फिरदौस ख़ान
भारतीय राजनीति में आदर्श और सिध्दांत की बात करने वाली भारतीय जनता पार्टी पिछले कई दिनों से पार्टी नेताओं के आपत्तिजनक बयानों को लेकर सुर्ख़ियों में है। सियासत में विभिन्न राजनीतिक दलों में मतभेद होना स्वाभाविक है। यह लोकतांत्रिक प्रणाली को सुचारू रूप से चलाने के लिए ज़रूरी भी है। अगर सभी दल एक ही विचारधारा पर चल पड़े तो फिर लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाएगा? मगर आपसी मतभेदों के चलते राजनेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं। कई बार तो उनकी भाषा इतनी अमर्यादित हो जाती है कि सुनने वाले का सर शर्म से झुक जाए। कमोबेश देश के ज्यादातर सियासी दलों का यही हाल है। मगर भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जो आदर्श और सिध्दांत का ढोल पीटती है, लेकिन उसी के नेता अकसर इन्हीं सिध्दांतों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। फ़िलहाल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अलमबरदार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की ज़बान लगातार फिसल रही है। गडकरी की इसी आपत्तिजनक बयानबाज़ी ने पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे को बेनक़ाब कर दिया है।

ग़ौरतलब है कि 13 अगस्त को नई दिल्ली में 'कॉमनवेल्थ गेम्स या कॉमन मैन लूट' विषय पर आयोजित सेमिनार में सवालों का जवाब देते हुए गडकरी ने कहा कि ''प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का व्यवहार गांधीजी के बंदरों जैसा है। प्रधानमंत्री के पास कान हैं पर वह सुनते नहीं, आंखें हैं पर उनको दिखाई नहीं देता, ज़ुबान है लेकिन वह कुछ बोलते नहीं। कभी-कभी लगता है कि मनमोहन सिंह गांधीजी के उन प्रतिकृति बंदरों की तरह हैं, जो कान, आंख और मुंह पर हाथ धरकर बैठे हैं।'' साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री को नसीहत भी दे डाली कि मनमोहन सिंह बंदरों जैसा व्यवहार करना छोड़ें और कॉमनवेल्थ गेम्स मामले में चुप्पी तोड़कर सफ़ाई दें। 

इससे पहले गत 12 मई को चंडीगढ़ में पार्टी की रैली में नितिन गडकरी ने कहा था कि मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव शेर की तरह गुर्राते हैं, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर जाकर उनके तलवे चाटते हैं। उनके इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने जन आंदोलन चलाने की धमकी दे डाली थी। बाद में गडकरी को इस अमर्यादित टिप्पणी के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी। इसी तरह देहरादून में पार्टी की प्रदेश कार्य समिति की बैठक के मौक़े पर गडकरी ने कांग्रेस नेतृत्व पर हमला बोलते हुए आपत्तिजनक बयानबाज़ी की। संसद हमले के आरोपी अफ़ज़ल गुरु को फांसी दिए जाने में हो रही देर पर गडकरी ने कहा कि ''मैं कांग्रेस से पूछता चाहता हूं कि अफ़ज़ल गुरु उसका दामाद लगता है क्या? क्यों अफ़ज़ल गुरु की इतनी ख़ातिरदारी की जा रही है? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने में देरी क्यों हो रही है।'' इस पर पलटवार करते हुए कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने गडकरी को उनकी टिप्पणी के लिए किसी मनोचिकित्सक केंद्र में जाकर इलाज कराने की सलाह दे दी। कांग्रेस नेताओं ने गडकरी से अपने बयान के लिए माफ़ी मांगने को भी कहा, लेकिन गडकरी ने इससे इंकार करते हुए कहा कि वह अपने बयान पर क़ायम हैं और उन्हें इसका कोई अफ़सोस नहीं है। ख़ुद को 'रामराज्य' और सोनिया गांधी को 'रोमराज्य' का प्रतीक बताने वाले नरेंद्र मोदी की तुलना राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से किए जाने पर भी गडकरी विवादों में घिर गए थे।

भाजपा महासचिव अनंत कुमार ने भी राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ अभद्र टिप्पणी की थी। 5 मई को लोकसभा में जाति आधारित जनगणना के मुद्दे पर अनंत कुमार ने लालू प्रसाद यादव को 'राष्ट्रविरोधी' क़रार दे दिया। इस पर राजद सांसदाें ने उनसे माफ़ी मांगने की मांग की, लेकिन अनंत कुमार ने माफ़ी मांगने से इंकार करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसा कुछ भी ग़लत नहीं कहा है, जिसके लिए वह माफ़ी मांगें। नौबत हाथापाई तक पहुंच गई। तब मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को माफ़ी मांगनी पड़ी थी।

मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा ने देश की सुरक्षा में लगे जवानों पर निशाना साधते हुए बीएसएफ़ और सीआरपीएफ़ को डकैत और तस्कर क़रार दिया था। 31 जुलाई को इंदौर में महापौर और निगम पार्षदों के अभ्यास वर्ग के समापन सत्र के मौक़े पर उन्होंने कहा कि बीएसएफ़ और सीआरपीएफ़ डकैत हो गए हैं और ये सब तस्करी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में जो जवान मारे गए हैं, वे इलाहाबाद और कानपुर के रास्ते तस्करी कर लाए गए हथियारों से मरे हैं। इस आपत्तिजनक बयान की निंदा होने पर उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि उनके कहने का यह मतलब नहीं था। उन्होंने कहा कि देश में सेना के प्रति बहुत आदर है और मैं उसे प्रणाम करता हूं। भारतीय सेना की चरण रज को माथे पर लगाने पर मुझे गर्व होता है। मेरी भावना यह थी कि जो जवान ऐसा कर रहे हैं, उन्हें माफ़ नहीं किया जाना चाहिए। इससे पहले वह हाईकोर्ट के ख़िलाफ़ दिए गए अपने बयान से भी मुकर गए थे। ग़ौरतलब है कि भारतीय जनता युवा मोर्चा ने 20 जुलाई को इंदौर में बिना अनुमति के प्रदेश अध्यक्ष जीतू जिराती की स्वागत रैली प्रतिबंधित मार्गों से निकाली थी। इससे यातायात व्यवस्था बदहाल हो गई थी और शहरवासियों को ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ा था। जब मीडिया ने प्रभात झा से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि ''क्या कोर्ट के कारण उत्सव मनाना छोड़ दें। कोर्ट से समाज नहीं चलता, बल्कि समाज से कोर्ट चलता है।'' उनके इस बयान पर अदालत में एक अर्ज़ी दाख़िल की गई थी।
कुछ वक्त पहले पार्टी के प्रचारक वरुण गांधी ने इलाहाबाद के चंद्रशेखर आज़ाद पार्क में चप्पल पहनकर महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अपने संस्कारों का प्रदर्शन किया था। पिछले लोकसभा चुनाव में प्रचार अभियान के दौरान वरुण गांधी के ज़हर उगलते भाषणों ने भी पार्टी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पोल खोलकर रख दी। यह मुद्दा अदालत तक पहुंच गया और वरुण गांधी को जेल की हवा तक खानी पड़ी। तब तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने इसका समर्थन भी कर डाला था। इतना ही नहीं वह वरुण गांधी से मिलने जेल भी गए थे, मानो उसे इस महान कृत्य के लिए शाबाशी देने गए हों। इस प्रकरण ने भाजपा की सांप्रदायिक पार्टी की छवि को और मज़बूती प्रदान की थी।

गुजरात दंगों के लिए बदनाम नरेंद्र मोदी की भाषा 'शैली' भी किसी से छुपी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में ''नरेंद्र मोदी को गुजरात का नीरो'' तक क़रार दे दिया था। मोदी ने तो सोनिया गांधी के विषय में कहा था कि कोई उन्हें रहने के लिए अपना मकान भी किराये पर नहीं देगा। इसी तरह कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के बारे में उन्होंने कहा था कि राहुल को तो कोई अपनी कार का ड्राइवर भी नहीं रखेगा।

इतना ही नहीं आदर्श और सिध्दांत की दुहाई देने वाली भाजपा के कई सांसदों पर सदन में सवाल पूछने की एवज में मोटी रक़म वसूले जाने के आरोप भी लग चुके हैं। एक ख़बरिया चैनल ने वर्ष 2005 में ऑपरेशन दुर्योधन में जिन 11 सांसदों को संसद में सवाल पूछने के बदले रिश्वत लेते दिखाया था, उनमें से छह भाजपा के सांसद थे। इनमें पांच सांसद लोकसभा के और एक सांसद राज्यसभा का था। लोकसभा के सांसदों में हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से सुरेश कुमार चंदेल, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से प्रदीप गांधी, मध्य प्रदेश के सीधी से चंद्रप्रताप सिंह, महाराष्ट्र के इरनडोल से एमके अन्ना पाटिल, जलगांव से वाईजी महाजन और उड़ीसा से राज्यसभा सांसद छत्रपाल सिंह लोढ़ा शामिल हैं। कैमरे पर रिश्वत लेने की ख़बर प्रसारित होने के बाद भाजपा ने फ़ौरी कार्रवाई करते हुए सभी छह सांसदों को पार्टी से निलंबित कर दिया था।
              
इसी तरह ख़बरिया चैनल के स्टिंग ऑपरेशन 'चक्रव्यूह' में सांसद निधि फंड के तहत विकास कार्यों के लिए दलालों से कमीशन लेते कैमरे में क़ैद हुए छह सांसदों में से तीन भाजपा के थे। इसमें भाजपा सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते, चंद्रप्रताप सिंह और रामस्वरूप कोली शामिल थे। उस वक्त फ़ग्गन सिंह कुलस्ते तो लोकसभा में भाजपा के सचेतक और अनुसूचित जनजाति मोर्चा के अध्यक्ष भी थे।

पिछले साल भाजपा के तीन सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते, अशोक अर्गल और महावीर भगौरा ने सदन में नोटों की गड्डियां लहराते हुए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह ने यूपीए सरकार के पक्ष में मतदान करने के लिए हर सांसद को तीन करोड़ रुपए की रिश्वत देने की पेशकश की थी और एक-एक करोड़ रुपए पेशगी दिए हैं। इस कांड का भी स्टिंग ऑपरेशन ख़बरिया चैनल ने प्रसारित किया था। इस स्टिंग ऑपरेशन 'वोट के लिए नोट' की ख़ास बात यह रही कि इस मामले में भाजपा नेताओं पर सदन की गरिमा को धूमिल करने के आरोप लगे। ग़ौरतलब है कि अमेरिका के साथ परमाणु क़रार के मुद्दे पर यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वाम दलों ने समर्थन वापस ले लिया था। इस पर सरकार अल्पमत में आ गई थी और उसे 22 जुलाई को सदन में बहुमत साबित करना था।

अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री रहे दिलीप सिंह जूदेव ने तो नोटों की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हुए कहा था कि ''पैसा ख़ुदा नहीं होता, पर ख़ुदा की क़सम ख़ुदा से कम भी नहीं होता। नवंबर 2003 में जूदेव से संबंधित वीडियो सुर्ख़ियों में रहा था, जिसमें उन्हें खदानों के लिए ठेकेदार से रिश्वत लेते दिखाया गया था। छत्तीसगढ़ के तत्कालीन अध्यक्ष रमन सिंह ने इसे भाजपा के ख़िलाफ़ साजिश क़रार दिया था। उनका कहना था कि यह भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के चरित्र हनन के लिए जोड़-तोड़ कर बनाई हुई फ़िल्म है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बंगारू लक्ष्मण भी रिश्वत के नोट गिनते कैमरे में कैद हो चुके हैं। वर्ष 2001 में इसका ख़ुलासा तहलका ने किया था। तहलका डॉट कॉम के स्टिंग ऑपरेशन में हथियार बेचने वाली एक काल्पनिक द्वारा भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को एक लाख रुपये की रिश्वत दिए जाने का मामला सामने आया था। इससे भाजपा की छवि पर ख़ासा असर पड़ा था।

स्वदेशी का नारा देने वाले संघ के सियासी संगठन भाजपा ने (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) एनडीए के शासनकाल में विनिवेश और विदेशी लेनदेन की नीति अपनाकर बता दिया था कि वह येन-केन-प्राकेण सिर्फ सत्ता चाहती है। इसी सत्ता की भूख के चलते भाजपा नेता अपने सिध्दांतों को कभी भी हवा में उड़ा सकते हैं।

हैरत की बात तो यह भी है कि भाजपा का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी भाजपा नेताओं पर अंकुश लगाने में नाकाम ही साबित होता रहा है। संघ से जुड़े संगठन विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण तोगड़िया के आग उगलते भाषणों ने भी यह साबित कर दिया है कि वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से कोसों दूर हैं। राम जन्मभूमि मंदिर आंदोलन और गुजरात दंगों के दौरान संघ से जुड़े संगठनों के कारनामे भी जगज़ाहिर हैं। बाबरी मस्जिद की शहादत और गुजरात दंगों का मामला फ़िलहाल अदालत में चल रहा है।

संघ से भाजपा में आए गडकरी जैसे नेताओं के असंयमित बयानों से जनता में क्या संदेश जाएगा, कहने की ज़रूरत नहीं। पार्टी अध्यक्ष का पद बहुत महत्वपूर्ण होता है। नितिन गडकरी की टीम को लेकर पहले ही उनकी क्षमता पर सवालिया निशान लगते रहे हैं और बाक़ी कसर उनके बयानों ने पूरी कर दी।

संघ के नेताओं की प्रवृति विनम्र, मर्यादित और संयमित भाषा बोलने वालों की रही है। मगर अब संघ से जो नेता भाजपा में आ रहे हैं, उनकी भाषा शैली विनम्र नहीं, बल्कि आक्रमता लिए हुए है। आख़िर क्यों संघ में संयमित भाषा बोलने वाले नेता भाजपा में आते ही इतना ओछा व्यवहार करने वाले हो जाते हैं कि शब्दों की सारी मर्यादा को ही ताक़ पर रख देते हैं? चिंतक और जनसंघ के अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय ने हमेशा मर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भाषा बेहद अनुकरणीय और मधुर है। अटल जी अपनी विशेष काव्यात्मक भाषा शैली के लिए जाने जाते हैं। पार्टी के वयोवृध्द नेता लालकृष्ण आडवाणी भी शब्द चयन पर विशेष ज़ोर देते हैं।

भाषा शैली व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व की पहचान होती है। किसी की भाषा शैली से ही उसके आचार-विचार का पता चलता है। हर सभ्य समाज में भाषा शैली को विशेष महत्व दिया गया है। वेदों में भी भाषा का महत्व बताया गया है। मुंडकोपनिषद में कहा गया है-
द्वि ब्रह्मणि वेदतम्ये शब्द-ब्रह्मादि गच्छति
यानि जानने योग्य दो ही ब्रह्म हैं, शब्द ब्रह्म और परम ब्रह्म। अगर हम शब्द ब्रह्म को अच्छी तरह समझ लेते हैं तो परम ब्रह्म को भी जान लेते हैं।

महापुरुषों और संत-फक़ीरों ने भी शब्द साधना पर विशेष बल दिया है। रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास कहते हैं-
तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजत चहुं ओर

इसी तरह संत कबीर जी कहते हैं-
शब्द संभारे बोलिए, शब्द के हाथ न पांव
एक शब्द औषधि करे, एक शब्द करे घाव

रिश्वतख़ोरी और अभद्र भाषा की समस्या भाजपा नेताओं के साथ ही हो, ऐसा नहीं है। अन्य सियासी दलों के नेताओं ने भी रिश्वतख़ोरी और ओछी बयानबाज़ी कर अपनी और अपनी पार्टी की छवि को धूमिल किया है। जिस देश के रहनुमा अमर्यादित व्यवहार करने वाले हों, वह देश किस दिशा में जाएगा, सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। बहरहाल, महत्वपूर्ण पद पर आसीन लोगों को अपनी भाषा में मधुरता और चरित्र में महानता प्रदर्शित करनी चाहिए, तभी आने वाली पीढ़िया उन्हें एक अच्छे इंसान के रूप में याद रख पाएंगी।

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