सरफ़राज़ ख़ान
मुसलमानों का त्योहार ईद उल-फ़ित्र इस्लाम के उपवास के महीने रमज़ान के ख़त्म होने के बाद मनाया जाता है. इस्लामी साल में दो ईदों में से यह एक है, दूसरा ईद उल-अज़हा या बक़रीद कहलाता है. पहला ईद उल-फ़ित्र पैगम्बर हज़रत मुहम्मद ने 624 ईस्वी में जंग-ए-बदर के बाद मनाया था.

ईद उल-फ़ित्र शव्वल  इस्लामी कैलंडर के दसवें महीने के पहले दिन मनाया जाता है. इस्लामी कैलेंडर के सभी महीनों की तरह यह भी नये चांद के दिखने पर शुरू होता है. इस ईद में मुसलमान 29 या 30 दिनों के बाद पहली बार दिन में खाना खाते हैं. रमज़ान की समाप्ति के बाद ईद के दिन मुसलमान अल्लाह का शुक्रिया अदा इसलिए भी करते हैं कि उसने महीनेभर के रोज़े रखने की हिम्मत दी. ईद के दिन लोग सेवइयां और अन्य लज़ीज़ पकवान खाते हैं. इस दिन सभी नये कपड़े पहनते हैं. ईद उल-फ़ित्र के दिन लोग पुराने गले-शिकवे भूल कर गले मिलते हैं. ईद के दिन मस्जिद में सुबह की नमाज़ से पहले हर मुसलमान फ़ितरा और ज़कात देता है. इस दान को ज़कात उल-फ़ित्र कहते हैं. यह पैसा ग़रीबों में बांट दिया जाता है.

ईद का मतलब है ख़ुशी. हर क़ौम और समुदाय के कुछ विशेष त्योहार, उत्सव और प्रसन्नता व्यक्त करने के दिन होते हैं. उस दिन उस क़ौम के लोग अपने रीति-रिवाजों के अनुसार अपनी हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हैं. इस्लाम के आगमन से पहले अरबों के यहां ईद का दिन 'यौमुस सबाअ' कहलाता था. मिस्र में कुब्ली 'नवरोज़' को ईद मनाते थे. मजूसियों के दो धार्मिक त्योहार नवरोज़ और मीरगान थे, जो बाद में मौसमी त्यौहार बन गए. नवरोज़ बसंत के मौसम में मनाया जाता था, जबकि मीरगान सूर्य देवता का त्यौहार था और पतझड़ में मनाया जाता था. पारसियों के इस त्यौहार का प्रभाव कुछ मुगल शहंशाहों पर भी रहा, जो बड़े जोशो-ख़रोश से नवरोज़ का आयोजन करते थे.

ईरान में फ़िरोज़ जान की ईद पांच दिनों तक मनाई जाती थी. उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मृत परिजनों की आत्माओं का आदर-सत्कार उन्हीं दिनों में किया जाता था. बसंत के मौसम में जश्ने-चिराग़ां मनाया जाता था. यहूदियों की सबसे बड़ी ईद ईदुल ख़िताब है. यह त्यौहार उस दिन की याद में मनाया जाता है, उनके ईश्वर यहुवाह ने सीना घाटी के पहाड़ से बनी इसराइल को संबोधित किया था.

ईसाई रोमन कैथोलिक और पश्चिमी अहले क्लीसा साल में कई ईदें मनाते हैं. उने यहां जैतूनिया का त्यौहार रोज़ों के सातवें दिन मनाया जाता है. यह त्यौहार हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बैतुल मुक़द्दस आगमन की याद में मनाया जाता है. यह ईस्टर से एक दिन पहले मनाया जाता है. ईस्टर 21 मार्च या उसके पहले रविवार को मनाया जाता है. इसे अरबी में ईदुल कियामा कहा जाता है.

ईदस्सलीब उस सलीब की याद में मनाई जाती है, जो कुस्तुनतुनिया के कैसर ने आसमान में देखा था. उसके बाद सलीब ईसाइयों का धार्मिक निशान बन गया. ईसाइयों की ईदुल बशारह उस घटना की याद दिलाती है, जब फ़रिश्ते ने हज़रत मरियम अलैहिस्सलाम को हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के जन्म की शुभ सूचना दी थी. ईसाइयों का त्यौहार क्रिसमस 25 दिसंबर को दुनियाभर में धूमधाम से मनाया जाता है.

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Blog

  • आलमे-अरवाह - मेरे महबूब ! हम आलमे-अरवाह के बिछड़े हैं दहर में नहीं तो रोज़े-मेहशर में मिलेंगे... *-फ़िरदौस ख़ान* शब्दार्थ : आलमे-अरवाह- जन्म से पहले जहां रूहें रहती हैं दहर...
  • अल्लाह और रोज़ेदार - एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ? अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ म...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

Like On Facebook

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं