एम. एल. धर
                जम्मू और कश्मीर की आर्द्र भूमि में सर्दी के महीनों में रहने के बाद करीब दस लाख प्रवासी पक्षी अपने महाद्वीपों की ओर चले गए। ये आर्र्द्र भूमि मध्यवर्ती एशियन उड़ान मार्ग में पड़ती है जहां सर्दी में प्रवासी पक्षी आते हैं। ऐसी आर्द्र भूमि परिवेश तथा जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है।
      जैव विविधता को बनाये रखने, जल संरक्षण तथा जल की उपलब्धता के लिए आर्द्र भूमि आवश्यक है। जम्मू और कश्मीर के लोगों की आर्थिक गतिविधियों में आर्द्र भूमि महत्वपूर्ण  भूमिका निभाती है। राज्य की बड़ी आर्द्र भूमि, वुलार लेक का ही मामला लें, जो घाटी में महत्वपूर्ण परिवेश का निर्माण करती है तथा जैव विविधता को सहारा देती है। जल का बड़ा जलाशय, वनस्पति का भंडार होने के अलावा ये प्रवासी पक्षियों को सर्दियों में शरण देता है। इससे घाटी में रहने वाले हजारों लोगों का जीवन यापन होता है तथा घाटी में कुल  मछली पालन का साठ प्रतिशत इससे प्राप्त होता है। इसके अलावा इसके जल से अन्य उत्पादों का भी संरक्षण किया जाता है।
      राज्य में 29 आर्र्द भूमि हैं, कश्मीर में 16, जम्मू में आठ तथा लद्दाख में पांच। पक्षियों की करीब 106 प्रजातियां इन आर्द्र भूमियों में आश्रय लेती हैं इनमें से स्थानीय पक्षियों की 25 प्रजातियां समय-समय पर आती जाती रहती हैं।
      इन आर्द्र भूमियों का महत्व इस लिए भी बढ़ जाता है कि ये प्रवासी पक्षियों को अभय शरण स्थल प्रदान करते हैं। इनमें से कुछ पक्षियों की प्रजातियां पहले ही खतरे में पड़ चुकी हैं। जम्मू और कश्मीर आर्द्र भूमि के सर्वे के अनुसार सफेद-आखों वाले बतख राज्य में सात आर्द्र भूमियों में तथा जम्मू में दो आइबिस पक्षियों यानी इन दो विलुप्ती के करीब प्रजातियों को देखा गया। सर्वेक्षण से यह भी पता जला है कि खतरे मे पड़ी दो प्रजातियों अर्थात् काली गर्दन वाले सारस तथा सारस क्रेन लद्दाख में आर्द्र भूमि में तथा जम्मू क्षेत्र में घराना आर्द्र भूमि में देखे गए।
      मनुष्यों के लोभ तथा बढ़ती जनसंख्या के कारण ऐसी कई आर्द्र भूमियां सिकुड़ रही हैं। "कश्मीर घाटी में 600 छोटी तथा बड़ी आर्द्र भूमियां हुआ करती थीं। अब केवल 10 से 15 आर्द्र भूमि बची हैं तथा वे भी खत्म होने के करीब हैं।" ऐसा सेन्टर फार एनवायरमेंटल ला के वरिष्ठ कर्मी ने कहा।
      जम्मू के बड़े शुष्क क्षेत्र में जिसमें रामगढ़ क्षेत्र में नागा आर्द्र भूमि रिजर्व (1.21 स्केयर कि.मी.) तथा अबदुलियन क्षेत्र में संगराल आर्द्र भूमि रिजर्व (0.68 स्केयर कि.मी.) में स्थिति बेहतर नहीं हैं और ये पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं जबकि कईयों का आकार काफी घट गया है।
      नांगा गांव के सरपंच ने बताया कि अब इस क्षेत्र में प्रवासी पक्षी नहीं आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 25 साल पहले यहां काफी आर्द्र भूमि थी। यहां बड़ा तालाब था जो कि अब पूरी तरह से सूख गया है। बड़े-बूढ़ों ने बताया कि सर्दियों में प्रवासी पक्षियों के झुंड आया करते थे किंतु समय के साथ-साथ स्थानीय लोगों ने भूमि का उपयोग खेती के लिए करना शुरू कर दिया तथा प्रवासी पक्षियों ने बढ़ती गतिविधियां देख आना बंद कर दिया।

      मनुष्य और प्रकृति के बीच का तनाव इस उजाड़ परिदृश्य के लिए जिम्मेदार है। स्थानीय लोगों का यह मत रहा है कि पक्षियों के आने से वे फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए वे इनके खिलाफ हैं।
            इन जल निकायों को 1981 में संरक्षित आर्द्र भूमि घोषित किए जाने के बावजूद बचाया नहीं जा सका। पर्यावरण पर्यटन के रूप में उभरे घराना आर्द्र भूमि के आसपास के गांव वाले पक्षियों को उड़ा दिया करते थे, लेकिन 2003 से स्थिति में सुधार हुआ है। वन्य जीव विभाग ने भी स्थानीय लोगों को समझाया बुझाया कि वे पक्षियों के आगमन को बाधित न करें। जम्मू के एक वन्य जीव संरक्षक ने बताया कि गांव वालों की तरफ से अधिकतम सहयोग पाने के लिए वन्य विभाग लगातार कोशिश करता रहा है। इसके तहत विभाग ने उन किसानों को हर्जाना देने की भी शुरूआत की जिनके फसल को नुकसान पहुंचता है। इन सभी उपायों का अंतिम उद्देश्य  आर्द्र भूमि को बचाना रहा है जो तेजी से बर्बाद हो रहे हैं।
      विशेषज्ञों का कहना है कि पेड़ों की बेरोक-टोक कटाई से मृदा क्षरण एवं बारिश के साथ मिट्टी का बहाव, जल निकायों के आसपास मानव अतिक्रमण और संबंधित विभागों की उदासीन रवैया एवं अदूरदर्शी नीतियों की वजह से आर्द्र भूमि का क्षरण और संकुचन हो रहा है। उन्होंने बेमिना आवासीय कालोनी का उदाहरण देते हुए कहा कि 19वीं शताब्दी के समापन तक श्रीनगर में यह एक अद्भूत आर्द्र भूमि हुआ करती थी। विशेषज्ञों ने बताया कि इस दिशा में लापरवाही जारी रही। उन्होंने रख अरथ आर्द्र भूमि का उदाहरण भी दिया, जिसे डल झील में रह रहे लोगों के पुनर्वास के लिए भरा जा रहा है।
      व्यक्तिगत स्तर पर सिर्फ लोग ही नहीं बल्कि नियामक स्तर पर सरकार भी आर्द्र भूमि के मामले में दखल देती रही है। उन्होंने भूमि के इस्तेमाल का तरीका न सिर्फ आर्द्र भूमि के अंदर बदला बल्कि जल ग्रहण में भी बदला। व्यक्तिगत और सरकारी स्तर पर दावें की प्रक्रिया भी जारी रही, इससे आर्द्र भूमि सिकुड़ती चली गई और आर्द्र भूमि का पर्यावरण भी बदल गया। जब पर्यावरण बदला, तो आवास भी बदला। केन्द्रीय आर्द्र भूमि नियामक प्राधिकरण के सदस्य ए आर युसूफ ने बताया कि इसका पक्षियों पर भी असर पड़ा जिनकी ये आर्द्र भूमि खास आवास हुआ करते थे।
      राज्य के दो प्रमुख आर्द्र भूमि वुलर झील और मिरगुंड अपने वास्तविक विस्तार से सिकुड़ कर अब क्रमश 58.71 वर्ग किलोमीटर और 1.5 वर्ग किलोमीटर रह गया है। प्रोफेसर युसूफ ने बताया कि वुलर झील को कभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली हुई थी लेकिन 1950, 1960 और 1970 के दशक में सरकारी प्राधिकरणों ने इस जल निकाय के चारों ओर बांध बना दिए और झील के एक बड़े क्षेत्र पर दावा करते हुए विली (बेंत की तरह पतली लचकदार डाली वाला पेड़) की रोपाई शुरू की। लोगों ने भी आर्द्र भूमि के इलाके में धान की खेती शुरू कर दी।
      कश्मीर की प्राकृतिक छटा में आकर्षण का विशेष केन्द्र बिन्दु रही डल झील भी मनुष्यों की लालच और अनदेखी का शिकार बनी। यह भी तेजी से सिकुड़ते हुए 75 वर्ग किलोमीटर के विस्तार से हट कर महज 12 वर्ग किलोमीटर तक में रह गया है जबकि एक अन्य आर्द्र भूमि हैगम भी अपनी वास्तविक विस्तार से घटकर आधा 7.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सिकुड़ गया है। अन्य आर्द्र भूमि भी इसी तरह सिकुड़ रही हैं।
      आर्द्र भूमि पर इस तरह के मंडराते खतरे देख केन्द्र और राज्य सरकार सुधार की दिशा में कदम बढ़ाने को मजबूर हुई। राज्य सरकार ने जल निकायों को उनकी पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व को देखते हुए उनके संरक्षण के लिए केन्द्र सरकार के साथ कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाये हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि राज्य में पर्यटन को बचाए रखने और आर्थिक संसाधनों को बचाए रखने के लिए जल निकायों का संरक्षण, वन्य संपदा और जैव विविधता का संरक्षण समय की मांग है।
      वूलर झील के विशिष्ट जलीय और सामाजिक-आर्थिक महत्व को महसूस करते हुए केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इसे अपने आर्द्र भूमि कार्यक्रम में 1986 में राष्ट्रीय महत्व की आर्द्र भूमि के रुप में शामिल किया। इसके बाद 1990 में रामसर समझौते के तहत इसे राष्ट्रीय महत्व की आर्द्र भूमि के रुप में नामित किया गया। वूलर और होकेरसर के अलावा जम्मू-कश्मीर में तीन अन्य आर्द्र भूमि – लद्दाख में सोमोरिरि और जम्मू क्षेत्र में मनसर तथा सूरिनसर झील के संरक्षण के लिए इन्हें रामसर समझौते के तहत सूचीबद्ध किया गया है। केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इसके आस-पास निर्माण, और उद्योगों की स्थापना पर रोक लगाकर तथा उद्योग और इंसानी बस्तियों द्वारा किसी प्रकार के अपशिष्ट को फेंकने अथवा उत्प्रवाही के निस्सरण को वर्जित कर इसे संरक्षित स्थल के रुप में सूचीबद्ध किया है। इस संबंध में देश भर में संरक्षण के लिए आर्द्र भूमि की पहचान के अलावा विस्तृत नियमावली के क्रियान्वयन और समीक्षा के लिए 12 सदस्यीय केन्द्रीय आर्द्र भूमि नियामक प्राधिकरण की भी स्थापना की गई।

      राज्य सरकार भी जल निकायों को बचाने की कोशिश में लगी रही है, जिन्हें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ‘विरासत के प्रतिरुप’ के रुप में संबोधित किया और इनके संरक्षण के लिए प्रदेश की जनता भी चिंतित है। इन झीलों की समस्याओँ के संदर्भ में हाल के वर्षों में बहुत सी रिपोर्टे और कार्य योजना प्रकाश में आई है।

      स्थिति के महत्व के मद्देनज़र राज्य सरकार ने झील और जलमार्ग विकास प्राधिकरण (एलएडब्ल्यूडीए), वूलर मनसबल विकास प्राधिकरण (डब्ल्यूएमडीए) आदि प्राधिकरणों की स्थापना की है ताकि झीलों की सफाई और उनका संरक्षण किया जा सके। जैसा कि एलएडब्ल्यूडीए मुख्य तौर पर डल झील को पुनः स्थापित करने और डब्ल्यूएमडीए मनसबल झील के संरक्षण में तत्पर है इसलिए राज्य सरकार ने वूलर झील को पुनर्जीवित करने के लिए वूलर विकास प्राधिकरण के गठन का निर्णय किया।

      इन सभी प्रयासों के सार्थक परिणाम प्राप्त होंगे बशर्ते इसे लोगों का सक्रिय योगदान मिले। मनसबल झील के संरक्षण में यह महत्वपूर्ण कारक रहा था। बड़े पैमाने पर जागरुकता फैलाने की आवश्यकता है और इस प्रक्रिया में विस्थापित हुए लोगों की समस्याओं के बारे में अधिकारियों को संवेदनशील होना होगा। आधिकारिक प्रयासों की सहायता के लिए गैर सरकारी संगठनों और मीडिया द्वारा सौहार्दपूर्ण जन आंदोलन की भी आवश्यकता है। यह एक लंबा और मुश्किल सफर हो सकता है किंतु स्वस्थ पर्यावरण

 सुनिश्चित करने तथा स्थानीय आबादी के आर्थिक हितों की रक्षा के लिए ‘विरासत की इन प्रतिमाओं’ को बचाने के रास्ते पर चलना होगा।

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