डॉ. वेदप्रताप वैदिक
क्या आपको पता है कि भारत में कितने लोग रोज़ भूखे पेट सोते हैं ? क्या आपको यह भी पता है कि दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोग किस देश में रहते हैं ? आपको यह जानकर दुख होगा कि भारत के कम से कम 50 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं याने उन्हें रोज़ भर पेट भोजन भी नहीं मिलता| भोजन याने क्या ? सिर्फ दाल-रोटी !! उन्हें फल-फूल और माल-मिठाई मिलना तो दूर रहा, घी-तेल में बनी साग-सब्जी मिल जाए तो उनकी दीवाली हो जाती है| ऐसे गरीब लोग जितने भारत में हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं| चीन में ऐसे गरीबों की संख्या 10 करोड़ है जबकि भारत में उनकी संख्या 40 से 50 करोड़ आंकी जाती है| इन गरीबों के लिए भारत सरकार अब खाद्य सुरक्षा का कानून बनानेवाली है| यह कानून उतना ही क्रांतिकारी माना जा रहा है, जितना सर्व-शिक्षा का कानून या सूचना के अधिकार का कानून !यदि देश के 40-50 करोड़ लोगों की खाद्य-सुरक्षा सचमुच संभव हो जाए तो क्या कहने ? अपनी सारी कमियों के बावजूद भारत शायद दुनिया का सबसे बढि़या लोकतंत्र् कहलाने लगे| लेकिन क्या यह संभव है ? यह बहुत मुश्किल है| इसके कई कारण हैं| पहला तो यही कि भारत सरकार खाद्य सुरक्षा का बड़ा अजीब-सा अर्थ लगा रही है| उसके एक मंत्रि-समूह का कहना है कि यदि पांच आदमियों के एक परिवार को 35 किलो अनाज प्रति माह मिल जाए तो उसकी खाद्य-सुरक्षा हो जाएगी याने प्रति व्यक्ति 7 किलो प्रतिमाह अर्थात यदि हर व्यक्ति को रोज़ लगभग ढाई सौ ग्राम अनाज मिल जाए तो काफी होगा| इन मंत्रियों से कोई पूछे कि दिन भर में पाव भर चावल या पाव भर गेहूं खाकर कोई जिंदा कैसे रह सकता है ? खाद्य का अर्थ क्या सिर्फ गेहूं और चावल ही होता है ? आपको खाने में दाल-सब्जी, मसाले, तेल-घी, दूध-दही वगैरह क्या कुछ नहीं चाहिए ? कोरा अनाज खाकर क्या शरीर इस लायक रह सकता है कि कोई आदमी आठ-दस घंटे रोज़ काम कर सके ? हम अपने लोगों को ऐसी खाद्य-सुरक्षा का वादा कर रहे हैं, जो भारत को मरियल लोगों का राष्ट्र बना देगी| यह कैसी खाद्य-सुरक्षा है ?


भूखे मरते लोगों को जो अनाज दिया जाएगा, वह भी मुफ्त नहीं मिलेगा| उनसे तीन रू. किलो के हिसाब से पैसे लिये जाएंगे| जितना अनाज सस्ते दाम पर बेचने का वादा सरकार करती है, उससे कहीं ज्यादा तो गोदामों और मैदानों में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है| अनाज के मामले में भारत आत्म-निर्भर हो गया है बल्कि वह उसे निर्यात भी करता है| यदि देश के 50 करोड़ लोगों को, जिनकी दैनिक आय सिर्फ 10 रू. से 20 रू. तक है, यह अनाज मुफ्त मिलने लगे तो कैसा रहेगा ? जैसे हवा और पानी उन्हें मुफ्त मिलते हैं, वैसे ही अनाज भी क्यों नहीं मिलता ? जैसे हवा और पानी के बिना आदमी जिंदा नहीं रह सकता, वैसे ही अनाज के बिना भी जिंदा नहीं रह सकता| मुफ्त अनाज देकर सरकार और समाज अपने कमजोर नागरिकों के जीवन के मूलभूत अधिकार की रक्षा करेंगे| इस अधिकार की रक्षा पर कितना खर्च होगा ? मोटा-मोटा हिसाब लगाएं तो हर साल 10-12 हजार करोड़ रू. से ज्यादा खर्च नहीं होगा| क्या यह ऐसी राशि है कि भारत सरकार खर्च नहीं कर सकती ? सच पूछा जाए तो यह कुछ भी नहीं है| दिल्ली के नए हवाई अड्रडे पर 10 हजार करोड़ रू. खर्च हो रहे हैं| 45 हजार करोड़ रू. कॉमनवेल्थ खेलों पर हो रहे हैं| 5 लाख करोड़ रू. की छूट अभी-अभी हमारी सरकार ने बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को दी है| वह चाहे तो देश के गरीबों को अनाज के साथ-साथ अन्य जरूरी खाद्य पदार्थ भी मुफ्त दे सकती है|


लेकिन वह ऐसा क्यों करे ? वह तो इस फेर में है कि गरीबों की संख्या ही घटाकर दिखाए| सक्सेना कमेटी के 50 करोड़ और तेंदुलकर कमेटी के 42 करोड़ के आंकड़े पर उसका भरोसा नहीं है| वह सेनगुप्ता कमेटी के 83 करोड़ (20 रू. रोज से कमवाले लोग) के आंकड़े को भला सही क्यों मान लेगी ? वह गरीबों के इन आंकड़ों घटाकर 20-25 करोड़ तक ले जाना चाहती है ताकि खाद्य-सुरक्षा के नाम पर उसे कम से कम खर्च करना पड़े| यदि वह इन 20-25 करोड़ लोगों के भी भोजन-पानी का ठीक से इंतजाम कर सके तो वह अगला चुनाव तो धमाके से जीत ही जाएगी, उसे भारत की सबसे सफल सरकार के तौर पर जाना जाएगा| लेकिन उसे अपनी खाद्य-सुरक्षा की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा| देश के 80 प्रतिशत बच्चे खून की कमी के शिकार हों, 80 करोड़ लोग खुले में शौच करते हों और मध्यप्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्यों में दुनिया के सबसे फिसड्रडी राष्ट्रों की तरह कुपोषण फैला हुआ हो ओर देश की आधी से अधिक जनता को आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध न हो, वहां हम कौनसी सुरक्षा का ढोल पीट रहे हैं ? जैसे वंचितों के बच्चों को पेम-पट्रटी पकड़ा देना भर सर्व-शिक्षा नहीं है, वैसे ही हर गरीब को रोज़ पाव भर अनाज पकड़ा देना खाद्य-सुरक्षा नहीं है| जैसे सर्व-शिक्षा में प्रत्येक छात्र् को समान भोजन, समान वस्त्र् और समान आवास देना आवश्यक है, वैसे ही खाद्य-सुरक्षा में संतुलित भोजन, स्वच्छ शौच और चिकित्सा की सुविधा देना भी जरूरी है| यह तो गरीबी का तात्कालिक उपचार है लेकिन उसका पक्का इलाज़ तो कुछ और ही है| ‘वह है, हाड़-तोड़ काम और कुर्सीतोड़ काम का फासला घटाना याने शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम की खाई को पाटना ! यह खाई जितनी गहरी भारत में है, दुनिया के किसी भी देश में नहीं है| जातिवाद इसका परिणाम भी है और कारण भी है| भारत के गरीब कौन हैं ? हाड़-तोड़ काम करनेवाले और भारत के अमीर कौन हैं ? कुर्सियों और गदि्रदयों पर बैठकर काम करनेवाले| यदि यह खाई पट सके, जो कि समाजवादी व्यवस्था (और काफी हद तक पूंजीवादी व्यवस्था ) में भी पटती रही है तो भारत में गरीबी याने भुखमरी नामक बीमारी बची ही क्यों रहेगी ? भूखों मरते भारत का इलाज बस यही है| अगर हम यह असली इलाज नहीं करेंगे तो भारत कितना ही मालदार हो जाए, कंगाली का भूत उसके सिर पर नाचता रहेगा|

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