फ़िरदौस ख़ान
नई दिल्ली.  स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज लाल क़िले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया और देशवासियों को संबोधित किया.  पेश है प्रधानमंत्री के भाषण का मूल पाठ...

प्यारे देशवासियो,भाइयो, बहनो और बच्चो,
हमारी आज़ादी की 63वीं सालगिरह पर मैं आज आप सबको मुबारकबाद देता हूं। 15 अगस्त, 1947 को पं. जवाहरलाल नेहरू जी ने इस ऐतिहासिक लालकिले पर तिरंगा फहराते हुए अपने आप को भारत का प्रथम सेवक कहा था। मैं आज उसी भावना के साथ आपको संबोधित कर रहा हूं। 

अभी कुछ दिन पहले लद्दाख में बादल फटने से बहुत से लोगों की जानें गईं। मैं उन सबके परिवारों और संबंधियों के लिए अपनी हार्दिक समवेदना प्रकट करता हूं। दुख की इस घड़ी में सारा देश लद्दाख के लोगों के साथ है। मैं यह भी भरोसा दिलाना चाहता हूं कि लद्दाख में पुनर्वास के लिए भारत सरकार हर संभव कदम उठाएगी। 

पिछले साल 15 अगस्त को जब मैंने आपके सामने अपनी बात रखी थी, उस वक़्त  हमारा देश कई मुश्किलों का सामना कर रहा था। देश के कई हिस्सों में सूखे के हालात थे। दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी का भी हम पर असर था। मुझे यह कहते हुए खुशी है कि हमने डटकर इन कठिन परिस्थितियों का मुकाबला किया। बहुत सी मुश्किलों के बावजूद, हमारे आर्थिक विकास की दर दुनिया के ज़्यादातर देशों से बेहतर रही। इससे हमारी अर्थव्यवस्था की मजबूती ज़ाहिर होती है। 
यह मजबूती केवल पिछले एक साल में ही नहीं, बल्कि पिछले कई सालों की हमारी आर्थिक प्रगति में साफ दिखाई देती है। अब भारत दुनिया के सबसे तेज आर्थिक विकास करने वाले देशों में गिना जाता है। दुनिया का सबसे बड़ा हमारा लोकतंत्र दूसरे देशों के लिए एक मिसाल बन गया है। हमारे देश में हर नागरिक को अपनी आवाज़ उठाने का हक़ है । आज दुनिया भर में हमारा आदर और सम्मान है। हमारी बात अंतर्राष्ट्रीय  मंचों पर गौर से सुनी जाती है। 

भारत की कामयाबी में आप सबका योगदान है। हमारे कामगार, हमारे मज़दूर, हमारे किसान भाइयों की कड़ी मेहनत हमारे देश को इस मुकाम पर लाई है। मैं आज खास तौर पर, अपने सैनिकों को सलाम करता हूं, जिनकी बहादुरी से हमारी सरहदें सुरक्षित हैं। मैं उन सभी शहीदों को श्रध्दांजलि देता हूं, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। 

भाइयो और बहनो, हम एक ऐसे नए भारत का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें सबकी बराबर की हिस्सेदारी हो। एक ऐसा भारत जो समृध्द हो, जिसके सभी नागरिक अमन-चैन के माहौल में सम्मान की ज़िंदगी बसर कर सकें। ऐसा भारत, जिसमें लोकतांत्रिक तरीकों से हर मुश्किल को हल किया जाए। एक ऐसा भारत, जिसमें हरेक नागरिक के बुनियादी अधिकार सुरक्षित हों। इस दिशा में पिछले कुछ सालों में हमने कई बड़े क़दम उठाए हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हर व्यक्ति को साल में सौ दिन के रोज़गार का सहारा मिला है। सूचना का अधिकार अधिनियम हमारे नागरिकों को जागरूक करने में मदद कर रहा है।  इस साल हमारी सरकार ने शिक्षा के अधिकार का क़ानून लागू किया है, जिससे हर भारतीय को देश की आर्थिक प्रगति का लाभ उठाने और उसमें योगदान देने में मदद मिलेगी। भारत के निर्माण में महिलाओं की बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए हमने संसद और राज्य विधान-मंडलों में महिला आरक्षण के लिए पहल की है। इसके अलावा, स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। 

हमारे देश की तमाम मज़बूतियों के बावजूद, आज हमारे सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं। आज के दिन हमें यह निश्चय करना चाहिए कि इन चुनौतियों का सामना हम एकजुट होकर करेंगे। हमारे देश में अक्सर धर्म, प्रांत, जाति और भाषा के नाम पर लोगों में फूट पड़ जाती है। हमें संकल्प करना चाहिए कि हम किसी भी हालत में अपने समाज को बंटने नहीं देंगे। उदारता और सहनशीलता हमारी परंपरा के विशेष अंग रहे हैं। हमें इस परंपरा को और मज़बूत करने की ज़रूरत है। आर्थिक विकास के साथ-साथ हमारे समाज की संवेदनशीलता भी बढ़नी चाहिए। हमारी विचारधारा आधुनिक और प्रगतिशील होनी चाहिए। 

किसानों की भलाई और कृषि की पैदावार बढ़ाने पर हमारी सरकार का विशेष ज़ोर रहा है। साल 2004 में सत्ता में आने के बाद हमने महसूस किया कि उसके पहले के 7-8 सालों में भारत में कृषि की हालत संतोषजनक नहीं थी। हमारी सरकार ने कृषि क्षेत्र में सरकारी निवेश पर ज़ोर दिया है। पैदावार बढ़ाने के लिए नई योजनाएं चलाई गईं। इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ज़िला स्तर पर कृषि उत्पादन की योजना बने। मुझे यह कहते हुए खुशी है कि पिछले कुछ सालों में हमारे कृषि विकास की दर में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन हम अपने लक्ष्य से आज भी दूर हैं। हमें और कड़ी मेहनत करने की ज़रूरत है, ताकि हम भारत की कृषि विकास की दर को 4 प्रतिशत तक पहुंचा सकें। 

भाइयो और बहनो, हमारी सरकार एक ऐसी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था बनाना चाहती है, जिसमें हमारा कोई भी नागरिक भूखा न रहे। इसके लिए हमें ज्यादा पैदावार चाहिए, जो हम कृषि उत्पादकता बढ़ाकर ही हासिल कर सकते हैं। कृषि के क्षेत्र में हरित क्रांति के बाद हमारे देश में कोई बड़ा तकनीकी बदलाव नहीं आया। हमें ऐसी तकनीकें चाहिए जो dry land agriculture की ज़रूरतों को ध्यान में ख्याल रखें। साथ ही, हमें कृषि के क्षेत्र में बदलते मौसम, पानी के गिरते स्तर, भूमि की घटती quality  जैसी नई चुनौतियों से भी निपटना है। भारत के कृषि इतिहास में डॉ. नोर्मन बोरलॉग का एक विशेष स्थान है। क़रीब  40-50 साल पहले, उन्होंने गेहूं के नए और ज़्यादा उत्पादक बीजों की खोज की थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी जी के नेतृत्व में इन बीजों को अपनाकर भारत ने हरित क्रांति हासिल की थी। मुझे यह कहते हुए खुशी है कि भारत में बोरलॉग इंस्टीटयूट फॉर साउथ एशिया की स्थापना की जा रही है। यह संस्था भारत एवं दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के किसानों को अच्छे और नए किस्म के बीज और कृषि की नई तकनीकें कम समय में उपलब्ध कराने में मदद करेगी। 

हमने इस बात का भी हमेशा ख्याल रखा है कि किसानों को फ़सलों  के वाजिब दाम मिलें, ताकि वे पैदावार में बढ़ोतरी करने के लिए प्रोत्साहित हो सकें। पिछले छह  सालों में समर्थन मूल्यों में लगातार बढ़ोतरी की गई है। जहां वर्ष 2003-04 में गेहूं का समर्थन मूल्य 630 रुपये प्रति क्विंटल था, वहीं पिछले साल तक इसे बढ़ाकर  1100 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। धान में भी यह बढ़ोतरी 550 रुपये प्रति क्विंटल से 1000 रुपये प्रति क्विंटल हुई। पर किसानों को फसल के ज्यादा दाम मिलने का एक असर यह होता है कि बाज़ार में भी खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ जाते हैं। 

मैं जानता हूं कि पिछले कुछ महीनों से आप बढ़ती हुई कीमतों से परेशान हैं। बढती क़ीमतों का सबसे ज्यादा असर हमारी गरीब जनता पर पड़ता है, खास तौर पर तब, जब अनाज, दाल, सब्जी जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों के दाम बढ़ते हैं । इसीलिए हमने इस बात का पूरा ख्याल रखा है, कि बाज़ार में बढ़ते हुए दामों का बोझ हमारे गरीब भाई-बहनों को न उठाना पड़े । मैं आज विस्तार से बढती क़ीमतों के कारण नहीं गिनाना चाहता, लेकिन मैं इतना ज़रूर कहना चाहूंगा, कि हम महंगाई को कम करने की हर मुमकिन कोशिश में लगे हैं और मुझे भरोसा है कि हमें इसमें कामयाबी भी मिलेगी। 

यह आसानी से समझ आने वाली बात है, कि कोई भी व्यक्ति या संस्था लंबे समय तक अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च नहीं कर सकती चाहे वह सरकार ही क्यों न हो । हमारी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था को सूझ-बूझ के साथ चलाएं, ताकि आने वाले वर्षों में कर्ज़ की वजह से हमारे विकास में बाधा न आए । हम अपने पेट्रोलियम पदार्थों की खपत का करीबन 80 फीसदी आयात करते हैं । वर्ष 2004 के बाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें जितनी बढी हैं, उसकी तुलना में भारत में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बहुत कम वृध्दि हुई है । पेट्रोलियम पदार्थों पर दिए जाने वाले अनुदान की राशि हर साल बढ़ती ही जा रही है । ऐसी स्थिति में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी करना ज़रूरी हो गया था । अगर ऐसा नहीं किया जाता, तो अनुदान के भार को बरदाश्त करना हमारे बजट के बस के बाहर हो जाता और गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के हमारे कार्यक्रमों पर खराब असर पड़ सकता था। 

आज़ादी के 63 सालों में भारत ने विकास के रास्ते पर एक लम्बा सफ़र तय किया है । लेकिन हमारी मंज़िल अब भी दूर है । आज भी हमारे बहुत से देशवासी गरीबी, भूख और बीमारी से परेशान हैं । वर्ष 2004 में, जब हमारी सरकार बनी थी, तब हमने संकल्प लिया था कि हम एक प्रगतिशील सामाजिक नीति के तहत एक नए भारत का निर्माण करेंगे । हमारा मक़सद था कि देश के विकास का फायदा आम आदमी तक ज़रूर पहुंचे । हमने ऐसे कार्यक्रम शुरू किए, जिनसे विशेष रूप से समाज के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों का कल्याण हो । हम आज भी गरीबों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं तथा अन्य पिछड़े तबकों की भलाई के लिए दृढसंक़ल्प हैं । पर, आज हमें अपने मक़सद तक पहुंचने के लिए बहुत से नए कार्यक्रम शुरू करने की ज़रूरत नहीं है । बल्कि ज़रूरत इस बात की है कि जो योजनाएं हमने शुरू की हैं, उन्हें हम अधिक प्रभावी ढंग से लागू करें, जिससे कि उनमें भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग की गुंजाइश न रहने पाए । इस काम को हम राज्य सरकारों, पंचायती राज संस्थाओं तथा civil society groups की भागीदारी में करना चाहते हैं । 

धर्मनिरपेक्षता हमारे लोकतंत्र की एक आधारशिला है । सभी धर्मों को बराबर का दर्जा देना और उनका आदर करना हमारे देश और समाज की परंपरा रही है । सदियों से भारत में नए धर्म आते और फलते-फूलते रहे हैं । धर्मनिरपेक्षता हमारी संवैधानिक ज़िम्मेदारी भी है । हमारी सरकार सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए वचनबध्द है । साथ ही, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनकी खास ज़रूरतों का ख्याल रखना भी हम अपना फर्ज़ समझते हैं । इसीलिए, हमने अपने अल्पसंख्यक भाई-बहनों की भलाई के लिए पिछले 4 सालों में कई योजनाएं शुरू की हैं । इनमें अल्पसंख्यक बच्चों के लिए वज़ीफे और ऐसे जिलों के विकास के लिए खास प्रोग्राम शामिल हैं, जहां हमारे अल्पसंख्यक भाई-बहनों की संख्या अधिक है । इन योजनाओं के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। हमारी सरकार इस काम को और तेज़ी से आगे बढ़ाएगी ।

पिछले 6 सालों से हम शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं । इन दो क्षेत्रों का सुधार inclusive विकास की हमारी रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आने वाले सालों में तेज़ आर्थिक विकास के लिए भी यह बहुत ज़रूरी है। आज़ादी के बाद इन दो क्षेत्रों पर हम उतना ध्यान नहीं दे सके जितना जरूरी था,  लेकिन ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में हमने इस स्थिति को बदलने की कोशिश की है। आज प्राथमिक शिक्षा तक करीब-करीब हर बच्चे की पहुंच है । अब हमें माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर  ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है । साथ ही हर स्तर पर हमें शिक्षा की   quality में सुधार लाना है । हमारा यह प्रयास है कि हर बच्चे को, चाहे वह अमीर हो, या गरीब, चाहे वह समाज के किसी भी तबके का हो, ऐसी शिक्षा मिले, जिससे उसकी शख्सियत का सही विकास हो सके और वह देश का एक जिम्मेदार नागरिक बन सके । शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए हमने जो नई योजनाएं पिछले 6 सालों में शुरू की हैं, उनको हम पूरी मेहनत और ईमानदारी से और राज्य सरकारों के सहयोग से लागू करते रहेंगे । उच्च शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्रों में दो अलग-अलग आयोग गठित किए जाने के लिए हमारी सरकार जल्द ही संसद में विधेयक लाएगी, ताकि इन क्षेत्रों में और सुधार हो सके ।  

हमारे नागरिकों की अच्छी सेहत के लिए सिर्फ पौ31ष्टिक भोजन और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं ही काफी नहीं हैं। हमें अपने गांवों, कस्बों और शहरों को साफ-सुथरा रखने पर भी जोर देना चाहिए। ऐसा किए बिना, बहुत-सी बीमारियों को रोक पाना हमारे लिए मुमकिन नहीं है। सच तो यह है कि हमारा देश इस मामले में बहुत पीछे है। भारत के हर नागरिक की यह बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह अपने आस-पास साफ-सफाई बनाए रखे। मैं चाहूंगा कि एक साफ-सुथरा भारत बनाने के अभियान के तहत हम शुरू से ही स्कूलों में बच्चों को सफाई की अहमियत समझाएं। मैं राज्य सरकारों, पंचायती राज संस्थाओं, civil society groups और आम नागरिकों से अपील करता हूं कि वे इस अभियान को कामयाब बनाएं ।

भाइयो और बहनो, गांधी जी ने कहा था कि हमारी धरती पर हरेक इंसान की जरूरतों को पूरा करने के लिए तो सब कुछ है, मगर उसके लालच को पूरा करने के लिए नहीं। प्राकृतिक संसाधनों का बिना सूझ-बूझ उपयोग करने की वजह से आज सारी दुनिया बदलते मौसम की समस्या से निपटने की कोशिश कर रही है। हमें अपने प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल सावधानी और किफायत से करना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने जंगलों, नदियों, पहाड़ों की सुरक्षा करना हमारी ख़ास ज़िम्मेदारी है। हमारी सरकार की कोशिश रहेगी कि देश के आर्थिक विकास की योजनाओं में पर्यावरण की ज़रूरतों का पूरा ख्याल रखा जाए।

हमारे बुनियादी ढांचे में काफ़ी कमियां हैं, जिनका हमारे आर्थिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है। उद्योगों के लिए बिजली की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पाती है। हमारी सड़कें, बंदरगाह और हवाई अड्डे विश्व स्तर के नहीं हैं। हम बिजली का उत्पादन बढाने और अपनी सड़कों, बन्दरगाहों और हवाई अड्डों को बेहतर बनाने की लगातार कोशिश करते रहे हैं। अच्छा बुनियादी ढांचा बनाने के लिए जितने संसाधन चाहिए, उतने सरकार के लिए अकेले जुटा पाना मुश्किल है। इसीलिए, इस काम में हमने निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए व्यवस्थाएं बनाने की कोशिश की है। व¬र्ष 2004 के बाद हमने अपना बुनियादी ढांचा मज़बूत करने के लिए जो प्रयास किए हैं, उनके नतीजे अब सामने आने लगे हैं। करीब डेढ महीने पहले मैंने दिल्ली हवाई अड्डे के नए टर्मिनल को देश को समर्पित किया। यह एक शानदार टर्मिनल है, जो एक रिकार्ड समय में पूरा किया गया है। हम अपने बुनियादी ढांचे में सुधार लाने के लिए इस तरह की कोशिशें जारी रखेंगे।

हमारे देश की  आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर हाल ही में बहुत कुछ कहा जाता रहा है। यदि भारत के किसी हिस्से में कानून-व्यवस्था बिगड़ती है, या अमन-चैन की कमी होती है, तो उसका खामियाज़ा आम आदमी को भुगतना पड़ता है। इसलिए किसी भी सरकार की यह अहम जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नागरिकों को एक अच्छी कानून व्यवस्था के तहत शांति और सद्भावना के साथ अपनी जन्दगी जीने और अपनी आजीविका चलाने का मौका दे।  हमारी आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है। पिछले कुछ दिनों में नक्सलवादियों के हमलों में हमारे सुरक्षा बलों के जो जवान और अधिकारी शहीद हुए, मैं उन्हें श्रध्दांजलि देता हूं। मैंने पहले भी यह कहा है  और आज फिर कहता हूं कि हमारी सरकार अपने हरेक नागरिक की सुरक्षा की जिम्मेदारी को पूरा करने में कोई कमी नहीं आने देगी। हिंसा का रास्ता अख्तियार करने वालों से हम सख्ती से निपटेंगे। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कानून का राज कायम रखने के लिए हम राज्य सरकारों की हर तरह से मदद करेंगे। मैं एक बार फिर नक्सलवादियों से अपील करता हूं कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर सरकार के साथ बातचीत करें और सामाजिक और आर्थिक विकास तेज करने में हमारा साथ दें। अभी कुछ दिन पहले मैंने नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक बैठक की थी। उस बैठक में नक्सलवाद से निपटने के लिए जो सहमति बनी है, उस पर केन्द्र सरकार पूरी तरह अमल करेगी। उस बैठक में मैंने एक बात कही थी, जिसे आज मैं दोहराना चाहूंगा। नक्सलवाद की चुनौती का सामना करने के लिए  केन्द्र और  राज्यों को पूरी तरह से एकजुट होकर काम करना होगा। केन्द्र के सहयोग और राज्यों के आपसी तालमेल के बिना इस गंभीर समस्या से नपटना किसी भी राज्य के लिए बहुत मुश्किल है। हम सभी को चाहिए कि अपने निजी और राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर इस चुनौती का सामना करें।

जैसा कि मैंने पहले भी कई बार कहा है, ज़्यादातर नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र विकास के मामले में बहुत पिछड़े हुए हैं। इनमें वे क्षेत्र भी हैं, जहां ज़्यादातर हमारे आदिवासी भाई-बहन रहते हैं। इन क्षेत्रों के प्रति सालों से बरती गई लापरवाही को हम खत्म करना चाहते हैं। इन क्षेत्रों के  विकास के लिए मैंने योजना आयोग को एक विस्तृत योजना बनाने को कहा है, जिस पर हम पूरी तरह से अमल करेंगे। हमारा यह भी प्रयास है कि  हमारे आदिवासी भाई-बहन देश के विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। वे सदियों से वन उपज पर निर्भर रहे हैं और इस निर्भरता का अंत आजीविका के नए साधन बनाए बिना नहीं होना चाहिए। उनसे जो जमीन विकास की योजनाओं के लिए ली जाती है, उसके बदले में उचित मुआवजे के साथ इन क्षेत्रों के विकास में भी उनकी हिस्सेदारी होनी चाहिए।

इन क्षेत्रों के संबंध में, मैं एक बात और कहना चाहूंगा । यहां पर प्रशासन को संवेदनशील बनाना विशेष रूप से आवश्यक है। इन क्षेत्रों में जो सरकारी अधिकारी काम करते हैं, उन्हें मेहनती होने के साथ-साथ हमारे आदिवासी भाई-बहनों की खास जरूरतों का भी ख्याल रखना होगा। मेरी राज्य सरकारों से यह उम्मीद है कि वे इस बात पर ख़ास ध्यान देंगी।

उत्तर-पूर्व के राज्यों के प्रति हमारी एक विशेष जिम्मेदारी है। हम उसे निभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। अभी हाल में उत्तर-पूर्व में कुछ अप्रिय घटनाएं हुईं। मैं उत्तर पूर्व के सभी राजनैतिक दलों और गुटों से यह कहना चाहता हूं कि प्रांत या जनजाति के नाम पर विवाद करने से हम सबका नुकसान ही होगा। उलझे हुए मुद्दों को सुलझाने के लिए सिर्फ बातचीत ही एक तरीका है। जहां तक केन्द्र सरकार का सवाल है, हम ऐसी हर बातचीत के सिलसिले को बढावा देने के लिए तैयार हैं, जिससे समस्याओं को सुलझाने की दिशा में आगे बढा ज़ा सके।

जम्मू-कश्मीर में भी हम हर उस व्यक्ति या गुट से बातचीत करने को तैयार हैं, जो हिंसा का रास्ता छोड़ दे। कश्मीर भारत का एक अभिन्न हिस्सा है। इस दायरे के अंदर हम हर ऐसी बातचीत को आगे बढाने को तैयार हैं, जिससे जम्मू-कश्मीर के आम आदमी की सत्ता में हिस्सेदारी और सहूलतें बढें। अभी हाल में जम्मू-कश्मीर में खून-खराबे में कुछ नौजवानों की जानें गईं जिसका मुझे बेहद ही अपएसोस है। बरसों के खून-खराबे का अब अंत होना चाहिए। इस खून-खराबे से किसी को कुछ हासिल नहीं होने वाला। मेरा मानना है कि भारत के लोकतंत्र में इतनी उदारता है कि वह किसी भी हिस्से और गुट की मुश्किलों को हल कर सके। अभी हाल ही में मैंने जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों के साथ एक बैठक की है। हम इस सिलसिले को और आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे। मैं अपने देशवासियों से, खासतौर पर उन नागरिकों से, जो जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में रहते हैं, यह कहना चाहूंगा कि वे लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से अपनी और देश की बेहतरी के लिए हमारे साथ मिलकर काम करें।

हम अपने पड़ोसी देशों में अमन-चैन और खुशहाली चाहते हैं। पड़ोसी देशों से हमारे जो भी मतभेद हैं, उन्हें हम बातचीत के ज़रिए हल करना चाहते हैं। जहां तक पाकिस्तान का ताल्लुक है, हम उनसे ये उम्मीद करते हैं कि वे अपनी ज़मीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ दहशतगर्दी की गतिविधियों के लिए नहीं होने देंगे। पाकिस्तान के  साथ हमारी जो भी बातचीत हुई है, उसमें हम इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो बातचीत का कोई भी सिलसिला बहुत आगे नहीं बढ़ पाएगा।

मैं एक बात और कहना चाहता हूं, जो हमारी संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं से जुड़ी हुई है। पिछले कुछ दिनों में हमारी राजनीति में कठोर बातों और कड़वे शब्दों का इस्तेमाल बढ गया है। यह हमारी उदारता, विनम्रता और सहनशीलता की परंपरा के विरुध्द है। लोकतंत्र में, एक प्रगतिशील समाज में आलोचना का अपना स्थान है। पर आलोचना मर्यादा की सीमा में होनी चाहिए। हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस में परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लिए गुंजाइश है और होनी भी चाहिए। मैं सभी राजनीतिक दलों से अनुरोध करता हूं  कि वे इस विषय पर विचार करें।

क़रीब डेढ़ महीने के बाद दिल्ली में Commonwealth Games  शुरू होंगे। यह पूरे देश के लिए और ख़ासकर दिल्ली के लिए एक गौरवपूर्ण अवसर है। मुझे विश्वास है कि सभी देशवासी इन खेलों को एक रा¬ष्ट्रीय त्यौहार के रूप में लेकर उन्हें सफ़ल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। Commonwealth Games का सफ़ल आयोजन दुनिया के लिए एक और इशारा होगा कि हमारा भारत आत्मविश्वास के साथ तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

हमारा भविष्य उज्ज्वल है और वो दिन दूर नहीं जब हमारे सपने सच होंगे। आइए, हम सब मिलकर आज़ादी की सालगिरह पर यह प्रण करें, कि हम अपने देश का नाम हमेशा रोशन रखेंगे। प्रगति और खुशहाली के रास्ते पर, आइए हम सब मिलकर आगे क़दम बढाएं।
प्यारे बच्चो, आप सब मेरे साथ मिलकर जय हिन्द बोलिए-
जय हिन्द !
जय हिन्द !
जय हिन्द !

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