पंकज झा
वैसे तो कोई ज़रूरी नहीं है कि समूचे अंतर्जाल के हर कोने में फैलाई जा रही गंदगी पर हर कोई झाड़ू ले कर पिल ही पड़े. खास कर तब, जब कथित पीड़ित और तथाकथित पीडक के बीच अंतर्संबंध के बारे में आप कुछ भी नहीं जानते हो. नूराकुश्ती भी तो कई बार सस्ती लोकप्रियता का एक उपकरण बन कर सामने आता है. तो निश्चय ही जिनका दाना-पानी ही नेट के भरोसे चलता हो उनको तो नहीं लेकिन जो निरपेक्ष एवं अन्यत्र कामकाजी लोग अपने कीमती समय का उपयोग कर इस आभासीय दुनिया को गुलज़ार करते हैं उन्हें हर तरह के सस्ते बहस को शंका की नज़र से देखना चाहिए. आज के अखबारों की एक छोटी सी खबर ने एक साईट पर गैरज़रूरी ढंग से चेहरे को चस्पा करने य नहीं करने के सम्बन्ध में रोपित और आरोपित बहस के बारे में दो शब्द कहने को प्रेरित किया.
खबर यह है कि एक फिल्म में केवल बाबा रामदेव का एक बार जिक्र आ जाने पर निर्माता को सेंसर बोर्ड ने यह आदेश दिया कि वे रामदेव से अनापत्ति प्रमाण पत्र लायें. यह शर्त पूरा करने के बाद ही फिल्म को सेंसर ने पास किया. उसी खबर से यह भी पता चला कि क़ानूनन यह ज़रूरी है कि फिल्मों में सम्बंधित व्यक्ति की अनापत्ति के बाद ही आप किसी जीवित व्यक्ति का नाम ले सकते हैं. तो अगर फिल्म, जो विशुद्ध कथात्मक माध्यम है वहां बिना अनुमति के किसी का नाम भी लेना निषिद्ध है, वहीं जबरदस्त आपत्ति के बावजूद किसी महिला के फोटो का उपयोग एक तथ्यात्मक माध्यम में करना कहाँ तक जायज़ है?
सवाल यह नही है कि इस हरकत से किसी कम्युनिटी साईट पर दर्ज़नों फोटो सार्वजनिक करने वाली लेखिका के सम्मान को कोई ठेस पहुच गयी हो. सवाल यह भी नहीं है कि इसमें दूसरे पक्ष द्वारा जिस तरह से खुद को पीड़ित दिखाने की हो रही है वह सही है. यदि सही में स्टोरी में वर्णित ढंग से धमकी दी गयी हो या अपने ज्ञान या ओहदे का रौब झाड़ा गया हो तो गलत यह भी है. लेकिन सवाल तो यह भी है कि क्या नैतिकता का तकाजा है यह कि किसी के मना करने पर भी आप केवल अहंकारवश उसके फोटो पर फोटो चिपकाते जाएँ. निश्चित ही यह तो जान बूझकर अपमान प्रदर्शित करना हुआ ना? कम से कम अपने शरीर की तरह ही अपने चेहरे पर हर व्यक्ति का नीजी अधिकार होना चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि अगर आप सार्वजनिक लेखन या जीवन में हैं और आपने अपना फोटो बिना किसी प्राइवेसी सेटिंग के नेट पर डाला हुआ है तो कानूनी रूप से यह शायद माना जा सकता है कि उस फोटो के किसी भी उचित उपयोग से आपको आपत्ति नहीं है. खैर...!
दौलत और इज्ज़त की तरह शोहरत की भूख भी दैहिक भूख की तरह ही एक मानवीय कमजोरी या विशेषता है. आप इससे बच नहीं सकते. यदि आपने इस भूख के शमन के लिए उचित तरीका अपनाया तो सफलता के साथ ही प्रशंसा के भी पात्र होंगे. लेकिन अगर आपने इसके लिए किसी पब्लिसिटी स्टंट का सहारा लिया तो दुर्गति के लिए भी तैयार ही रहना चाहिए. कहते हैं....सूरज के हमसफ़र जो बने हो तो सोच लो, इस रास्ते में रेत का दरिया भी आएगा...!
छपास और देखास की भूख यूं तो नेताओं में सबसे ज्यादा हुआ करता है लेकिन कोई भी इससे वंचित हो कर तो नहीं रह सकता. इस लेख के बारे में सोचते-सोचते अपना एक पुराना सपना याद आ गया. जब उत्तर प्रदेश की साम्राज्ञी समूचे प्रदेश के भूख से अपना पत्थर दिल अक्स तैयार कर रही थी उस समय यह लेखक अपने सपनों के एक ऐसे मुख्यमंत्री के बारे में सोचा करता था जो शपथ लेते ही सबसे पहले अपने चेहरे का पेटेंट करवाए और यह घोषणा करे कि बिना उपयुक्त शुल्क चुकाए कोई उसका इस्तेमाल नहीं कर सके. अखबार वाले भी फोटो छापने से पहले फीस अदा कर राशि को मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करवाए. साथ ही मुख्यमंत्री यह घोषणा करे कि किसी भी सरकारी योजना का पैसा चुकि उनके पिताजी के घर से नहीं आ कर जनता का हे होता है तो किसी भी ऐसे योजना में भी उनका नाम और फोटो इस्तेमाल ना किया जाय. लेकिन जब ऐसे सस्ती लोकप्रियता के मोह से समाज को दिशा दिखाने का दंभ भरने वाले लेखक-लेखिका नहीं बच सकते तो फिर नेताओं से ऐसी उम्मीद करना तो वास्तव में सपने जैसा ही हो सकता है. बहरहाल.
हाल में सम्बंधित साईट से उस बहस से सम्बंधित सारे पोस्ट हटा लिए जाने का कारण तो नहीं पता. किसकी हार और किसकी जीत इस मामले में हुई यह भी ज्ञात नहीं. लेकिन इस सस्ते और अनावश्यक विवाद से मोटे तौर पर फायदा तो दोनों पक्षों का हुआ है. जहां चटखारे ले-ले कर इस लड़ाई को पढ़ने वाले पाठकों के कारण साईट का भला हुआ वहीं कामुक साहित्य के काले चश्में की ‘हंसीय’ दुनिया से बाहर के लोगों से भी लेखिका का परिचय हुआ. अगर पाठक वर्ग भी दिल पर ना ले कर ऐसे चीज़ों से केवल आनंदित होने के बारे ही सोचते हों तो नुकसान उनका भी नहीं है. इंतज़ार कीजिये तब तक किसी अन्य शिगूफा का उसी तरह जिस तरफ बचपन में अपने मोहल्ले में साइकिल पर बायोस्कोप लेकर घूमने वाले बुज़ुर्ग का करते थे....आमीन.
