लिमटी खरे

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरदहस्त के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम नितिन गडकरी को पार्टी के हेवीवेट नेताओं को एक सूत्र में पिरोने में पीसना आने लगा है। यही कारण है कि जनाधार वाले सूबों में भी राज्य इकाई के अध्यक्षों के नामों पर अन्तिम मोहर नहीं लगाई जा सकी है। बाहर से तो पार्टी में मतभेद और मनभेद नहीं दिखाई पड रहे हैं, पर अन्दरूनी तौर पर सर फटव्वल की नौबत रही है। पार्टी के अन्दर के झगडे अब सडकों पर आने लगे हैं।

भाजपा के स्वयंभू लौहपुरूष का तगमा लेने वाले राजग के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवाणी को अब संघ के निर्देश पर शनै: शनै: पाश्र्व में ढकेलने की कवायद की जा रही है। आडवाणी की नाराजगी का आलम यह है कि भाजपा के स्थापना दिवस के कार्यक्रम में ही उन्होंने देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में रहते हुए किसी भी प्रोग्राम में शिरकत करना मुनासिब नहीं समझा। इतना ही नहीं टीम गडकरी की पहली बैठक में भी उन्होंने अपना मुंह सिल रखा था। इस दौरान उन्होंने उद्बोधन देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। अमूमन आडवाणी एसे मौकों पर पार्टी का मार्गदर्शन अवश्य ही किया करते हैं।

गडकरी के सामने सबसे बडी समस्या यह है कि वे सूबाई राजनीति से एकाएक उछलकर राष्ट्रीय परिदृश्य में गए हैं, जहां के रस्मो रिवाज से वे भली भान्ति परिचित नहीं हैं। अब तक हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष भी गडकरी के कदमताल से खुश नहीं हैं। आडवाणी के सुर में सुर मिलाते हुए राजनाथ सिंह, वेंकैया नायडू, मुरली मनोहर जोशी ने भी अघोषित तौर पर असहयोग आन्दोलन चलाया हुआ है। राजनाथ अपनी पूरी ताकत यूपी में अपने पसन्द के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने में झोंक रहे हैं तो मीडिया के दुलारे रहे नायडू ने भी मीडिया से पर्याप्त दूरी बना रखी है। एक समय में एक दिन में तीन तीन सूबों की मीडिया से रूबरू होने वाले नायडू अब अपने आप को आईसोलेटेड रखे हुए हैं। इसी तरह पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अपनी उपेक्षा से दुखी ही नज़र रहे हैं। वे भी पार्टी के कामों में दिलचस्पी लेने के बजाए अब अकादमिक सेमीनारों में अपना वक्त व्यतीत कर रहे हैं।

उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरूण जेतली के बीच चल रहे कोल्ड वार के चलते भी गडकरी बुरी तरह परेशान नज़र रहे हैं। अरूण जेतली के लिए पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी का प्यार जगजाहिर है, यही कारण है कि सुषमा स्वराज ने पार्टी के कामकाज से अपने आप को अलग थलग ही कर रखा है। कुल मिलाकर हेवीवेट नेताओं ने अपने अहम के चलते नए निजाम नितिन गडकरी की राह में शूल ही शूल बो दिए हैं।

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