भाजपा मुसीबत में

Posted Star News Agency Wednesday, January 18, 2012 , ,


फ़िरदौस ख़ान
त्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी मुसीबत में है. इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी के नेता हैं. एक तरफ़ जहां भाजपा बसपा सरकार से बर्ख़ास्त मंत्रियों को गले लगा रही है, वहीं दूसरी तरफ़ जुझारू कार्यकर्ताओं की अनदेखी करके वह एक बड़े तबक़े को नाराज़ कर रही है. भाजपा वैश्यों की पार्टी मानी जाती रही है, लेकिन इस बार वैश्य समाज उससे नाराज़ है. नाराज़गी पार्टी के नेतृत्व को लेकर है, क्योंकि पार्टी का नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में है. वैश्य समाज को मलाल है कि भाजपा वोट तो उससे लेती है, लेकिन संगठन या सत्ता में उसकी भागीदारी को कोई तरजीह नहीं देती. उसकी यह भी शिकायत है कि वैश्य नेताओं को पार्टी में आगे बढ़ने नहीं दिया जाता. उन्हें लगता है कि पार्टी के सारे फ़ैसले ब्राह्मण नेता लेते हैं, जबकि ब्राह्मणों के वोट मायावती की बहुजन समाज पार्टी की झोली में जाते हैं. वैश्य समाज की यह नाराज़गी ग़लत नहीं है, क्योंकि उसकी दलीलों में सच्चाई दिखती है. अनुपमा जायसवाल बहराइच से भाजपा का टिकट चाहती थीं. वह पार्टी की पुरानी कार्यकर्ता हैं और उन्होंने पार्टी के लिए मेहनत भी की, लेकिन पार्टी संगठन में मंत्री पद पर रही इस वैश्य महिला नेता का टिकट काटकर दद्दन मिश्रा को दे दिया गया, जो बहुजन समाज पार्टी की सरकार में मंत्री थे.

वैश्य समाज का आक्रोश कोई नया नहीं है. पिछले चुनाव में भाजपा ने जालौन के सर्वमान्य वैश्य नेता बाबूराम का टिकट काट दिया था, जिससे वैश्य समाज को काफ़ी झटका लगा था. बाद में उन्हें मनाने के लिए पार्टी के टिकट पर विधान परिषद भेजा गया, लेकिन वैश्य समाज की नाराज़गी दूर नहीं हो पाई. इस चुनाव में वैश्य समाज के साथ हो रहे भेदभाव का खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ सकता है. समाजवादी पार्टी वैश्य समाज की नाराज़गी से वाक़ि़फ है. इसलिए मुलायम सिंह यादव वैश्य समाज को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. वैश्य नेता नरेश अग्रवाल ने जब समाजवादी पार्टी का दामन थामा तो मुलायम सिंह ने ऐलान कर दिया कि वह समाजवादी पार्टी सरकार में मंत्री होंगे. साथ ही उन्होंने वैश्य समाज के चार एमएलसी बनाने का वायदा भी कर दिया. नरेश अग्रवाल के शामिल होने पर पार्टी में जश्न का माहौल था. वैश्य समाज में भी खुशी देखने को मिली. लखनऊ में ऐसा नज़ारा दिखा, जैसा आज़म खां की वापसी के दौरान नहीं देखा गया. वैश्य समाज को लगता है कि मुलायम सिंह की पार्टी में उसकी ज़्यादा पूछ है. भाजपा का सामाजिक आधार पिछड़े, ब्राह्मण और वैश्य रहे हैं. इनमें से जब भी कोई एक तबक़ा दूर हो जाता है तो पार्टी को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ता है.

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपना खोया जनाधार वापस पाने के लिए उमा भारती को यहां की बागडोर सौंपी थी. अति महत्वाकांक्षी संन्यासिन उमा भारती तेज़तर्रार वक्ता हैं और भाजपा ने अयोध्या के राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उनका ख़ूब इस्तेमाल किया था. इस बार भी भाजपा एक तीर से दो निशाने साधना चाहती थी. एक तरफ़ जहां वह उमा भारती के ज़रिये दलितों एवं पिछड़ों का चेहरा बनकर मायावती को चुनौती देना चाहती थी, वहीं दूसरी ओर दिग्विजय सिंह को कड़ा जवाब देना चाहती थी, लेकिन मज़बूत अगड़ी और पिछड़ी जातियों के नेताओं ने उमा भारती के मंसूबों पर पानी फेर दिया. हालत यह हो गई कि उमा भारती ने बुंदेलखंड की बबीना विधानसभा सीट से अपना नाम कटवा दिया. इतना ही नहीं, एक तरफ़ जहां मायावती जिताऊ उम्मीदवारों को तलाश कर चुनावी समर जीतने की क़वायद में जुटी हैं, वहीं भाजपा टिकट बंटवारे में भेदभाव की नीति अपना कर ख़ुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रही है. भाजपा नेता पार्टी विद डिफ्रेंस का दंभ भरते हुए वंशवाद एवं परिवारवाद की आलोचना करते नहीं थकते, लेकिन मौक़ा मिलते ही वे इस बहती गंगा में हाथ धोने से ख़ुद को रोक नहीं पाते. जनपद फ़र्रुख़ाबाद एवं कन्नौज की सात विधानसभा सीटों पर पूर्व सांसद दयाराम शाक्य, पूर्व सांसद चंद्रभूषण सिंह, पूर्व मंत्री राम प्रकाश त्रिपाठी और ब्रह्मदत्त दुबे के पुत्र-पुत्रियों को टिकट थमाए गए हैं.

बसपा सरकार के दाग़ी मंत्रियों को पार्टी उम्मीदवार बनाए जाने से भी भाजपा की चाल, चरित्र और चेहरे पर सवाल उठने लगे हैं. पार्टी के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा के महज़ डेढ़ माह के भीतर ही भाजपा ने मायावती सरकार के चार दाग़ी मंत्रियों बाबू सिंह कुशवाहा, अवधेश वर्मा, दद्दन मिश्रा और बादशाह सिंह को पार्टी में शामिल करके ख़ुद अपने ही भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की हवा निकाल दी है. इतना ही नहीं, पार्टी नेता जेल में बंद जौनपुर से बसपा सांसद धनंजय सिंह से भी संपर्क बनाए हुए हैं. बाबू सिंह कुशवाहा को शामिल किए जाने से पार्टी की आंतरिक कलह भी सामने आ रही है. पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ ही किरीट सोमैया को भी उनकी हैसियत बता दी गई है. हाल में पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री एवं भ्रष्टाचार उजागर समिति के अध्यक्ष किरीट सोमैया ने बाबू सिंह कुशवाहा पर सचान हत्याकांड और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत कई फ़र्ज़ी कंपनियों के ज़रिये एक हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया था. अब वही कुशवाहा भाजपा में शामिल हो गए हैं. ऐसे में कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं कि वे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता के सवालों का किस तरह सामना करेंगे. कुशवाहा के मामले में पार्टी दो ख़ेमों में बट गई है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, प्रदेशाध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही और विनय कटियार कुशवाहा के पक्ष में हैं तो सुषमा स्वराज, मुख्तार अब्बास नक़वी और एस एस अहलूवालिया उनके ख़िलाफ़ है. कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने भाजपा को भ्रष्टाचारियों की धर्मशाला क़रार देते हुए कहा कि इस चुनाव में भाजपा का सफ़ाया होने वाला है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी ने कटाक्ष किया कि भाजपा के पास विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की कमी है, इसलिए वह बसपा से निकाले गए नेताओं को अपना बना रही है. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा कि बीएसपी के कलंक, बीजेपी के तिलक. इस सबके बावजूद भाजपा दाग़ियों को पार्टी में बनाए रखने के मूड में है. पार्टी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नक़वी भी कुशवाहा मामले में सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे हैं. बिहार के मुख्यमंत्री एवं जदयू नेता नीतीश कुमार ने कहा कि भाजपा ने कुशवाहा को पार्टी में शामिल करके ग़लत परंपरा की शुरुआत की है. कुशवाहा मुद्दे पर पत्रकारों ने टीम अन्ना से भी पूछा कि अब भाजपा के बारे में उनका क्या कहना है? इस पर टीम अन्ना के अहम सदस्य संजय सिंह ने कहा कि कुशवाहा को भाजपा में शामिल किया जाना यह साबित करता है कि वह भी भ्रष्टाचारियों से रिश्ते जोड़ने में पीछे नहीं है. उन्होंने भाजपा के उस बयान की निंदा की, जिसमें कहा गया था कि गंगा में नाले पवित्र हो जाते हैं. कुशवाहा पार्टी के गले की ऐसी हड्डी बन चुके हैं, जिसे वह न निग़ल सकती है और न उगल सकती है. भाजपा को लगता है कि कुशवाहा को निकालने से ज़्यादा फ़ज़ीहत होगी, इसलिए अब वह उन्हें केंद्र की यूपीए और प्रदेश की बसपा सरकार के पीड़ित के रूप में पेश कर रही है. पिछड़ों की उपेक्षा, दाग़ियों को पार्टी में शामिल करने, नेताओं की संतानों को टिकट देने आदि के चलते भाजपा में कलह पैदा हो गई है. वर्चस्व की लड़ाई में शामिल नेताओं की ख़ेमेबाज़ी से कार्यकर्ता कशमकश में हैं.

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