फ़िरदौस ख़ान
किश्तियां सबकी पहुंच जाती हैं साहिल तक
नाख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है
जी, हां इन्हीं शब्दों को सार्थक कर रहे हैं हरियाणा के हिसार ज़िले के गांव कैमरी में स्थित श्रीकृष्ण प्रणामी बाल सेवा आश्रम के संस्थापक बाबा दयाल दास। क़रीब 40 साल पहले बाबा दयाल दास को रास्ते में एक बेसहारा बच्चा मिला था, जिसे उन्होंने अपना लिया। और फिर यहीं से शुरू हुआ बेसहारा बच्चों को सहारा देने का सिलसिला। बाबा अनाथ और बेसहारा बच्चों को जहां माता और पिता दोनों का प्यार दे रहे हैं, वहीं मार्गदर्शक बनकर उनमें ज़िन्दगी की मुश्किल राहों में निरंतर आगे बढ़ते हुए जन सेवा की अलख जगा रहे हैं। एक छोटी-सी कुटिया से शुरू हुए इस आश्रम में आज क़रीब 150 लोग रह रहे हैं, जिनमें 63 लड़के-लड़कियां शामिल हैं। सभी एक परिवार की तरह रहते हैं।

बाबा बताते हैं कि पहले आश्रम का नाम निजानंद अनाथ आश्रम रखा गया था, लेकिन बाद में बदलकर श्रीकृष्ण प्रणामी बाल सेवा आश्रम कर दिया गया। वह कहते हैं कि वह नहीं चाहते कि किसी भी तरह बच्चों को 'अनाथ' होने का अहसास हो। आश्रम में हरियाणा के अलावा पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और नेपाल तक के बच्चे हैं। बच्चों को घर जैसा माहौल देने की पूरी कोशिश की जाती है। बच्चों को स्कूल और कॉलेज की शिक्षा दिलाई जाती है। उच्च शिक्षा हासिल कर अनेक बच्चे आज बेहतर ज़िन्दगी जी रहे हैं। कई तो सरकारी सेवा में भी गए हैं। अध्यापक हरिदास बताते हैं कि यहां पर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। बच्चों की सभी सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि उन्हें कभी किसी चीज़ की कोई कमी महसूस न हो।

रमेश प्रणामी बताते हैं कि दो साल की उम्र में वह इस आश्रम में लाए गए थे। यहां उन्हें परिवार का प्यार मिला। गांव के ही स्कूल से उन्होंने दसवीं कक्षा पास की। इसके बाद हिसार के दयानंद कॉलेज से स्नातक की। उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. किया। फिर पंजाब विश्वविद्यालय से नेचरोपैथी में डिप्लोमा किया। इस वक्त वह हिसार में श्रीकृष्ण प्रणामी योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान चला रहे हैं। उनका विवाह हो चुका है। आश्रम से उन्हें इतना लगाव है कि किसी न किसी रूप में वह आज भी आश्रम से जुड़े हुए हैं। वह कहते हैं कि यह आश्रम तो उनका घर है, इससे वह कभी दूर नहीं हो सकते। वह बताते हैं कि दसवीं तक की शिक्षा उन्हें आश्रम ने ही दिलवाई। इसके बाद की शिक्षा उन्हें पार्ट टाइम जॉब करके पूरी की। मगर अब ऐसा नहीं है। आश्रम में लड़कों को उच्च शिक्षा दिलाई जाती है। वह बताते हैं कि जो लड़कियां पढ़ना चाहती हैं उन्हें भी उच्च शिक्षा दिलाई जाती है, लेकिन जो लड़कियां आगे पढ़ना नहीं चाहतीं, उनका विवाह करा दिया जाता है। अभी तक आश्रम की आठ लड़कियों का अच्छे परिवारों में विवाह कराया जा चुका है। ये लड़कियां अपनी ससुराल में ख़ुशहाल ज़िन्दगी बसर कर रही हैं।

आश्रम में रह रहे बच्चे किसी भी तरह आम बच्चों से अलग नहीं हैं। वे बाबा को अपना पिता और आश्रम  को घर मानते हैं। मनमोहन, आदित्य, संदीप और हेमंत कहते हैं कि आश्रम ही उनका घर है और बाबा ही उनके पिता हैं। स्कूलों में पिता के नाम की जगह बाबा का ही नाम लिखा हुआ है। यहां उनकी सुख-सुविधाओं का अच्छे से ख्याल रखा जाता है। आश्रम में रह रही लड़कियां भी घर के काम-काज भी सीखती हैं। वे भोजन आदि बनाने में रसोइयों की मदद करती हैं, ताकि वे भी स्वादिष्ट भोजन बनाना सीख सकें। किरण, सोनिया, गीता और बबीता का कहना है कि उन्हें रसोइयों की मदद करना अच्छा लगता है, क्योंकि इससे उन्हें काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है। आश्रम में रह रही बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ उन्हें नानी-दादी का प्यार मिलता है। 

अनाथ बच्चों के अलावा आश्रम में उन बुजुर्ग़ों को भी आश्रय दिया जाता है, जिन्हें उम्र के आख़िरी पड़ाव में एक अदद छत की तलाश है। ये बुज़ुर्ग यहां आकर संतुष्ट हैं। फूला देवी कहती हैं कि यहां वह बहुत ख़ुश हैं।

बाबा दयाल दास बताते हैं कि आश्रम का सारा ख़र्च श्रध्दालुओं द्वारा दिए गए दान से चलता है। आश्रम में गऊशाला भी है, जिसमें क़रीब 60 गायें हैं। गायों की सेवा आश्रम में रहने वाले लोग ही करते हैं। आश्रम में अनाथ बच्चों के पालन-पोषण की सेवा का कार्य सुशीला प्रणामी कर रही हैं।

जहां ख़ून के रिश्ते साथ छोड़ जाते हैं, वहां बाबा दयाल दास जैसे जनसेवक आगे बढ़कर उनका हाथ थाम  लेते हैं। सच ऐसे ही लोग तो सच्चे जनसेवक कहलाते हैं।

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