत्ता केकारण नहीं पैदा हो रही बल्कि उल्लिखित कारण उसके लिए  जिम्मेदार हैं। इसके अलावा उपनिवेशवाद,सैन्यवाद, भूमंडलीय संरचनाएं वेश्यावृत्ति के नए कारकों में प्रमुख हैं। वेश्यावृत्ति में वे औरतें ज्यादा हैं जो वंचित हैं,हाशिए पर हैं, विस्थापित हैं, श्रम क्षेत्र से निकाल दी गई  हैं।
(लेखक वामपंथी चिंतक और कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर हैं)

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Like On Facebook

Blog

  • अक़ीदत के फूल... - अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित कलाम... *अक़ीदत के फूल...* मेरे प्यारे आक़ा मेरे ख़ुदा के महबूब ! सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आपको लाखों स...
  • अक़ीदत के फूल... - अपने आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को समर्पित एक कलाम... *अक़ीदत के फूल...* मेरे प्यारे आक़ा मेरे ख़ुदा के महबूब ! सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम आपको लाख...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं