फ़िरदौस ख़ान
घातक संक्रामक बीमारी टीबी के उन्मूलन के काम में जुटे डॉट्‌स कर्मचारियों की हालत बेहद दयनीय है. उन्हें मलाल है कि इस महंगाई के दौर में उन्हें बेहद कम वेतन पर गुज़ारा करना पड़ रहा है. ईपीएफ, बोनस एवं महंगाई भत्ते की बात छोड़िए, उनका साधारण दुर्घटना बीमा तक नहीं है. उनका कहना है कि देश में तपेदिक यानी टीबी से हर रोज़ एक हज़ार लोगों की मौत होती है. वे तमाम मुश्किलों के बावजूद इसके समूल विनाश के लिए जी-जान से जुटे हैं. नतीजतन, इसके उन्मूलन की दर 30 फीसदी से बढ़कर 85 फीसदी हो गई है. उनके इस सराहनीय कार्य के बावजूद सरकार ने उनकी समस्याओं की तऱफ कोई ध्यान नहीं दिया, जिसकी वजह से उनका भविष्य अंधकारमय हो गया है.

ग़ौरतलब है कि देश में राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम 1962 में शुरू हुआ था, लेकिन इसमें क्षय मुक्त दर 30 फीसदी से कम थी. इस संबंध में 1992 में हुई समीक्षा के बाद चिकित्सा वैज्ञानिकों ने डॉट्‌स प्रणाली की खोज की, जिसे 1995 में उत्तर प्रदेश के आठ ज़िलों में बतौर पायलट प्रोजेक्ट जांचा-परखा गया. नतीजे का़फी उत्साहजनक आए. क्षय मुक्त दर इसमें 85 फीसदी से भी अधिक थी, तब जाकर केंद्र सरकार ने 1997 से इस प्रणाली को देश भर में लागू करने का फैसला किया. आज इसे दुनिया भर में अपनाया जा रहा है. इसी दौरान केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से डॉट्‌स प्रणाली के सफल संचालन के लिए अतिरिक्त पद सृजित करने की अपेक्षा की थी, लेकिन राज्य सरकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और फिर केंद्र सरकार ने भी डॉट्‌स प्रणाली को जल्दी लागू करने के चक्कर में ज़िला क्षय रोग नियंत्रण समिति गठित कर उक्त पदों को संविदा पर भरने की इजाज़त दे दी. इस तरह देश में डॉट्‌स कार्यक्रम तो शुरू हो गया, लेकिन उसमें कार्यरत 23 हज़ार कर्मचारियों के पद आज तक सृजित नहीं हो पाए हैं. हालत यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें डॉट्‌स कर्मचारियों की समस्याओं की अनदेखी करते हुए उनकी बदहाली के लिए एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं.

पांच लाख की आबादी पर एक वरिष्ठ उपचार पर्यवेक्षक और एक वरिष्ठ क्षय प्रयोगशाला पर्यवेक्षक कार्यरत है. उनके कंधों पर कार्यक्रम का पूरा भार रहता है. वे निर्धारित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए दिन भर दौड़-भाग करते हैं. उनकी शैक्षिक योग्यता स्नातक है. प्रयोगशाला में संदिग्ध क्षय रोगियों के बलग़म की जांच करने वाला माइक्रोस्कोपिस्ट इंटरमीडिएट के साथ डीएमएलटी है, तो क्षय रोगियों की देखभाल में लगा टीबी हेल्थ विजिटर इंटरमीडिएट है. डाटा एंट्री ऑपरेटर भी स्नातक के साथ कंप्यूटर में डिप्लोमा रखता है, लेकिन इन सबका मानदेय शिक्षा, कार्य और पद की गरिमा की अपेक्षा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से भी कम है. यही नहीं, मातृत्व एवं चिकित्सा जैसे अवकाश भी उनके लिए मान्य नहीं हैं. 2009 में उनका मानदेय बढ़ाया गया तो पुराने इंक्रीमेंट काट दिए गए, जिससे उन्हें बहुत ज़्यादा लाभ नहीं मिला, स़िर्फ दिल्ली प्रदेश में ही पुराने इंक्रीमेंट दिए जा रहे हैं. उन्हें दैनिक भत्ता देने का प्रावधान है, लेकिन यह स़िर्फ छत्तीसगढ़ में दिया जा रहा है. उन्हें मानदेय भी समय से नहीं मिलता है, फिर भी वे उन क्षय रोगियों की सेवा में लगे हैं, जिन्हें समाज हीन दृष्टि से देखता है.

ऑल इंडिया टीबी एम्पलॉय एसोसिएशन के जोनल प्रभारी मृदुल कुमार सिंह कहते हैं कि हम जीवन का अमूल्य समय क्षय रोगियों की सेवा में लगा चुके हैं. कल क्या होगा पता नहीं? आज भी हर वर्ष संविदा नवीनीकरण शोषण, खौफ एवं अनिश्चितता का पर्याय बना रहता है. भले ही सरकार हमें नियमित न करे, लेकिन डॉट्‌स कार्यक्रम के चलने तक पर्याप्त मानदेय और मूलभूत सुविधाओं के साथ-साथ हमारा भविष्य सुरक्षित कर दे. हम उसी में संतुष्ट हो जाएंगे, पर सरकार कुछ करे तो.

चिकित्सा विशेषज्ञों की मानें तो टीबी से लड़ाई अभी बहुत लंबी चलनी है. इसके पीछे उनका तर्क है कि एड्‌स के आने से जहां टीबी और आक्रामक हो गई, वहीं क्षय जीवाणुओं के मुख्य औषधि रिफाम्पीसिन एवं आइसोनियाजिट से लड़ने में सक्षम होने की वजह से यह और भी जानलेवा हो रही है. वहीं पिछले दिनों आर्थिक राजधानी मुंबई में इसके भयावह स्वरूप टीडीआर से ग्रसित दर्जन भर रोगी मिले हैं, जिन पर टीबी की कोई दवा असर नहीं कर रही है और वे एक-एक कर मर रहे हैं. देश में बढ़ता कुपोषण जहां इसे फलने-फूलने का पूरा मौक़ा दे रहा है, वहीं मधुमेह जैसी बीमारियां इसके इलाज में आड़े आ रही हैं. आंकड़ों को देखें तो देश की तक़रीबन 40 फीसदी आबादी टीबी से संक्रमित है. प्रतिदिन 20 हज़ार लोग इससे संक्रमित और पांच हज़ार लोग ग्रसित हो रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 2010 में टीबी पर जारी रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में 2010 में 20 से 25 लाख लोग टीबी का शिकार हुए हैं. हैरानी की बात यह है कि सरकार डॉट्‌स कार्यक्रम को प्रभावी बनाने की बजाय उससे जु़डे कर्मचारियों की अनदेखी कर रही है. समस्याओं के कारण डॉट्‌स कर्मचारी मानसिक तनाव का शिकार हो रहे हैं. फैज़ाबाद के विमल कुमार ज़िंदगी से हार चुके हैं. झांसी के कमलेंद्र कंचन ज़िले की मासिक बैठक में जाते समय सड़क हादसे का शिकार हो गए. उनकी मौत के बाद उनका परिवार आर्थिक संकट से जूझ रहा है. फर्रु़खाबाद के ब्रजेश कुमार को टीबी लील गई. उनके परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है. ये तो महज़ कुछ उदाहरण हैं, देश के अन्य हिस्सों में भी डॉट्‌स कर्मचारियों की कमोबेश यही हालत है.

तीन साल पहले देश भर के डॉट्‌स कर्मचारी राष्ट्रीय परिचय सम्मेलन के बहाने अलीगढ़ में इकट्ठे हुए थे और उन्होंने ऑल इंडिया टीबी एम्पलॉय एसोसिएशन की आधारशिला रखी थी. इसके बाद उन्होंने अपनी मांगों के संबंध में लखनऊ, पटना, देहरादून एवं भोपाल से लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक धरने-प्रदर्शन किए. मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक को ज्ञापन दिए, लेकिन किसी ने उन्हें तवज्जो नहीं दी. थक-हारकर क्षय नियंत्रण कर्मचारी एवं जन कल्याण समिति बाराबंकी के महामंत्री अमित सिंह राठौर ने निजी संबंधों के चलते अपनी समस्या केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के माध्यम से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद के सामने रखी. पहले तो उन्होंने इसे गंभीरता से देखने की बात कही, लेकिन बाद में उन्होंने भी उन्हें राज्यों के अधीन बताकर अपनी ज़िम्मेदारी से हाथ खड़े कर लिए. एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवींद्र मणि त्रिपाठी कहते हैं कि केंद्र सरकार पूरे देश में डॉट्‌स कार्यक्रम चला रही है, वही इसका पूरा खर्च वहन करती है, इसमें कार्यरत कर्मचारियों का मानदेय और उन्हें दी जाने वाली अन्य सुविधाएं तय करती है. राज्यों का इसमें कोई द़खल नहीं होता. एसोसिएशन की अलीगढ़ इकाई के जिलाध्यक्ष सा़फ कहते हैं कि मांगने से भीख नहीं मिलती, लेकिन लेने से तख्तो-ताज तक मिल जाते हैं. अगर सरकार समय रहते उनकी मांगें पूरी नहीं करती है तो उन्हें मजबूरन स़डकों पर उतरना प़डेगा. बहरहाल, डॉट्‌स कर्मचारी तमाम मुश्किलों के बावजूद जानलेवा टीबी के उन्मूलन में अपना खून-पसीना बहा रहे हैं. सरकार को चाहिए कि वह उनकी समस्याओं के समाधान के लिए फौरी तौर पर क़दम उठाए. डॉट्‌स कर्मचारी बेहद ज़िम्मेदारी के काम में लगे हैं. अगर उनकी हालत ठीक रहेगी तो वे और भी बेहतर तरीक़े से अपने काम को अंजाम दे पाएंगे.

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