सुरेश प्रकाश अवस्थी
भारत सरकार ने हाल ही में देश में लुप्त हो चुके चीते को फिर से जंगलों में बसाने की तीन अरब रुपये की योजना को स्वीकार कर वन्य जीव प्रेमियों को एक बड़ी खुशखबरी दी है। करीब आधी सदी पूर्व देश से गायब हो चुके चीते को बसाने की परियोजना-प्रोजेक्ट चीता-के पहले चरण को स्वीकृति मिल गई है। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री जयराम रमेश के अनुसार मध्य प्रदेश में दो और राजस्थान में एक वन क्षेत्र को इस परियोजना के लिए चुना गया है। इन वन क्षेत्रों में शुरू में छ:-छ: चीते लाए जाएंगे। आशा है कि तीन चार वर्षों में चीते भारत में फिर से छलांगे भरने लगेंगे।

मध्य प्रदेश के कूनों पालपुर वन्यजीव अभयारण्य और नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य के अलावा राजस्थान के जैसलमेर जिले में शाहगढ़ का चयन प्रोजेक्ट चीता के तहत किया गया है। इन अभयारण्यों में अफ्रीकी प्रजाति के चीते लाए जाएंगे। इनके लिए नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से बात चल रही है। उत्तरी अफ्रीका के चीते पश्चिम एशिया के कई देशों में पल रहे हैं और वहीं से भारत लाए जाएंगे। ईरान से भी बात हो चुकी है। ये देश बिना किसी लागत के भारत को चीते देने को तैयार हैं। विशेषज्ञों ने भी ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के चीतों को भारत की जलवायु के अनुकूल पाया है। दोनों देशों में पाए जाने वाले चीतों में आनुवंशिक समानता भी है।  श्री रमेश के अनुसार पिछले छ: महीने से उनका मंत्रालय देश में चीता लाने की परियोजना पर काम कर रहा है। पिछले वर्ष सितंबर 2009 में चीते पर एक अन्तर्राष्ट्रीय बैठक भी देश में (गजनेर) में हुई थी। इसके बाद पर्यावरणविद् श्री रणधीर सिंह, चीता विशेषज्ञ श्री दिव्यभानु सिंह और भारतीय वन्यजीव संस्थान के श्री वी.के. झाला की सदस्यता वाली तीन सदस्यों की एक समिति बनाई गई जिसने देश के 10 वन्य क्षेत्रों (अभयारण्यों आदि) का अध्ययन कर 28 जुलाई को अपनी रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी। इस रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए श्री रमेश ने प्रोजेक्ट चीता को मूर्त रूप देने के निर्देश दिये हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार चीता भारतीय जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा वन्यप्राणी है। यह संभवत: एकमात्र स्तनपाई जन्तु है जिसे आज भी विश्वभर में चीता कह कर ही बुलाया जाता है। चीता शब्द संस्कृत के 'चित्राकु' शब्द का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है धब्बेदार। वनक्षेत्रों से जुड़े हुए चरागाहों में रहने वाला संसार का यह सबसे तेज प्राणी मानव जाति के लालच का शिकार हुआ है। अपनी खूबसूरत और आकर्षक खाल के लिए यह शुरू से ही शिकारियों के लिए आकर्षण का केन्द्र रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार पिछली शताब्दी के पचासवें दशक तक चीता भारत के जंगलों में विचरता था। परन्तु राजे-रजवाड़ों के शिकार के शौक और तस्करों के लालच ने इसे शीघ्र ही देश से गायब कर दिया। देखने में समानता के कारण कुछ लोग अभी भी तेंदुए को चीता समझने की भूल कर बैठते हैं। परन्तु दोनों काफी अलग हैं। लगभग एक दशक पूर्व, यूरोप में जब क्लोनिंग से एक भेड़ का विकास किया गया था तब हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर सेल्युलर ऐंड मालेकुलर बॉयलॉजी में चीते की क्लोनिंग के जरिए उसे पुनर्जीवन देने का प्रयास किया गया था और आशा जताई गई थी कि वर्ष 2005 तक उसका क्लोन तैयार हो जाएगा। परन्तु लगता है अभी तक यह प्रयास सफल नहीं हो पाया है। मैसूर के वन्यप्राणी संग्रहालय (चिड़ियाघर) ने भी 2001 में अफ्रीकी नस्ल के चीते के पालन-पोषण की बात कहीं थी पर किसी कारणवश यह विचार भी साकार नहीं हो सका।

जाने माने वन्यजीव विशेषज्ञ दिव्यभानु सिंह ने चीते के बारे में काफी कुछ लिखा-पढ़ा है। उनका कहना है कि करीब 2 हजार वर्ष पूर्व चीते भारत में पाले जाते थे और बारहवीं शताब्दी के आते-आते राजे-महाराजे उनका उपयोग हिरनों (ब्लैकबक) के शिकार के लिए करने लगे थे। इन सदियों के दौरान हजारों चीतों का शिकार किया जा चुका है। कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर के पास एक हजार चीते थे। चीतों की संख्या में कमी आने का सबसे बड़ा कारण उनकी खुद की शिकार करने की आदत भी है। वह अपने शिकार को आखिर तक दौड़ाता है और इस प्रयास में वह प्राय: घास के मैदानों एवं चरागाहों में प्रवेश कर जाता है। आबादी के विस्तार के कारण धीरे-धीरे घास के मैदान कम होते गए और चीतों को अपना जीवन बचाना कठिन हो गया। चीता विशेषज्ञों के अनुसार 1947 में अंतिम तीन चीतों का शिकार किया गया और 1968 में देश में अंतिम बार चीते को देखा गया।

श्री रमेश ने प्रोजेक्ट चीता को मंजूरी देते हुए कहा था कि चीते को भारत लाने से भारत की पर्यावरण प्रणाली और पारिस्थितिकी के संरक्षण में भी बड़ी मदद मिलेगी। चूंकि बाघ जंगल में होते हैं और चीता चरागाहों में रहता है, इसलिए यदि चीता लाया गया तो इस बहाने घास के मैदानों और चरागाहों भी बचाया जा सकेगा। परन्तु इस परियोजना की सबसे बड़ी समस्या भी यही है। जिस देश में चरागाह, जनसंख्या के बोझ तले और विकास की आवश्यकताओं के कारण निरंतर समाप्त होते जा रहे हैं, वहां 5600 वर्ग किलोमीटर चरागाह क्षेत्र को चीतों के लिए विकसित करना सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। आज की परिस्थिति में गांवों को उजाड़ना और विस्थापितों का पुनर्वास एक जटिल समस्या है। परन्तु सरकार ने इसके लिए जो 80 करोड़ रुपये की योजना बनाई है, उस पर यदि ईमानदारी से और मन से अमल किया गया तो सुखद नतीजे देखने को मिल सकते हैं। चीताें को बसाने के लिए जिन तीन जगहों का चुनाव किया गया है, उनकी पर्यावरणीय स्थिति ऐसी है कि उन्हें शीघ्र ही इस परियोजना के लिए तैयार किया जा सकता है और वहां तत्काल चीते लाकर छोड़े जा सकते हैं।

मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित कूनों पालपुर वन्य प्राणी अभयारण्य को चीता पालन के लिए आदर्श माना जा रहा है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) और वाइल्डलाइफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूआईआई) (ने पांच राज्यों के उन वन्य क्षेत्रों का व्यापक सर्वेक्षण किया था, जिनमें करीब 50 वर्ष पूर्व पहले चीते रहा करते थे और इनमें कूनों-पालपुर को सर्वोत्तम माना गया है। इस क्षेत्र में गुजरात के सिंहों को भी बसाने की योजना है। डब्ल्यूटीआई के प्रमुख श्री एम. के. रणजीत सिंह का कहना है कि यदि चीतों और सिंहों को कूनो में लाकर बसाया जाता है तो यह एक अनूठी पर्यावरणीय स्थिति होगी, जिसमें चीता, सिंह और तेदुएं साथ-साथ रह सकेंगे। लेकिन इसके लिए चीते को पहले लाकर बसाना होगा। परियोजना के तहत जो दूसरा स्थान चुना गया है वह है राजस्थान का शाहगढ़। पाकिस्तान की सीमा से लगे जैसलमेर जिले के इस अभयारण्य में चीते को सुरक्षित रूप से बसाने के लिए थोड़े अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इसके लिए 140 कि.मी.लंबी बाड़ तैयार करनी होगी, जबकि सीमावर्ती क्षेत्र में पहले से ही बाड़ लगी हुई है। तीसरा इलाका मध्यप्रदेश का नौरादेही अभयारण्य है, जो सागर संभाग में स्थित है। यह अभयारण्य प्राकृतिक रूप से चीता-पालन के लिए आदर्शं है। ऐसे में चीतो की वापसी होती है तो चरागाहों को भी नया जीवन मिलेगा, साथ ही देश में पर्यटन को बढ़ावा भी मिलेगा, इसे एक स्वागत योग्य कदम ही कहा जाएगा।

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