फ़िरदौस ख़ान
देश में नदियों के जल बंटवारे को लेकर विभिन्न प्रदेशों में गतिरोध बरक़रार है. जहां कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण ने 43 साल पुराने कृष्णा जल विवाद को हल कर दिया है, वहीं सतलुज-यमुना संपर्क नहर (एसवाईएल) के पानी के बंटवारे को लेकर हरियाणा और पंजाब में तनाव जारी है. गौरतलब है कि कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण ने नदी का 1001 टीएमसी फ़ुट जल आंध्रप्रदेश को, 911 कर्नाटक को और 666 महाराष्ट्र को आबंटित किया है. अब तक आंध्रप्रदेश को 811 टीएमसी फ़ुट, कर्नाटक को 734 टीएमसी फ़ुट और महाराष्ट्र को 585 टीएमसी फ़ुट जल मिलता था. साल 2004 में गठित किए गए इस न्यायाधिरकण ने जल की निर्भरता पर इन तीनों राज्यों के लिये कुछ शर्ते भी लगाई हैं. यह फ़ैसला मई 2050 तक मान्य रहेगा और इसके बाद एक सक्षम प्राधिकरण या न्यायाधिकरण इसकी समीक्षा कर सकता है. न्यायाधिकरण ने वस्तुत कर्नाटक के अलमाटी बांध की उंचाई बढ़ाकर 524. 256 मीटर किए जाने के आदेश को बरक़रार रखा है. हालांकि इसका आंध्र प्रदेश ने कड़ा विरोध किया है.
हरियाणा को सतलुज-यमुना संपर्क नहर (एसवाईएल) का पानी भी नहीं मिल पा रहा है, जिससे इस प्रदेश के किसानों को अपनी फसल को बचाने के लिए सिंचाई के दूसरे संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अगर यही हालत रही तो वो दिन दूर नहीं जब देश के खाद्यान्न भंडारों को भरने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाला हरियाणा खुद अन्न को तरस जाएगा। क़ाबिले-गौर है कि नदी जल विवाद 1947 में पाकिस्तान और भारत के बीच शुरू हो गया था। रावी ब्यास पंजाब की पांच नदियों में प्रमुख थी। आजादी के बाद पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान में चला गया तो रावी ब्यास के पानी के बंटवारे की चर्चा शुरू हो गई। पाकिस्तान के पास रावी-ब्यास का पानी उसकी जरूरत से ज्यादा था। आजादी के बाद 1950 से 1954 तक इस बंटवारे पर बातचीत होती रही। 1955 में भारत और पाकिस्तान के बीच रावी-ब्यास के पानी का बंटवारा सिंधु जल समझौते के तहत हुआ। 1966 में इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के तहत भारत ने पाकिस्तान को 110 करोड रुपए अदा करके सतलुज, रावी व ब्यास नदियों का पूरा पानी इस्तेमाल करने का अधिकार ले लिया। इससे पहल 1959 में तत्कालीन पंजाब और राजस्थान के बीच भाखड़ा-नंगल समझौते के अधीन भाखड़ा प्रोजेक्ट द्वारा सिंचित क्षेत्रों में इस्तेमाल के लिए बंटवारा किया गया। इसके मुताबिक पंजाब को रावी-ब्यास के कुल 148.50 लाख एकड़ फुट पानी में से 72 लाख एकड़ फुट पानी मिला। पंजाब की सत्ता पर उस समय पंजाब के राजनेताओं का कब्जा था। उन्होंने पंजाब के शुष्क इलाके हरियाणा को पानी न देने के इरादे से नहर निर्माण का नाम तक नहीं लिया। इन राजनेताओं ने हरियाणा के साथ किस कद्र नाइंसाफी की, इसका सबूत तो 1961 में देखने को मिला, जब पंजाब ने 72 लाख एकड़ फुट पानी के बंटवारे में 53 लाख एकड़ फुट पानी पंजाब वाले इलाके को दिया था और 19 लाख एकड़ फुट पानी मौजूदा हरियाणा के इलाके के लिए मंजूर किया था।
चौधरी छोटूराम ने 6 जनवरी 1945 को भाखडा प्रोजेक्ट पर दस्तखत किए थे, ताकि उस समय के हिसार, रोहतक, महेंद्रगढ़, गुड़गांव, संगरूर और भटिंडा जिलों के बारानी व रेतीले इलाकों को सिंचाई जल मिल सके। लेकिन उस वक्त किसी को इस बात का अहसास तक नहीं था कि इस पानी को मरुस्थलीय इलाके में लाने वाली एसवाईएल नहर आगे चलकर एक राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा।
नवंबर 1966 में हरियाणा के गठन के वक्त भी पंजाब ने हरियाणा को उसके हिस्से का पानी नहीं दिया। हालांकि हरियाणा का संयुक्त पंजाब के 72 लाख एकड़ फुट पानी में से 48 लाख एकड़ फुट पानी पर अधिकार था। पंजाब सरकार ने नहर के पानी के बंटवारे को लेकर एक समिति गठित की, जिसने एक फरवरी 1966 को रावी-ब्यास के अतिरिक्त 70 लाख एकड़ फुट पानी में से हरियाणा को 45.6 लाख एकड़ फुट और पंजाब को 24.6 लाख एकड़ फुट पानी देने की सिफारिश की। इंदिरा गांधी अवॉर्ड में मार्च 1976 में हरियाणा और पंजाब का हिस्सा 35-35 लाख एकड़ फुट कर दिया गया। पंजाब सरकार को यह समझौता रास नहीं आया और वे हरियाणा को उसके हिस्से का पानी देने में आनाकानी करने लगी। गौरतलब है कि एसवाईएल की तयशुदा लंबाई 212 किलोमीटर थी, जिसका 121 किलोमीटर लंबा हिस्सा पंजाब में और बाकी 91 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में है। केंद्र सरकार ने 1976 में योजक नहर निर्माण को मंजूरी दी थी। इसके तहत हरियाणा ने अपने इलाके में पड़ने वाले एसवाईएल नहर के 91 किलोमीटर के हिस्से का निर्माण कराकर इसे पंजाब के पटियाला जिले तक पहुंचा दिया था, लेकिन पंजाब सरकार ने नहर के निर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं ली। आखिरकार पंजाब के हिस्से की नहर के निर्माण को लेकर हरियाणा को सर्वोच्च न्यायालय में दस्तक देनी पड़ी।
काबिले-जिक्र यह भी है कि 31 दिसंबर 1981 को इस समझौते को लेकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों की बैठक हुई और तीनों मुख्यमंत्रियों ने इस समझौते को मंजूर करते हुए हस्ताक्षर किए। रावी-ब्यास के पानी की उपलब्धता 158.50 लाख एकड़ फुट से बढ़कर 171.50 लाख एकड़ फुट हो गई। समझौते में इस पानी में से पंजाब को 42.20 लाख एकड़ फुट, राजस्थान को 36 लाख एकड़ फुट, हरियाणा को 35 लाख एकड़ फुट, जम्मू-कश्मीर को 6.50 लाख एकड़ फुट और दिल्ली को दो लाख एकड़ फुट पानी देने की बात कही गई थी। समझौते के कुछ वक्त बाद 8 अप्रैल 1982 को इंदिरा गांधी ने पंजाब की कपूरी नाम की जगह पर नहर की खुदाई के काम का उद्धाटन किया। पंजाब के मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला के शासनकाल में नहर के निर्माण के काम ने जोर पकड़ा। मगर भिंडरवाला, गुरुचरण सिंह टोहड़ा, सिमरनजीत सिंह मान और जगजीत सिंह के भड़काऊ बयानों से तैश में आकर उग्रवादियों ने नहर के निर्माण कार्य में लगे इंजीनियरों और मजदूरों की हत्याएं शुरू कर दीं। मई 1988 में मजाट में उग्रवादियों ने 30 मजदूरों को मौत की नींद सुला दिया। 3 जुलाई 1990 को नहर के निर्माण के काम से जुड़े दो इंजीनियरों की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इसके बाद नहर के निर्माण के काम को बंद कर दिया गया। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी हुक्म सिंह ने केंद्र सरकार से नहर के निर्माण का काम सीमा सुरक्षा संगठन को सौंपने की मांग की। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर इस संबंध में 20 फरवरी 1991 को एक बैठक भी बुलाई, लेकिन मामले का कोई हल निकलकर सामने नहीं आया। चौधरी देवीलाल ने एसवाईएल नहर को लेकर न्याय युध्द भी चलाया, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा।
गौरतलब है कि हरियाणा में सिंचाई के मुख्य स्त्रोतों में यमुना, सतलुज और संभावित रावी ब्यास का पानी शामिल है। प्रदेश को सतलुज का पानी भाखडा से निकलने वाली मुख्य नहर से मिलता है। शुरुआत में इस नहर की क्षमता 12 हजार क्यूसिक थी, जो अब घटकर 7700 क्यूसिक रह गई है। नहर की क्षमता के घटने की अहम वजह यह है कि पंजाब के इलाके में पड़ने वाली नहर की मरम्मत नहीं की गई। सिंचाई विभाग से आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा को कुल 336 लाख एकड़ फुट पानी की जरूरत है, जबकि तमाम जल संसाधनों से प्रदेश को कुल जरूरत का आधा यानी 168 लाख 40 हजार एकड़ फुट पानी ही मिल पा रहा है। प्रदेश को अभी 167 लाख 60 हजार एकड़ फुट पानी की और जरूरत है।
आज देश के राजनीतिक दलों को वोट बैंक की लालसा ने इतना ज्यादा चिंतित कर दिया है कि उन्होंने देश की प्राकृतिक सम्पदा को भी राज्य विशेष की पुश्तैनी जायदाद बनाकर रख दिया है और इसका जीता-जागता उदाहरण है एसवाईएल नहर का पानी। हरियाणा को पानी दिलवाने के लिए प्रदेश सरकार एक लंबी कानूनी लड़ाई तो लड़ी ही रही है, लेकिन इससे पहले से प्रदेश के बाशिंदे भी अपना हक पाने के लिए लंबे अरसे से संघर्षरत हैं। काबिले-गौर है कि प्रोफेसर शेरसिंह और स्वामी ओमानंद सरस्वती की अगुवाई में हरियाणा के बाशिंदों पानी की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था। इसी आंदोलन की बदौलत हरियाणा का गठन हुआ था। मगर अफसोस की बात यह रही कि हरियाणा प्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद भी प्रदेशवासियों को उनके हिस्से का पानी नहीं मिल पाया और यह संघर्ष आज भी बदस्तूर जारी है। एसवाईएल नहर के मुद्दे को लेकर हरियाणा ही नहीं, पंजाब और केंद्र में बैठे राजनेताओं ने खूब वोट बटोरे, लेकिन किसी ने भी इसके समाधान के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए।
