अनिल स्वरूप
विकासशील देशों खासकर भारत के समक्ष गंभीर और विकट समस्याओं में एक यह है कि एक अरब से अधिक की आबादी, जिनमें से अधिकतर गरीब या निम्न आय वर्ग से हैं, को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए कैसे धन का प्रबंध हो। अधिकतर एशियाई देशों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए व्यक्ति को जेब ढीली करनी पड़ती है। इन  व्ययों से विकासशील देशों में स्वास्थ्य प्रणाली समान रूप से काफी प्रभावित होती है। वित्तीय जोखिम व्यवस्था के अभाव में गरीबों को स्वास्थ्य देखभाल के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं जिससे उनकी स्थिति और दयनीय हो जाती है।

भारत में नीति निर्माताओं के सामने जो आम समस्या है वो यह कि जब सरकार स्वयं ही निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही है, ऐसे में स्वास्थ्य बीमा के प्रयोजन की सरकार को क्या आवश्यकता है। हालांकि तथ्य यह है कि मुपऊत सरकारी स्वास्थ्य  सेवाओं से समुदाय की जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। यही कारण है कि अब भी लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं जिससे आगे जाकर वे कर्ज में डूब जाते हैं । यह भी बात स्पष्ट  है कि इसकी सबसे अधिक मार गरीबों पर पड़ती है। भारत में 94 फीसदी श्रमबल असंगठित क्षेत्र में है, अतएव उन्हें वांछित सामाजिक सुरक्षा कवर नहीं मिल पाता ।

लक्षित समूह
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले  और गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले (बीपीएल) श्रमिकों और उनके परिवारों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) के अंतर्गत लाने का प्रावधान है।

लक्षित समूह के लक्षणों को समझते हुए एक ऐसी योजना विकसित करना जरूरी समझा गया, जिसका सार्थक प्रभाव हो। इस समूह के विश्लेषण से पता चला कि वे प्राथमिक रूप से तीन तरह के होते हैं-गरीब, अशिक्षित और  परदेसी ।

यह योजना ऐसी होनी चाहिए जिसमें हितग्राही को इलाज के पहले भुगतान न करना पड़े क्योंकि वह किसी भी स्थिति में पहले खर्च नहीं कर सकता और बाद में किसी एजेंसी से उसकी प्रतिपूर्ति करा सके ।

भारत में बड़ी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं। अबतक ऐसी कोई भी योजना नहीं है जो इस पहलू का समाधान करती हो। ऐसे में जटिलता तब और बढ जाती है जब उनमें से कुछ ही परिवार दूसरे राज्य चले जाते हैं और शेष वहीं ठहर जाते हैं।

जहां तक निरक्षरता का प्रश्न है, बार-बार दस्तावेज तैयार करने का तरीका नहीं अपनाया जा सकता । इसलिए बिना पूर्व भुगतान प्रणाली (कैशलैस सिस्टम) ही एकमात्र विकल्प है ।

लाभ
आरएसबीवाई के तहत लाभार्भी निम्नलिखित न्यूनतम लाभ के पात्र हैं- गरीबी रेखा से नीचे के परिवार के लिए प्रति परिवार 30 हजार रुपए की कुल राशि का सालाना बीमा, पहले की बीमारियां उसमें शामिल होगी, मातृत्व लाभ अस्पताल में भर्ती होने से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं के लिये बिनापूर्व भुगतान की इलाज की व्यवस्था और सर्जरी से संबध्द सेवाओं सहित जिनके लिए दिन की देखभाल जरूरी है बाह्य रोगी विभाग सुविधा इस योजना के तहत नहीं आती है, क्योंकि यह सुविधा निशुल्क होती है अस्पताल में भर्ती होने से एक दिन पहले और पांच दिन बाद का व्यय तथा परिवहन भत्ते का प्रावधान।

वित्त पोषण 
सरकार कुल अनुमानित प्रीमियम लागत का 75 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करती है। पूर्वोत्तर के राज्यों एवं जम्मू कश्मीर के लिए 90 फीसदी तक भार वहन करती है। इसके अलावा केंद्र सरकार 60 रूपए प्रति स्मार्ट कार्ड की दर का व्यय भी वहन करती है। संबंधित राज्यों सरकारों का वार्षिक प्रीमियम में 25 प्रतिशत का योगदान होता है। पूर्वोत्तर के राज्य और जम्मू कश्मीर इसके अपवाद हैं और उन्हें केवल 10 प्रतिशत का ही योगदान करना पड़ता है। लाभार्थी के पंजीयन का नवीनीकरण करने के लिए राज्य सरकारें प्रति वर्ष 30 रूपए का योगदान देती हैं। 

योजना क्रियान्वयन
राज्य सरकारों को नियमित आधार पर निविदा प्रक्रिया के अनुसार एक या उससे अधिक बीमा सेवा प्रदाताओं का चयन करना होता है। इस निविदा के दौरान बीमा पैकेज की लागत और प्रस्ताव के तकनीकी गुण-दोष, दोनों पर विचार किया जाता है। निविदा प्रक्रिया बीमा नियामक विकास प्राधिकरण के मानकों पर खरा उतरने वाले सभी सरकारी और निजी कंपनियों के लिये खुली होती है ।

चुनी गई बीमा कंपनी के पास स्वास्थ्य सेवा प्रदाता, स्मार्ट कार्ड सेवा प्रदाता और मध्यस्थों तीनों की परस्पर जुड़ी सुविधाएं होनी चाहिए।

बीमा कंपनी केवल उन स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं का पैनल तैयार करती है जो पूर्व निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हैं। अस्पतालों को भी चिकित्सा और आपरेशन प्रक्रिया संबंधी पूर्व निर्धारित पैकेज का लाभ देने को राजी होना चाहिए। पूर्व निर्धारित पैकजों के लिए पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं होती है।  ज्यादातर बीमारियां इन पैकेजों में शामिल हैं, जो बीमारी इस पैकेज में नहीं आती है उसके लिए पूर्वानुमति जरूरी होती है।

सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग
स्मार्टकार्ड आरएसबीवाई के लिए अनिवार्य है क्योंकि इसके बिना पूर्व भुगतान विनिमय आसान हो जाता है तथा इस नेटवर्क में शामिल देशभर के अस्पतालों में तालमेल बना रहता है। इससे लाभार्थी की अचूक बायोमीट्रिक पहचान हो जाती है। पंजीकरण के समय ही बीमा कंपनी स्मार्ट कार्ड जारी करती है।

बीपीएल परिवारों के संभावित देस-गमन के मद्देनजर इस योजना के तहत परिवार  के अलग-अलग कार्डों की भी सुविधा है।

स्मार्ट कार्ड खो जाने की स्थिति में नया कार्ड जारी किया जा सकता है, लेकिन प्रतिलिपि कार्ड का खर्च लाभार्थी को देना होगा। चूंकि परिवार का सभी ब्यौरा डाटाबेस में संग्रहित होता है अतएव कार्ड जिला कियोस्क पर ही जारी हो सकता है।

अस्पतालों के लिए स्मार्ट कार्ड के आंकड़ों के अध्ययन के लिए पूर्व विशिष्ट प्रकार के हार्डवेयर रखना जरूरी है। अस्पतालों में उपयोग के लिए विनिमय सॉपऊटवेयर सेवा तैयार करने का काम सेवा प्रदाता द्वारा किया जाएगा।

सुरक्षा
स्मार्ट कार्ड जारी किये जाने एवं उसके इस्तेमाल की पूरी प्रक्रिया को सुरक्षा प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईसी) ने एक सुव्यवस्थित की मनैजेमेंट सिस्टम (केएमएस) तैयार किया है।  केंद्रीय स्तर पर इस प्रणाली के प्रबंधन के लिए सेंट्रल की जेनेरेशन ऑथोरिटी (सीकेजीए) स्थापित की गयी है। सीकेजीए डिस्ट्रिक्ट की का निर्माण करती है। 

मध्यस्थ की भूमिका
बीमा कंपनियों और लाभार्थियों के बीच काम करने वाले मध्यस्थों की भूमिका बहुत ही अहम होती है। ये मध्यस्थ क्षेत्र विशेष की जरूरत के मुताबिक टीपीए, एनजीओ, एमएफआई, पंचायती राज संस्थाओं और उनके समूह के रूप में हो सकते हैं। इन सामाजिक  संगठनों के बगैर योजना का  क्रियान्वयन असंभव है।

योजना की अनोखी खासियत
गरीबों की सुरक्षा के लिए आईटी का उपयोग : इस योजना के तहत बीपीएल परिवारों को कुल मिलाकर छह करोड़ कार्ड जारी किए गए हैं। भारत या दुनिया के किसी भी हिस्से में यह आईटी के उपयोग वाला सबसे बड़ा कार्य है। अबतक आईटी का उपयोग मुख्यत: शहरी क्षेत्रों के लिए हुआ करता था, लेकिन अब बड़े पैमाने पर स्मार्ट कार्ड गांवों में पहुंच गए हैं।

बीपीएल परिवारों का सशक्तिकरण: सरकार प्रायोजित पूर्व योजनाओं, जहां लाभार्थी को सेवा का स्थल चुनने का हक नहीं था, के विपरीत इस योजना में लाभार्थी इलाज कराने के लिए अस्पतालों के नेटवर्क से अपने मतलब का अस्पताल चुन सकता है।

आरएसबीवाई व्यापारिक प्रारूप पर कार्य करता है: इसमें संख्या और लगे हुए धन के मद्देनजर बीमा कंपनियां, अस्पताल, स्मार्टकार्ड सेवा प्रदाता और मध्यस्थ जैसे सभी साझेदारों के लिए व्यापारिक संभावनाएं मौजूद हैं। हर वर्ष औसतन पांच करोड़ रूपए हर जिले पर खर्च किए जाते हैं। इससे व्यापारिक संभावना पैदा हुई है क्योंकि निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य प्रदाता के लिए स्वास्थ्य संबंधी अवसंरचनाएं तैयार करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।  इसी प्रकार, स्मार्ट कार्ड प्रदाता को ग्रामीण क्षेत्रों में कार्ड जारी करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। बीमा कंपनियां भी उचित कमाई कर सकती हैं।

कार्डो की सुरक्षा: स्मार्ट कार्ड को पूर्णरूपेण सुरक्षित बनाने के लिए राष्ट्रीय सूचना केंद्र ने की मैनेजमेंट सिस्टम तैयार किया है। कार्डों के फर्जीवाड़े या दुरुपयोग की रत्तीभर संभावना नहीं है।  स्मार्ट कार्ड में बायोमीट्रिक का प्रावधान है जिसमें उंगलियों के निशानों का सत्यापन होता है

सतत अग्रसर आरएसबीवाई
राज्य सरकारों और अन्य पक्षों की प्रतिक्रिया उत्साहवर्ध्दक रही है। यह योजना एक अप्रैल, 2008 से क्रियाशील है। अबतक 29 राज्यों में से 26 ने इस योजना के कार्यान्वयन के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। 22 राज्यों में स्मार्ट कार्ड जारी होने लगे हैं। 20 जुलाई, 2010 तक स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा प्रदान करने वाले एक करोड़ 70 लाख स्मार्ट कार्ड जारी हो चुके हैं। करीब सात लाख लोग अस्पताल में मुपऊत भर्ती और इलाज का लाभ उठा भी चुके हैं।

इस योजना का बीपीएल के अलावा अन्य श्रेणियों के लिए भी विस्तार करने का निर्णय लिया गया है। इस प्रकार इस योजना के लाभ के दायरे में अब निर्माण मजदूर भी आ गए हैं। वित्त मंत्री ने भी इस योजना के दायरे में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के श्रमिकों को लाने की घोषणा की थी। उसके लिए शर्त है कि उस श्रमिक ने पिछले वर्ष 15 या उससे अधिक दिन काम किया हो। रेल मंत्री ने भी रेलवे के कुलियों और फुटकर विक्रेताओं के लिए ऐसे लाभ घोषित किए हैं।

इस योजना को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। विश्व बैंक ने इसे भारत के अत्यधिक सार्थक प्रयासों में एक बताया है। उसने कहा है कि इस कार्यक्रम को गरीबों तक पहुचंने में सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल संबंधी अभिनवकारी कदम के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। यूएनडीपी ने अपने दस्तावेज अभिनव अनुभवों का आदान-प्रदान व सामाजिक संरक्षण के क्षेत्र में सफलता में इसे शामिल किया है। योजना के प्रारंभिक मूल्यांकन में लाभार्थियों का संतोष उत्साहवर्ध्दक रहा है।

चुनौतियां
दूर दराज के अनेक लोगों तक पहुंचना बहुत ही बृहद कार्य है। संचार मोडयूल बनाना और उन्हें इतने बड़े पैमाने पर पहुंचाना बीमा कंपनियों की क्षमता और सामर्थ्य की असली परख है जिनका कार्य इस उत्पाद को उन्हें बेचना है। अंतत: चुनौती केवल मात्रा को लेकर ही नहीं बल्कि विभिन्न सेवा प्रदाताओं द्वारा उन्हें गुणवत्तापूर्ण सेवा पहुंचाने में भी है। 

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