हज़रत अबुल हसन ख़रकानी

Posted Star News Agency Saturday, November 10, 2012 , ,


फ़िरदौस ख़ान
अबुल हसन ख़रकानी प्रसिध्द सूफ़ी संत हैं। उनका असली नाम अबुल हसन हैं, मगर ख़रकान में जन्म लेने के कारण वे अबुल हसन ख़रकानी के नाम से विख्यात हुए। सुप्रसिध्द ग्रंथकार हज़रत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार के मुताबिक़ एक बार सत्संग में अबुल हसन ख़रकानी ने बताया कि उन्हें उस समय की बातें भी याद हैं, जब वे अपनी मां के गर्भ में चार महीने के थे।

अबुल हसन ख़रकानी एक चमत्कारी संत थे, लेकिन उन्होंने कभी लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया। वे कहते हैं कि अल्लाह अपने यश के लिए चमत्कार दिखाने वालों से चमत्कारी शक्तियां वापस ले लेता है। उन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग केवल लोककल्याण के लिए किया। एक बार उनके घर कुछ मुसाफिर आ गए जो बहुत भूखे थे। उनकी पत्नी ने कहा कि घर में दो-चार ही रोटियां हैं, जो इतने मेहमानों के लिए बहुत कम पड़ेंगी. इस पर अबुल हसन ख़रकानी ने कहा कि सारी रोटियों को साफ़ कपड़े से ढककर मेहमानों के सामने रख दो। उनकी पत्नी ने ऐसा ही किया। मेहमानों ने भरपेट रोटियां खाईं, मगर वे कम न पड़ीं. मेहमान तृप्त होकर उठ गए तो उनकी पत्नी ने कपड़ा हटाकर देखा तो वहां एक भी रोटी नहीं थी। इस पर अबुल हसन ख़रकानी ने कहा कि अगर और भी मेहमान आ जाते तो वे भी भरपेट भोजन करके ही उठते।

वे बाहरी दिखावे में विश्वास न रखकर कर्म में यकीन करते थे। वे कहते हैं कि जौ व नमक की रोटी खाने या टाट के वस्त्र पहन लेने से कोई सूफ़ी नहीं हो जाता। अगर ऐसा होता तो ऊन वाले और जौ खाने वाले जानवर भी सूफ़ी कहलाते। अबुल हसन ख़रकानी कहते हैं कि सूफ़ी वह है जिसके दिल में सच्चाई और अमल में निष्ठा हो। वे शिष्य नहीं बनाते थे, क्योंकि उन्होंने भी स्वयं किसी गुरु से दीक्षा नहीं ली थी। वे कहते थे कि उनके लिए अल्लाह ही सब कुछ है। मगर इसके साथ ही उनका यह भी कहना था कि सांसारिक लोग अल्लाह के इतने करीब नहीं होते जितने संत-फ़कीर होते हैं। इसलिए लोगों को संतों के प्रवचनों का लाभ उठाना चाहिए, क्योंकि संतों का तो बस एक ही काम होता है अल्लाह की इबादत और लोककल्याण के लिए सत्संग करना।

एक बार किसी काफिले को ख़तरनाक रास्ते से यात्रा करनी थी। काफिले में शामिल लोगों ने अबुल हसन ख़रकानी से आग्रह किया कि वे उन्हें कोई ऐसी दुआ बता दें, जिससे वे यात्रा की मुसीबतों से सुरक्षित रहें। इस पर उन्होंने कहा कि जब भी तुम पर कोई मुसीबत आए तो तुम मुझे याद कर लेना। मगर लोगों ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। काफी दूरी तय करने के बाद एक जगह डाकुओं ने काफिले पर धावा बोल दिया। एक व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा धन और कीमती सामान था, उसने अबुल हसन ख़रकानी का स्मरण किया। जब डाकू काफिले को लूटकर चले गए तो काफिले वालों ने देखा कि उनका तो सब सामान लुट चुका है, लेकिन उस व्यक्ति का सारा सामान सुरक्षित है। लोगों ने उससे इसका कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि उसने अबुल हसन ख़रकानी का स्मरण कर उनसे सहायता की विनती की थी। इस घटना के कुछ समय बाद जब काफिला वापस ख़रकानी आया तो लोगों ने अबुल हसन ख़रकानी से कहा कि हम ईश्वर को याद करते रहे, मगर हम लुट गए और उस व्यक्ति ने आपका नाम लिया तो वह बच गया। इस पर अबुल हसन ख़रकानी ने कहा कि तुम केवल मौखिक तौर पर अल्लाह को याद करते हो, जबकि संत सच्चे दिल से ईश्वर का स्मरण करते हैं। अगर तुमने मेरा नाम लिया होता तो मैं तुम्हारे लिए अल्लाह से दुआ करता।

एक बार वे अपने बाग की खुदाई कर रहे थे तो वहां से चांदी निकली। उन्होंने उस जगह को बंद करके दूसरी जगह से खुदाई शुरू की तो वहां से सोना निकला। फिर तीसरी और चौथी जगह से खुदाई शुरू की तो वहां से भी हीरे-जवाहरात निकले, लेकिन उन्होंने किसी भी चींज को हाथ नहीं लगाया और फरमाया कि अबुल हसन इन चीज़ों पर मोहित नहीं हो सकता। ये तो क्या अगर दोनों जहां भी मिल जाएं तो भी अल्लाह से मुंह नहीं मोड़ सकता। हल चलाते में जब नमाज़ का वक्त आ जाता तो वे बैलों को छोड़कर नमाज़ अदा करने चले जाते। जब वे वापस आते तो ज़मीन तैयार मिलती।

वे लोगों को अपने कर्तव्यों का निष्ठा से पालन करने की सीख भी देते थे। अबुल हसन ख़रकानी और उनके भाई बारी-बारी से जागकर अपनी मां की सेवा करते थे। एक रात उनके भाई ने कहा कि आज रात भी तुम ही मां की सेवा कर लो, क्योंकि मैं अल्लाह की इबादत करना चाहता हूं। उन्होंने अपने भाई की बात मान ली। जब उनके भाई इबादत में लीन थे, तब उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि ''अल्लाह ने तेरे भाई को मोक्ष प्रदान किया और उसी के माध्यम से तुझे भी मोक्ष दिया है।'' यह सुनकर उनके भाई को बड़ी हैरानी हुई और उन्होंने कहा कि मैंने अल्लाह की इबादत की इसलिए इसका पहला हकदार तो मैं ही था। तभी उसे आवाज सुनाई दी कि ''तू अल्लाह इबादत करता है, जिसकी उसे ज़रूरत नहीं है। अबुल हसन ख़िरकानी अपनी मां की सेवा कर रहा है, क्योंकि बीमार वृध्द मां को इसकी बेहद ज़रूरत है।'' यानी, अपने माता-पिता और दीन-दुखियों की सेवा करना भी इबादत का ही एक रूप है। वे कहते थे कि मुसलमान के लिए हर जगह मस्जिद है, हर दिन जुमा है और हर महीना रमज़ान है। इसलिए बंदा जहां भी रहे अल्लाह की इबादत में मशगूल रहे। एक रोज़ उन्होंने गैबी आवाज़ सुनी कि ''ऐ अबुल हसन जो लोग तेरी मस्जिद में दाख़िल हो जाएंगे उन पर जहन्नुम की आग हराम हो जाएगी और जो लोग तेरी मस्जिद में दो रकअत नमाज़ अदा कर लेंगे उनका हश्र इबादत करने वाले बंदों के साथ होगा।''

अपनी वसीयत में उन्होंने ज़मीन से तीस गज़ नीचे दफ़न होने की ख्वाहिश ज़ाहिर की थी। अबुल हसन ख़रकानी यह भी कहते थे कि किसी भी समाज को शत्रु से उतनी हानि नहीं पहुंचती, जितनी कि लालची विद्वानों और गलत नेतृत्व से होती है। इसलिए यह ज़रूरी है कि लोग यह समझें कि हकीकत में उनके लिए क्या सही है और क्या गलत।

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