फ़िरदौस ख़ान
हाल में आरोही प्रकाशन ने रेणु हुसैन की कविताओं के दो संग्रह प्रकाशित किए हैं. पहला कविता संग्रह है पानी-प्यार और दूसरे कविता संग्रह का नाम है जैसे. अंग्रेज़ी की वरिष्ठ अध्यापिका रेणु हुसैन स्कूल के वक़्त से ही कविताएं लिख रही हैं. वह बताती हैं कि स्कूल में उनकी एक सहेली कविताएं लिखा करती थी. उसे कविताएं लिखते देख और उसकी कविताएं प़ढकर उन्हें बहुत अच्छा लगता था. उनकी सहेली ने उनसे कविता लिखने को कहा और तब से उन्होंने भी अपनी भावनाओं को शब्दों में ढालना शुरू कर दिया. इन्हीं शब्दों ने कविता का रूप धारण कर लिया. वह कहती हैं कि कोई सहज मानवीय भावना होती थी, जो बार-बार अंतर में हिलोरें मारती थी और कहती थी कि मुझे बोल दो, मुझे अभिव्यक्ति दो. उस वक़्त यही कोशिश रहती थी कि ज़्यादा से ज़्यादा भारी भरकम और सुंदर दिखने वाले शब्दों में कविता लिखी जाए. शब्दों का चयन करने में बहुत मेहनत करनी प़डती थी. तब कविता लिखने के मक़सद छोटे-छोटे हुआ करते थे. मसलन, स्कूल की किसी कविता प्रतियोगिता में पुरस्कार जीतना, अध्यापकों की शाबाशी हासिल करना और अपनी कविता सुनाकर दोस्तों से तारीफें सुनना. कविता लिखकर एक अजीब-सी ख़ुशी और सुकून मिलता था. यह मालूम ही नहीं पड़ा कि कब कविता लिखना ज़िंदगी का शग़ल बन गया. बहुत-सी सहानुभूतियां, बहुत-सी घटनाएं, बहुत-सी चाहतें और टीसें कविता लिखने के लिए मजबूर करती रहीं. जब कोई नाउम्मीदी आ घेरती या कोई खंडित भावना मन में टीस पैदा करती या फिर अचानक मिल जाने वाली कोई ख़ुशी दामन में रौशनी भर देती तो एक कविता लिखी जाती. धीरे-धीरे सब सहज होता गया. शब्दों का बनावटीपन पीछे छूटता गया और भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति पास आती चली गई. यह सच है कि पहले कविता अपने लिए ही लिखी जाती है, लेकिन अपनी अंतिम परिणति में कविता व्यक्तिगत नहीं रहती. कहा जा सकता है कि कविता व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक होती है. कविता लिखना एक सामाजिक कार्य बन जाता है. रेणु हुसैन की कविता अहसास उनकी भावनाओं को दर्शाती है :-
अपनी कविता में
पाती हूं
एक सुख अहसास
अपनी कविता में होती हूं
द के कितने पास

दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज के वरिष्ठ प्राध्यापक मुकेश मानस लिखते हैं, रेणु हुसैन की सीधी और सरल लगने वाली कविताओं के भीतर समकालीन मनुष्य के जीवन की तमाम जटिलताएं छिपी हुई हैं. अक्सर कहा जाता है कि स्त्री जब लिखना शुरू करती है तो वह अपनी संवेदनाओं की सहज अभिव्यक्ति करती है. वह खुद से खुद ही बात करती है. स्त्री लेखन के संदर्भ में यह अप्रासंगिक भी नहीं है. स्त्री लेखन के बारे में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के महान लेखन के बारे में यह बात उतनी ही सच है. इन कविताओं के बारे में यह कहना एकदम सही होगा कि इन कविताओं की भाव-भूमि में प्रवेश करते ही हमारी भेंट एक साधारण स्त्री के व्यापक रचना संसार से होती है. इन कविताओं के भीतर एक स्त्री का पूरा का पूरा अनुभूत संसार सांस ले रहा है. इन कविताओं के रचना संसार के भीतर उतरने पर हमें पता चलता है कि उसमें एक स्त्री की कोमल और गंभीर संवेदनाएं हैं. इन कविताओं में उसकी आशा-निराशा, उसकी घुटन-बेचैनियां स्वतंत्रता के अहसाससे भरी सुबहों की कामना, जटिल जीवन परिस्थितियों में सहज मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखने की जद्दोजहद झलकती है. यूं तो प्रेम इन कविताओं की मूल भाव-भूमि है. प्रेम स्त्री के लिए सबकुछ है. यह प्रेम ही उसे बचाए रखता है. उसका सारा संघर्ष इसी प्रेम को बचाए रख पाने के लिए है. प्रेम हर युग में और हर मायने में मानवता के लिए ज़रूरी है. ये कविताएं कवयित्री के वैयक्तिक प्रेम और उसकी अनुभूतियों को बचाए रखने के उसके संघर्ष से आगे चलती हुई उसके सहज व्यापक मानवीय प्रेम की भावनाओं तक हमें पहुंचाती हैं. वर्तमान जीवन की परिस्थितियों में सहजता के लिए जगह कम ही रह गई है. जीवन की भागदौ़ड और बद से बदतर होती परिस्थितियों में इन्हें बचाए रख पाना एक बेहद मानवीय और साहसिक कार्य है. एक रचनाकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है. सहज मानवीय संवेदनाओं की सरल अभिव्यक्ति ही इन कविताओं की ताक़त है. इन कविताओं में शाब्दिक बनावट में कृत्रिमता नहीं है. पंडिताऊ शब्दों की भरमार नहीं है. सरल भाषाई गठन इन कविताओं की विशिष्टता है.

काव्य संग्रह पानी प्यार उन्होंने अपने पिता और अपने पति शाहनवाज़ हुसैन को समर्पित किया है. शाहनवाज़ हुसैन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं. इस काव्य संग्रह में शामिल उनकी कविताएं जीवन के विभिन्न रंगों को बख़ूबी दर्शाती हैं. उन्होंने प्यार की तुलना पानी से की है, क्योंकि पानी की तरह ही प्यार भी अपने रास्ते, अपनी जगह ख़ुद बना लेता है. अपनी कविता पानी प्यार में उन्होंने इसे ख़ूबसूरती से पेश किया है :-

हसीन कोई लम्हा होता है
प्यारा-सा कोई मौसम
धरती के उजले आंचल से
चांदनी की हल्की फुहार-सा
जब फूट निकलता है पानी
सुंदर सपने-सा होता है
झरने, नदियां और समंदर
सब पानी से बनते हैं
सब सीमाएं ढह जाती हैं
सब बंधन खुल जाते हैं
पानी गर बह निकले तो
रास्ते खुद बन जाते हैं
आगे ब़ढता जाता है
पानी बहता जाता है
पानी की फितरत है बहना
राह के पत्थर
पाप जहां के
पानी में सबकुछ बह जाए
प्यार है पानी
पानी-प्यार
जैसे बहता रहता है पानी
वैसे बहता रहता प्यार

उनकी कविताओं में कहीं कोई बनावटीपन नज़र नहीं आता. सरल शब्दों में मन के भावों की अभिव्यक्ति ही उनकी खासियत है, उनकी कविता सुबह को ही लीजिए :-
चांदनी-सी चाहत तुम्हारी
महक बनकर
फैल जाती है मेरे चारों ओर
रात होती है
तो बस जाती है आंखों में
जागते हुए एक ख्वाब-सा
देखती हूं
तुम्हारी यादों की महक में
डूब जाती है मेरी नींद
ओस पड़ जाती है
मेरे चेहरे पर
इस तरह मेरी ज़िंदगी में
चाहत के झरने से निकलकर
चुपके-चुपके
सुबह आती है

उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार किया है. उनकी कविता एक दिन बुरक़ा प्रथा के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की हालत को बयां करती है :-
उसने जन्म लिया
उसने बुरक़ा पहना
उसने सीमा बांधी
एक दिन
उसकी शादी हो गई
उसने बात मानी
उसने घर बनाया
फिर एक दिन
जाने क्या हुआ
जाने क्यूं
उसे मिल गई दुनिया से मुक्ति

उनके काव्य संग्रह जैसे में संग्रहित कविताएं भी मानवीय संबंधों और उनसे जु़डी भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं. यह कविता संग्रह उन्होंने अपनी मां को समर्पित किया है. उन्होंने अपनी कविता औरत की ज़िंदगी में स्त्री जीवन के स़फर को बख़ूबी पेश किया है :-
एक ही धरती पर
एक ही आसमान के नीचे
एक से दो घर
इन्हीं दो घरों में
एक औरत करती है सफ़र
एक घर में खिलती है
फैल जाती है
दूसरे में क़ैद होकर सिमट जाती है
एक औरत की ज़िंदगी
इन्हीं के दरम्यां कट जाती है

बहरहाल, दोनों कविता संग्रह पठनीय हैं और काव्य प्रेमियों को रेणु हुसैन की कविताएं पढ़कर सुकून का अहसास होगा.

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