प्रबीर कुमार बसु
देश की खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि क्षेत्र का महत्व बहुत बड़ा है। देश के कुल कामकाजी लोगों की 58 प्रतिशत जनसंख्या की आजीविका का यही प्रधान साधन है। ऐसे समय में जब विश्व अर्थव्यवस्था मंदी के दौरे से गुजर रही थी और हमारे किसान मौसम की मार झेल रहे थे, पिछले वर्ष के पहले के चार वर्षों के दौरान कृषि की औसत विकास दर 4 प्रतिशत से अधिक थी। वर्ष 2008-09 के दौरान 23 करोड़ 44 लाख 70 हजार टन का रिकार्ड खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। 2010 की खरीफ फसल के अप्रत्याशित सूखे के प्रतिकूल प्रभाव से बचाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने समय रहते अनेक कदम उठाए, जिसके कारण सूखे का प्रभाव कमतर ही रहा। पिछले वर्ष का सूखा कितना गंभीर था इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2002-03 के भीषण सूखे के दौरान कुल 19 प्रतिशत वर्षा ही कम हुई थी, जबकि पिछले वर्ष सामान्य से 23 प्रतिशत कम वर्षा हुई। गेहूं और चावल के उत्पादन की तुलना की जाए तो जहां 2002-03 में 71.82 मी. टन चावल और 65. 76 मी. टन गेहूं की पैदावार हुई थी, वहीं 2009-10 में चावल की 89.31 मीटर और गेहूं की 80 98 मीटर पैदावार हुई थी।

इन प्रयासों को जारी रखने और विकास की दर बनाए रखने के लिए सरकार ने किसानों, विशेष कर छोटे और सीमांत किसानों की दशा सुधारने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। सरकार ने कृषि पर निर्भर लोगों की भलाई के लिए अनेक योजनाएं तैयार की हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य
कृषि को स्थाई रूप से लाभदायक व्यवसाय बनाने के लिए प्रमुख अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में पिछले पांच वर्षों (2004-05 से 2009-10) के दौरान 39 प्रतिशत से 70 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृध्दि की गई है। इसी अवधि में दलहनों और तिलहनों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में भी 104 प्रतिशत की वृध्दि की गई है।

कृषि में निवेश
पिछले पांच वर्षों के दौरान सरकार द्वारा जो प्रगतिशील कदम उठाए गए हैं उसके परिणाम स्वरूप कृषि और संबंधित क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश में लगातार वृध्दि हो रही है। सार्वजनिक क्षेत्र का निवेश 2004-05 के 16,183 करोड़ रूपये से बढ़कर 2008-09 में 24,452 करोड़ रूपये हो गया। कुल निवेश में भी वृध्दि हुई है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत आवंटित राशि का उपयोग भी कृषि जनित कार्यों के लिए किया जाना प्रस्तावित है। इनमें भूमि-विकास, जल संसाधनों का सृजन और ग्रामीण सड़कों का निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं। 

ऋण प्रवाह एवं कर्ज माफी
किसानों के लिए संस्थागत ऋण सुलभ कराना केन्द्र सरकार की प्राथमिकता रही है, क्योंकि उनकी उत्पादकता और आमदनी में सुधार के लिए यह एक महत्वपूर्ण साधन है। सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए 18 जून, 2004 को एक व्यापक पैकेज की घोषणा की थी, जिसमें कृषि हेतु ऋणों के प्रवाह में तेजी लाने और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को राहत प्रदान करने जैसे उपाय शामिल थे। वर्ष 2006-07 के खरीफ मौसम से किसानों को 3 लाख रूपये तक का ऋण कुल 7 प्रतिशत के ब्याज पर दिया जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारें इस उद्देश्य से नाबार्ड और अन्य बैंकों को ब्याज माफी के लिए अनुदान प्रदान कर रही हैं। इसके अलावा, 2010-11 से सरकार समय पर कर्ज का भुगतान करने वाले किसानों के ब्याज में 2 प्रतिशत की अतिरिक्त माफी भी दे रही है। इस प्रकार, समय पर भुगतान करने वाले किसानों पर केवल पांच प्रतिशत की दर से ब्याज लग रहा है।

कर्ज के जाल में फंसे किसानों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार ने 2008-09 के केन्द्रीय वजट में कर्ज माफी और कर्ज में राहत की एक योजना की घोषणा की थी। इस योजना से करीब 3.68 करोड़ किसानों को लाभ हुआ है। इन किसानों को कर्ज माफी और कर्ज राहत के तौर पर 65318.33 करोड़ रूपये की राशि का लाभ हुआ है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)
राष्ट्रीय और परिवारिक स्तर पर खाद्य सुरक्षा प्रदान करना सरकार के लिए बहुत महत्व रखता है। बढ़ती जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि की दृष्टि से 2007-08 के रबी मौसम से देश के 17 राज्यों के 467 जिलों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन पर अमल किया जा रहा है। इस मिशन के तीन घटक हैं-एनएफएसएम-चावल, एनएफएसएम-गेहूं और एनएफएसएम-दलहन। ग्यारवहीं योजना (2011-12) के अंत तक खाद्यान्न के उत्पादन में 2 करोड़ टन की अतिरिक्त वृध्दि का लक्ष्य रखा गया है। इसमें एक करोड़ टन चावल, 80 लाख टन गेहूं और 20 लाख टन दलहनों का उत्पादन शामिल है। इस योजना से 2 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं। जिल क्षेत्रों में पहले खाद्यान्न का अभाव रहा करता था वे आज देश के अन्न भंडार को भरने में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। गेहूं, चावल और दलहनों के उत्पादन में 2006-07 से 2008-09 के बीच क्रमश : 4.87, 5.83 और 0.37 मी.टन की वृध्दि दर्ज की गई है। 

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई)
यह एक ऐसी अनूठी योजना है जिसके तहत राज्यों को कृषि और संबंधित क्षेत्रों से जुड़े कार्यक्रमों की स्थानीय आवश्यकता अनुसार योजना बनाने और उन पर अमल करने की पूर्ण स्वायत्ताता दी गई है। ग्यारहवीं योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना पर अमल के लिए 25,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त केन्द्रीय सहायता का प्रावधान किया गया है। आर के वी वाई के तहत विभिन्न राज्यों को जो आवंटन किया जाएगा वह वर्ष के दौरान कृषि और संबंध्द कार्यों पर पूर्ववर्ती वर्ष में किए गए कुल योजना व्यय के तुलनात्मक आकार पर आधारित होगा। इस प्रकार राज्यों को उन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में राज्यों को इस योजना के तहत बीज मिनी किट वितरण, विस्तार सहायता, जल संसाधनों की व्यवस्था करने जैसे तात्कालिक प्रकृति के उपायों के लिए वित्तीय सहायता देने की पूर्व छूट है। राज्य सरकारें आरकेवीवाई के तहत खाद्यान्न फसलों, बागबानी, जैविक कृषि, पशुपालन जैसे कार्यों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने में पर्याप्त रुचि दिखा रही है। यह योजना राज्य कृषि प्रक्षेत्र, मिट्टी और उर्वरक परीक्षण प्रयोगशालाओं जैसी महत्वपूर्ण संरचनाएं प्रदान करने में भी सफल साबित हो रही है। आरकेवीवाई ने निश्चित रूप से कृषि और संबध्द क्षेत्रों के बढ़ावा दिया है। 

पूर्वी भारत पहल
भारत सरकार बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों में हरित क्रांति का विस्तार करने के लिए संकल्पित है। इस उद्देश्य के लिए 4 अरब रुपये का प्रारंभिक आवंटन किया गया है। इससे कृषि के बुनियादी ढांचे में जो खामियां हैं उनके विकास के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों और संसाधनों को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। 

दलहन और तिलहन गांव
शुभुष्क क्षेत्रों में दलहनों और तिलहनों के उत्पादन के लिए एक विशेष पहल शुरू की गई है। इसके लिए चिन्हित जलग्राही क्षेत्रों में 60 हजार दलहन और तिलहन गांवों का गठन किया जाएगा और वहां के किसानों को दलहनों और तिलहनों के उत्पादन में उपयोगी कृषि यंत्र और उपकरण किराए पर दिए जाएंगे। भारत सरकार के दलहन और तिलहन संवर्धन की अन्य योजनाओं से तालमेल बिठाकर इन क्षेत्रों में मदद पहुंचाई जाएगी। वर्ष 2010-11 में इस योजना के मद में तीन अरब रुपये का प्रावधान किया गया है। 

राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम) 
राष्ट्रीय बागवानी मिशन पर 2005 से ही काम चल रहा है। देश में बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए जो उपाय पहले से चल रहे हैं उनको और आगे बढ़ाने के लिए मिशन के तहत अनुसंधान, उत्पादन-फसलोपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण और विपणन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मिशन के तहत 2011-12 तक बागवानी उत्पादन में दो गुनी वृध्दि अर्थात 6 प्रतिशत की वृध्दि दर के साथ 30 करोड़ टन के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस मिशन के अंतर्गत पूर्वोत्तर के आठ राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड तथा तीन केन्द्र शासित प्रदेशों को छोड़कर देश के शेष राज्यों के 367 जिलों में यह योजना चलाई जा रही है। उपर्युक्त राज्यों को पूर्वोत्तर राज्य, एकीकृत बागवानी विकास हेतु प्रौद्योगिकी मिशन (टीएमएनई) का लाभ मिल रहा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन (के शुरू होने के बाद 16 लाख 60 हजार एनएचएम) हेक्टेयर क्षेत्र में बागवानी की फसल ली जा रही है। एनएचएम के कारण ग्रीन हाउस उद्यानिकी प्लास्टिक की छांव, छायादार जाली उद्यानिकी (शेड नेट कल्टीवेशन) और नीचे की ओर बहाव वाली नालियों से सिंचाई का खूब प्रयोग हो रहा है। इसके अलावा करीब एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गुलाब, कार्नेशन और ग्लैडिओलस जैसे फूलों की खेती हो रही है। घरेलू जरूरतों को पूरा करने के अलावा इनका नियति भी हो रहा है। जहां तक कोल्ड चेन, पैक हाउसेज, ग्रेडिंग एवं पैकिंग इकाइयों, प्रशीतन भंडार, रेफ्रीजरेटेड वैन्स जैसी ढांचागत सुविधाओं का प्रश्न है, सरकार पूंजी निवेश के लिए उद्यमियों को करों में रियायत और अन्य लाभ दे रही है। 

विस्तार सुधार
देश में मौजूदा कृषि विस्तार प्रचार प्रणाली में प्राण फूंकने के लिए और विस्तार तंत्र के सामने पेश आने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए देश के 591 ग्रामीण बहुल जिलों में एक विशेष योजना चलाई जा रही है जिसका नाम है-विस्तार सुधारों हेतु राज्य विस्तार कार्यक्रमों की सहायता (सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंशन प्रोग्राम्स फॉर एक्सटेंशन रिफर्ाम्स) योजना को और मजबूती प्रदान करने के राज्य, जिला और विकासखंड स्तर पर  विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की सेवाएं प्रदान की जा रही हैं। इसके साथ ही एक नए प्रयास के तौर पर ग्राम स्तर पर किसान मित्र (एफएफ) (प्रति दो गांवों के लिए एक किसान मित्र) भी मुकर्रर किए जा रहे हैं जो हर किसान को समझाए और सिखाएँगे। लगभग 1000 कृषि विद्यालय स्थापित किए जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त कृषि क्लीनिक (निदानघर) एवं कृषि व्यापार केन्द्रों (एसीएबीसी) की योजना भी चलाई जा रही है जो बेरोजगार कृषि स्नातकों को कृषि क्लीनिक और कृषि व्यापार केन्द्रों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इस योजना के तहत 21579 कृषि स्नातकों को प्रशिक्षण दिया गया है और 7667 कृषि उद्यम (ऐग्रीवेंचर्स) स्थापित किए जा चुके हैं। 

जहां तक जनसंचार का प्रश्न है, दूरदर्शन और आकाशवाणी द्वारा प्रतिवर्ष हजारों कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है जो मुख्यत: विशिष्ट क्षेत्रों, स्थलों और मौसम में कृषि से संबंधित होते हैं। किसान काल सेंटर 1800-180-1551 नंबर पर देश भर के किसानों को बिना कोई समय गंवाए स्थान विशेष के लिए उपयोगी सूचना प्रदान करता है। किसान ज्ञान प्रबंधन प्रणाली (केकेमएस) का विकास किया जा रहा है ताकि किसानों के सवालों का जवाब देते समय काल सेंटर एजेंट को तुरंत आवश्यक सूचना प्रदान की जा सके। देश भर में फैले 25 किसान काल सेंटरों के जरिए मार्च, 2010 तक 46 लाख से अधिक लोगों ने फोन पर सवाल किए और सूचनाएं मांगी। 

बीजों की उपपलब्धता
बीजों की उपलब्धता में पर्याप्त वृध्दि हुई है। पिछले कुछ वर्षों में अधिक उत्पादन वाले प्रमाणित/उत्तम किस्म के बीजों के उत्पादन में भारी वृध्दि हुई है। वर्ष 2009-10 के दौरान 279 लाख क्विंटल बीज वितरित किए गए जबकि 2008-09 में 250 लाख क्विंटल और 2007-08 में कुल 194.31 लाख क्विंटल बीज ही वितरित किए गए थे। बीज ग्राम योजना को भारी सफलता मिली है। देश भर में 64,634 बीज गांवों को तैयार किया गया जिनमें 112.65 लाख क्विंटल बीजों की पैदावार हुई है। गुणवत्ता के मामले में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की गई हैं। 

देशवासियों की पोषाहार सुरक्षा आवश्यकता को पूरा करने और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की आजीविका और आमदनी के साधन प्रदान करने के लिए कृषि का सतत विकास अनिवार्य है। उपर्युक्त योजना पर समन्वित रूप से काम करने से ग्रामीण विकास के प्रयासों को नई ऊर्जा मिलेगी।(लेखक कृषि एवं सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय में सचिव हैं)

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