फ़िरदौस ख़ान            
बरसात का मौसम आते ही उत्तर भारत के कई राज्य बाढ़ की चपेट में जाते हैं। इस साल भी उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बाढ़ ने क़हर बरपाया है। बाढ़ से जान माल का भारी नुक़सान हुआ है। लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। कितने ही लोग बाढ़ की वजह से मौत की आग़ोश में समा गए। सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हो गए,  हज़ारों लोग बेघर होकर शरणार्थी जीवन गुज़ारने को मजबूर हुए। खेतों में खड़ी फ़सलें तबाह हो गईं, जिन्हें किसानों ने अपने ख़ून-पसीने से सींचा था। 

देश में बाढ़ आने के कई कारण हैं। देश में बाढ़ अमूमन उत्तर पूर्वी राज्यों को ही निशाना बनाती है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि चीन और ऊपरी पहाड़ों में भारी बारिश होती है और वर्षा का यह पानी भारत के निचले इलाक़ों की तरह बहता है। फिर यही पानी देश में तबाही का कारण बनता है। नेपाल में भारी बारिश का पानी भी बिहार की कोसी नदी को उफ़ान पर ला देता है, जिससे नदी के रास्ते में आने वाले इलाक़े पानी में डूब जाते हैं। ग़ौरतलब है कि कोसी नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है। यह नदी बिहार में भीम नगर के रास्ते भारत में दाख़िल होती है। कोसी बिहार में भारी तबाही मचाती है, इसलिए इसे बिहार का शोक या अभिशाप भी कहा जाता है। कोसी नदी हर साल अपनी धारा बदलती रहती है। वर्ष 1954 में भारत ने नेपाल के साथ समझौता करके इस पर बांध बनाया। हालांकि बांध नेपाल की सीमा में बनाया गया है, लेकिन इसके रखरखाव का काम भारत के ज़िम्मे है। नदी के तेज़ बहाव के कारण यह बांध कई बार टूट चुका है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ बांध बनाते वक्त अाकलन किया गया था कि यह नौ लाख क्यूसेक पानी के बहाव को सहन कर सकता है और बांध की आयु 25 साल आंकी गई थी। पहली बार यह बांध 1963 में टूटा। इसके बाद 1968 में पांच जगहों से यह टूटा। उस वक्त क़ोसी का बहाव नौ लाख 13 हज़ार क्यूसेक मापा गया था। फिर वर्ष 1991 नेपाल के जोगनिया और 2008 में नेपाल के ही कुसहा नामक स्थान पर बांध टूट गया। हैरानी की बात यह रही कि उस वक्त नदी का बहाव महज़ एक लाख 44 हज़ार क्यूसेक था।

कोसी की तरह गंडक नदी भी नेपाल के रास्ते बिहार में प्रवेश करती है। गंडक को नेपाल में सालिग्राम और मैदान में नारायणी कहते हैं। यह पटना में आकर गंगा में मिल जाती है। बरसात में गंडक भी उफ़ान पर होती है और इसके आसपास के इलाक़े बाढ़ की चपेट में जाते हैं। मध्यप्रदेश में नर्मदा और छत्तीसगढ़ की कुछ नदियों के उफ़ान पर आने पर इनके रास्ते में पड़ने वाले इलाक़े प्रभावित होते हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में कावेरी और कृष्णा नदियां भी तबाही मचा देती हैं।

बाढ़ से हर साल करोड़ों का नुक़सान होता है, लेकिन नुक़सान का यह अंदाज़ा वास्तविक नहीं होता। बाढ़ से हुए नुक़सान की सही राशि का अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है, क्योंकि बाढ़ से मकान दुकानें क्षतिग्रस्त होती हैं। फ़सलें तबाह हो जाती हैं। लोगों का कारोबार ठप हो जाता है। बाढ़ के साथ आने वाली बीमारियों की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी काफ़ी पैसा ख़र्च होता है। लोगों को बाढ़ से नुक़सान की भरपाई में काफ़ी वक्त लग जाता है। यह कहना ग़लत होगा कि बाढ़ किसी भी देश, राज्य या व्यक्ति को कई साल पीछे कर देती है। बाढ़ से उसका आर्थिक और सामाजिक विकास ठहर जाता है। इसलिए बाढ़ से होने वाले नुक़सान का सही अंदाज़ा लगाना बेहद मुश्किल है। अधिकारिक जानकारी के मुताबिक़ 2008 की कोसी नदी की बाढ़ के कारण करीब 1.500 करोड़ के नुकसान का अनुमान लगाया गया था। भारत में बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही 1955 में मचाई थी। उसके बाद 1971, 1973, 1977 1978, 1980, 1984, 1988, 1998, 2001, 2004 और 2008 में मचाई थी।

इस साल चीन और पाकिस्तान भी बाढ़ की चपेट में आए हुए हैं। इन दोनों ही देशों में भी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। जान माल का भारी नुक़सान हुआ है। चीन के उत्तर पश्चिमी प्रांत गांसू में आई भीषण बाढ़ ने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया और सैकड़ों लोग लापता हो गए। चीन में मूसलाधार बारिश की वजह से बाढ़ के हालात पैदा हो गए और इससे नौ प्रांतों के क़रीब एक करोड़ 70 लाख लोग प्रभावित हुए। बारिश की वजह से 40 हजार से ज्यादा मकान ढह गए और क़रीब सवा लाख मकान क्षतिग्रस्त हो गए।

पाकिस्तान क़रीब 20 फ़ीसदी हिस्सा बाढ़ के पानी में डूब गया है। पाक में बाढ़ से सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और 60 लाख लोग बेघर हुए हैं। बाढ़ के चलते देश में भुखमरी और बीमारियां फैलने का ख़तरा भी पैदा हो गया है। बाढ़ से पहले पाक अर्थव्यवस्था भी बुरे दौर से गुज़र रही थी। इस साल यहां की आर्थिक विकास दर 4.5 फ़ीसदी थी, लेकिन बाढ़ के चलते यह शून्य से तीन फ़ीसदी के बीच रहने का अनुमान है। बाढ़ से यहां की क़रीब 14 फ़ीसदी कृषि भूमि बर्बाद हो गई है और इससे देश की अर्थव्यवस्था को क़रीब तीन अरब डॉलर का नुक़सान हुआ है। 
 
गौरतलब है कि बांग्लादेश के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त देश है। 1960 से 1980 के बीच दुनिया में बाढ से जो लोग मरे उनमें से 20 फीसदी भारत से ही थे। विडंबना यह भी है कि पिछले करीब छह दशकों में बाढ़ से होने वाले नुकसान में 50 से 90 गुना बढ़ोतरी हुई है। एक अनुमान के मुताबिक 1953 में जहां कुल नुकसान करीब 50 करोड़ रुपए था, वहीं 1984 में यह 2500 करोड़, 1985 में 4100 करोड़ और 1988 में 4600 करोड़ रुपए हो गया। 1990 के शुरू में कम नुकसान हुआ। 1997 में  800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, लेकिन 1999 और 2000 में बाढ़ से ज्यादा तबाही हुई। हर साल बाढ़ से होने वाले जान माल के नुकसान में बढ़ोतरी ही हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है।

देश में कुल 62 प्रमुख नदी प्रणालियां हैं, जिनमें से 18 ऐसी हैं जो अमूमन बाढ़ग्रस्त रहती हैं। उत्तर-पूर्व में असम, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश तथा दक्षिण में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु बाढ़ग्रस्त इलाके माने जाते हैं। लेकिन कभी-कभार देश के अन्य राज्य भी बाढ़ की चपेट में जाते हैं।

पिछले करीब छह दशकों में देश में 256 बड़े बांध बनाए गए हैं और 154 निर्माणाधीन हैं। साथ ही पिछले करीब दो दशकों से बाढ़ नियंत्रण में मदद के लिए रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन संतोषजनक नतीजे सामने नहीं पा रहे हैं। बाढ़ से निपटने के लिए 1978 में केंद्रीय बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया था। देश के कुल 32.9 करोड़ हेक्टेयर में से क़रीब 4.64 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रभावित इलाक़ों में आता है। इसके बावजूद बाढ़ से ख़तरे वाले 1.64 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को ही संरक्षित किया गया है। आयोग के मुताबिक़ देश में हर साल क़रीब 4000 अरब घन मीटर बारिश होती है।
           
हैरत का बात यह भी है कि बाढ़ एक राष्ट्रीय आपदा है, इसके बावजूद इसे राज्य सूची में रखा गया है। इसके तहत केंद्र सरकार बाढ़ से संबंधित कितनी ही योजनाएं बना ले, लेकिन उन पर अमल करना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। प्रांतवाद के चलते राज्य बाढ़ से निपटने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं कर पाते। एक राज्य की बाढ़ का पानी समीपवर्ती राज्य के इलाक़ों को भी प्रभावित करता है। राज्यों में हर साल बाढ़ की रोकथाम के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं, मगर प्रशासनिक लापरवाही के चलते इन योजनाओं पर ठीक से अमल नहीं हो पाता। नतीजतन, यह योजनाएं महज़ काग़जों तक ही सिमट कर जाती हैं। हालांकि बाढ़ को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में बांध बनाना, नदियों के कटान वाले इलाक़ों में कटान रोकना, पानी की निकासी वाले नालों की सफ़ाई और उनकी सिल्ट निकालना, निचले इलाक़े के गांवों को ऊंचा करना, सीवरेज व्यवस्था को सुधारना और शहरों में नालों के रास्ते आने वाले अतिक्रमणों को हटाना आदि शामिल है।

क़ाबिले-ग़ौर है कि विकसित देशों में आगजनी, तूफ़ान, भूकंप और बाढ़ के लिए कस्बों का प्रशासन भी पहले से तैयार रहता है। उन्हें पहले से पता होता है कि किस पैमाने पर, किस आपदा की दशा में, उन्हें क्या-क्या करना है। वे बिना विपदा के छोटे पैमाने पर इसका अभ्यास करते रहते हैं। इसमें आम शहरियों के मुखियाओं को भी शामिल किया जाता है। गली-मोहल्ले के हर घर तक यह सूचना मीडिया या डाक के ज़रिये संक्षेप में पहुंचा दी जाती है कि किस दशा में उन्हें क्या करना है। संचार व्यवस्था के टूटने पर भी वे प्रशासन से क्या उम्मीद रख सकते हैं। पहले तो वे इसकी रोकथाम की कोशिश करते हैं। इसमें विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है। इस प्रक्रिया को आपदा प्रबंधन कहते हैं। आग तूफान और भूकंप के दौरान आपदा प्रबंधन एक खर्चीली प्रक्रिया है, लेकिन बाढ़ का आपदा नियंत्रण उतना खर्चीला काम नहीं है। इसे बखूबी बाढ आने वाले इलाकों में लागू किया जा सकता है। विकसित देशों में बाढ़ के आपदा प्रबंधन में सबसे पहले यह ध्यान रखा जाता है कि मिट्टी, कचरे वगैरह के जमा होने से इसकी गहराई कम हो जाए। इसके लिए नदी के किनारों पर खासतौर से पेड़ लगाए जाते हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को थामकर रखती हैं। नदी किनारे पर घर बसाने वालों के बगीचों में भी अनिवार्य रूप से पेड़ लगवाए जाते हैं। जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा हो, वहां नदी को और अधिक गहरा कर दिया जाता है। गांवों तक में पानी का स्तर नापने के लिए स्केल बनी होती है।

भारत में भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए  पहले से ही तैयार रहना होगा। इसके लिए जहां प्रशासन को चाक-चौबंद रहने की ज़रूरत है, वहीं जनमानस को भी प्राकृतिक आपदा से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। स्कूल, कॉलेजों के अलावा जगह-जगह शिविर लगाकर लोगों को यह प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इसमें स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जा सकती है। इस तरह प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। 

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