सतीश सिंह
औपचारिक समारोह का प्रतीक बनकर रह गया है-हिन्दी दिवस, यानि चौदह सितम्बर का दिन। सरकारी संस्थानों में इस दिन हिन्दी की बदहाली पर मर्सिया पढ़ने के लिए एक झूठ-मूठ की दिखावे वाली सक्रियता आती है। एक बार फिर वही ताम-झाम वाली प्रक्रिया बड़ी बेशर्मी के साथ दुहरायी जाती है। दिखावा करने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता है। कहीं 'हिन्दी दिवस' मनता है, कहीं 'सप्ताह' तो कहीं 'पखवाड़ा'। भाषा के पंडित, राजनीतिज्ञ, बुद्विजीवी, नौकरशाह और लेखक सभी बढ़-चढ़कर इस समारोह में शामिल होकर भाषणबाजी करते हैं। मनोरंजन के लिए कवि सम्मेलन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पर्व-त्यौहार की तरह लोग इस दिवस को मनाते हैं। कहीं-कहीं तो इस ख़ुशी के अवसर को यादगार बनाने के लिए शराब और शबाव का भी दौर चलता है। कुछ सरकारी सेवक पुरस्कार या प्रशस्ति पत्र पाकर अपने को जरूर कृतार्थ या कृतज्ञ महसूस करते हैं। खास करके राजभाषा विभाग से जुड़े लोग, कामकाज में हिन्दी को शत-प्रतिशत लागू करने की बात हर बार की तरह पूरे जोश-खरोश के साथ दोहराते हैं।
सभी हिन्दी की दुर्दशा पर अपनी छाती पीटते हैं और चौदह सितम्बर की शाम खत्म होते ही सब-कुछ बिसरा देते हैं। आजादी से लेकर अब तक 'हिन्दी दिवस' इसी तरह से मनाया जा रहा है। दरअसल वार्षिक अनुष्ठान के कर्मकांड को सभी को पूरा करना होता है।
पर इस तरह के भव्य आयोजनों से क्या होगा? क्या इससे हिन्दी का प्रचार-प्रसार होगा या हिन्दी को दिल से आत्मसात् करने की जिजीविषा लोगों के मन-मस्तिष्क में पनपेगी ?
हिन्दी की दशा-दिशा के बरक्स में यह कहना उचित होगा कि इस तरह के फालतू और दिशाहीन कवायदों से हिन्दी आगे बढ़ने की बजाए, पीछे की ओर जायेगी।
अगर देखा जाये तो हिन्दी की वर्तमान दुर्दशा के लिए बहुत हद तक हिन्दी को सम्मान दिलाने की बात करने वाले राजनेता, नौकरशाह, बुद्विजीवी, लेखक तथा पत्रकार सम्मिलित रूप से जिम्मेदार हैं। इन्हीं लोगों ने हिन्दी के साथ छल किया है।
राजनेताओं ने तो हमेशा इसके साथ सौतेला व्यवहार किया है। उन्होंने हिन्दी को सिध्दांत और व्यवहार के रूप में कभी लागू करने की कोशिश ही नहीं की। वास्तव में यह कभी हिन्दुस्तान की भाषा बन ही नहीं सकी। भारत के पूर्ववर्ती शासकों ने हिन्दी को एक ऐसा राजनीतिक मुद्दा बना दिया कि यह उत्तार और दक्षिण के विवाद में फंसकर गेहूँ की तरह पिस कर रह गई।
हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली ऑंसू बहाने वाले लेखकों, बुद्विजीवियों और पत्रकारों का सारा अनौपचारिक कार्य अंग्रेजी में होता है। विवशतावश ही वे हिन्दी में लिखने-पढ़ने या बोलने के लिए तत्पर होते हैं। आमतौर पर वे हिन्दी की मिट्टी पलीद करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं। इस तरह वे हिन्दी की रोटी खाकर अंग्रेजी के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उनका अंग्रेजी प्रेम इतना अटूट होता है कि उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा कान्वेंट स्कूल में होती है।
इस तरह देखा जाये तो शासक वर्ग और उसके आस-पास मधुमक्खी की तरह मंडराने वाले अंग्रेजी-प्रेमी पूरी प्रतिबद्दता के साथ अपनी अंग्रेजी-प्रेमिका से आलिंगनबद्व हैं, ऐसे में आमजन का अंग्रेजी के प्रति झुकाव होना स्वाभाविक है। कुछ हद तक यह उनकी मजबूरी भी है, क्योंकि शासकवर्ग की नीतियां अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाली हैं।  ऐसे में हिन्दी अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे करेगी ?
यह जानकर जन-साधारण को आश्चर्य होगा कि आजादी से पहले हिन्दी पूरे देश की भाषा थी। इसके रंग में कमोबेश पूरा देश सराबोर था। इसका स्वरूप जनभाषा का था, किन्तु स्वतंत्रता के बाद हिन्दी को राजभाषा की गद्दी पर बैठाया गया और यह राजभाषा बनकर सरकारी हिन्दी बन गई। पिछले तिरसठ सालों में यह व्यावहारिक से अव्यावहारिक बन गई।
जिस वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के आधार पर यह पुष्पित-पल्लवित हो रही थी, वही आज लोप हो गया है। फलत: इसका वर्तमान स्वरूप आज उपहास का विषय बनकर रह गया है। राजभाषा का पद पाकर यह निष्प्राण और निर्जीव बनकर रह गई है।
विडंबना यह है कि हिन्दी की सबसे ज्यादा दुर्गति हिन्दी भाषी राज्यों में ही ज्यादा हुई है। हालांकि हिन्दी के विकास व प्रचार-प्रसार के लिए राजकीय साहित्य का हिन्दी में अनुवाद, पारिभाषिक शब्दावली  का संकलन, हिन्दी प्रषिक्षण और परीक्षा आदि के अतिरिक्त हिन्दी प्रगति समिति, राजभाषा पत्रिका तथा राजभाषा शोध संस्थान द्वारा बदस्तुर कार्य किये जा रहे हैं। इसके लिए विविध विभागों के राजभाषा विभाग पूरे उत्साह एवं मनोयोग से इन्हें हर तरह की सुविधायें मुहैया करवा रहा है। बावजूद इसके इन प्रयासों का परिणाम कभी भी शून्य के सिवा और कुछ नहीं निकलता है।
उल्लेखनीय है कि इस वस्तुस्थिति के ठीक उलट अक्सर राजभाषा पत्रिका में यही प्रकाशित होता है-प्रशासन के क्षेत्र में राजभाषा हिन्दी प्रयोग के मामले में काफी हद तक सफल हुई है, परन्तु अभी भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पूर्ण हिन्दीकरण नहीं हो सका है।
इस क्रम में लोक उपक्रम, निगम, निकाय इत्यादि अक्सर पूर्ण हिन्दीकरण के शत-प्रतिशत अनुपालन के मामले में पीछे रह जाते हैं। इतना ही नहीं हिन्दी भवन का निमार्ण कार्य, हिन्दीकरण के मार्ग में वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपकरणों का प्रयोग, न्यायपालिका के क्षेत्र में हिन्दीकरण तथा विभिन्न तकनीकी शब्दावलियों का सरलीकरण इत्यादि कार्य ऐसे हैं, जिनको आजतक अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है और आगे भी इसके होने की सम्भावना नगण्य ही है।
ऐसी विषम एवं विकट परिस्थिति के मौजूद रहते हुए हम कैसे राजभाषा विभागों का महिमामंडन कर सकते हैं? आखिर वे इतने वर्षों से हिन्दी का कैसे और किस तरीके से विकास कर रहे हैं ?
पड़ताल से स्पष्ट है कि आज हिन्दी हीन भावना से ग्रस्त है। वस्तुत: वर्तमान परिवेश में हिन्दी कुलीनतावाद की शिकार हो गई है। इसका सबसे मुख्य कारण हमारी उपनिवेशवादी मानसिकता है। यह शहरों की भाषा बन गई है। बोलियों से इसका अलगाव हो गया है, जबकि स्वतंत्रता पूर्व बोलियाँ इसकी धमनी थीं। आज की हिन्दी लोकभाषाओं से उतनी जुड़ी हुई नहीं है, जितना पहले थी। आंचलिक उपन्यास तथा गीत-कहानी आज कम लिखे जा रहे हैं। फणीश्वर नाथ रेणु की रचना 'मैला आंचल' की लोकप्रिययता से कौन नहीं वाकिफ है? इस उपन्यास के असंख्य शब्द आज भी पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की जुबान पर मौजूद हैं। दूसरी समस्या आज हिन्दी के साथ यह है कि अब इस भाषा के पुरोधा अन्यान्य भाषाओं एवं बोलियों के शब्दों को आत्मसात् करने में कंजूसी करते हैं।
सच कहें तो आधुनिकता हावी हो गई है आज हिन्दी पर। इसके कारण यह मुख्यत: अंग्रेजी और उसके माधयम से अमेरिका और यूरोप की चिंता-धाराओं व विचार-धाराओं से प्रभावित है।
वस्तुत: हिन्दी माधयम द्वारा उच्चस्तरीय शिक्षा के आयोजन का प्रयोग कभी भी दिल से नहीं किया गया। स्वतंत्र भारत ने षिक्षा के पष्चिमी ढांचे को स्वीकार कर लिया और साथ ही साथ अध्ययन, अध्यापन और मोक्ष की परिपाटी भी पश्चिमी देशों से ग्रहण किया। फलस्वरूप क्रमश: अंग्रेजी के विकास को बल मिला।
आज जरूरत इस बात की है कि हिन्दी भाषा और इससे जुड़ी संस्थाओं का व्यापक तरीके से लोकतांत्रिकीकरण किया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो इसे उदारता के साथ व्यापक बनाये जाने का प्रयास किया जाये। इसके लिए अंग्रेजी का विरोध करने या इसके वर्चस्व को समाप्त करने की प्रवृति के बीच व्याप्त मूलभूत अंतर को समझना होगा। तभी हिन्दी के विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
अब समय की मांग यह है कि शासक वर्ग, नव धनाढय वर्ग, नौकरशाह, बाबू तबका, और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिन्दी विरोधी रवैयों को नेस्तनाबूद किया जाये और हिन्दी के विकास के लिए क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठकर सभी भाषाओं के बीच समन्वय एवं संवाद कायम करते हुए राष्ट्रव्यापी सक्रियता के साथ मानसिक रुप से हिन्दी को स्वाधीन बनाया जाए। इस दिशा में  आवश्यकता है सरकार की ढृढ़ इच्छा शक्ति की। क्योंकि इस विषय पर उसी की भूमिका निर्णायक है। इसके अलावा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक स्तर पर भी प्रयास करने की जरुरत है, अन्यथा प्रतिवर्ष 'हिन्दी दिवस' आयेगा और हम वही होंगे, जहाँ हैं।

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