फ़िरदौस ख़ान
भारतीय समाज में प्राचीन काल से लेकर आज तक सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है. उस वक़्त भी ताक़तवर व्यक्ति अपने फ़ायदे के लिए कमज़ोर व्यक्ति का इस्तेमाल करता था, और आज भी ऐसा ही हो रहा है. उस दौर में भी लोग सत्ता के लिए अपनों के ख़ून के प्यासे हो जाते थे और साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाने में कोई गुरेज़ नहीं करते थे, उसी तरह मौजूदा दौर में भी नेतागण येन-केन-प्रकारेण कुर्सी हासिल कर लेना चाहते हैं. हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब सतगुरु हमसों यों कहियो में महाभारत के पात्रों के बहाने वर्तमान परिस्थितियों को बयां किया गया है.

किताब की लेखिका डॉ. पुष्पम कहती हैं, जीवन एक रणक्षेत्र की तरह है, जिसमें सतत संघर्ष की स्थिति बनी रहती है. यह संघर्ष व्यक्तिगत, जातिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो सकता है. जीवन से जु़डा एक रोचक तथ्य यह भी है कि शांति और अहिंसा जैसी धारणाओं को आदर्श तो माना जाता है, सार्वभौमिक सौहार्द्र या वसुधैव कुटुंबकम जैसी कल्पना भी अच्छी लगती है, लेकिन यह परस्पर सद्‌भाव के बिना संभव नहीं होती है. आदर्श और यथार्थ, स्वप्न और वास्तविकता के बीच खींचतान चलती रहती है. हर व्यक्ति आवश्यक या अनावश्यक रूप से किसी न किसी स्तर पर अपने स्वार्थ-साधन में लगा रहता है. जिस क्षण उसकी स्वार्थ पूर्ति में व्यवधान पड़ता है, वह लड़ने की मुद्रा में खड़ा हो जाता है. तब शांति एवं सद्‌भाव के उपदेश कोरे शब्दों के जाल प्रतीत होने लगते हैं. ग्रंथ के रूप में महाभारत को घर में रखने की मनाही थी, बल्कि अभी भी है. कहा जाता है कि यह जिस घर में रहता है, वहां महाभारत छिड़ जाता है. लेकिन इस संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आम आदमी इस इतिहास के मर्म को समझ ले तो घर-घर में होने वाले छोटे-बड़े झगड़े संभवत: नहीं होंगे.

हज़ारों वर्ष पूर्व के ऐतिहासिक पात्रों और वर्तमान युग में चलते-फिरते मनुष्यों की प्रवृत्तियों एवं मनोवृत्तियों में जो आश्चर्यजनक साम्य है, वह विशेष रूप से आकर्षित करता है. इतने लंबे अंतराल के बाद भी युगों के मानवों की मानसिकता में विद्यमान समानता महाभारत के उन पौराणिक पात्रों के व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने के लिए प्रेरित करती है. यदि मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महाभारत के पात्र गांवों, नगरों, गलियों में, स़डकों पर जहां-तहां दिख जाएंगे. उनमें धृतराष्ट्र, दुर्योधन और शकुनि बहुसंख्यक मालूम पड़ते हैं. शायद धर्म ने अपने पुत्र को पुन: मानव-देह धारण करने के कष्ट से मुक्त कर दिया है. इसलिए युधिष्ठिर कहीं नज़र नहीं आते हैं. इक्के-दुक्के अर्जुन गीता के उपदेशों की सार्थकता ढूंढते इधर-उधर भटकते हुए भले ही मिल जाएं. भीम अपनी संवेदनाओं और पराक्रम को समेटे कहीं एकांतवास में हैं. और नकुल-सहदेव अपने-अपने विशेष गुणों से लैस वर्तमान परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में लगे हुए हैं. गांधारी आज भी आंखों पर पट्टी बांधे किसी न किसी के सहारे चलने का प्रयास कर रही है. कुंती अपनी परिस्थितियों से जूझती हुई आगे बढ़ने के रास्ते तलाश रही है. द्रौपदी को निर्वस्त्र हो जाने का भय आज भी बना हुआ है. लेकिन अबला द्रौपदी धीरे-धीरे रूपांतरित होती हुई सबला बनती जा रही है. उसे रूपांतरण की प्रक्रिया में अनेक विषमताओं का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उसने अपने अंदर सकारात्मक परिवर्तन लाने का जो दॄढ संकल्प कर लिया है, उससे उसे विमुख करना आसान नहीं है. महाभारत की द्रौपदी की मानसिकता अपमान का बदला लेने तक ही सीमित थी, लेकिन वर्तमान युग की द्रौपदी व्यक्तिगत स्तर पर ही जीवनरूपी युद्ध क्षेत्र को जीतकर स्वयं को सम्मानजनक स्थान पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास कर रही है. द्रौपदी को अपमानित करने वाला आज का दुर्याधन पहले से कहीं अधिक पतित हो चुका है. बदले की आग में जलता हुआ दिग्भ्रमित अश्वत्थामा आज भी दुर्याधन की ही छत्र-छाया में पल रहा है. भीष्म एवं आचार्य द्रोण के महत्व को कौरवों ने अपनी स्वार्थपूर्ति तक ही सीमित कर रखा था. भारतीय संस्कृति को गरिमा प्रदान करने वाली उन दोनों विभूतियों को वर्तमान परिस्थिति में तो पूरी तरह अप्रासंगिक बना दिया गया है. विदुर रूपी धर्म के लिए प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्र और दंभी दुर्योधन की हठता को पुन: झेलना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने पूरी तरह पृथ्वी का त्याग कर दिया है और अपनी नीतियों के साथ प्रयाण कर गए हैं. इसलिए निकट भविष्य में उस रूप में धर्म के पुन: दृष्टिगोचर होने की संभावना दिखाई नहीं देती है. और कृष्ण? शायद वह पृथ्वी से धर्म के पूर्णत: विलुप्त होने तक क्षीर सागर में शेष-शय्या पर अगले अवतरण की प्रतीक्षा में योगनिद्रा के आनंद में निमग्न हैं. इधर, इंद्र से पराजित होकर पातालवासी हुए दिति और दनु के पुत्रों ने पृथ्वी पर पुन : अपनी पताका फहरा ली है. और अपनी विवशताओं की सलीब पर लटका हुआ सामान्य मानव पुनर्जीवन प्राप्त करने के लिए प्रतीक्षारत है. इस प्रकार विधाता द्वारा रचे गए सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिकाओं में व्यस्त हैं. दरअसल, भारतीय संस्कृति की विरासत के रूप में महाभारत एक बहुरूपदर्शी की भांति है, जिसके हर कोण से एक नई आकृति दिखाई देती है.

प्राचीन काल से ही भारत में महिलाओं की स्थिति दयनीय रही है. किताब में प्राचीन काल की अनेक मिसालें देकर यह बताया गया है कि किस तरह उस वक़्त की महिलाएं भी बेबस और लाचार थीं. बानगी देखिए, एक दो अपवादों को छोड़कर प्राचीन काल से ही भारतीय समाज पितृ-सत्तात्मक रहा है और उसकी संरचना में भी कोई परिवर्तन नहीं आया है. पितृ-सत्तात्मक समाज के परिवारों में सभी पुरुष मूलत: अपने पिता के परिवार से जु़डे हुए होते हैं. पीढ़ी के अनुसार ये विभिन्न श्रेणियों (पितामह, पिता, पुत्र, पौत्र इत्यादि) में आजीवन उस परिवार का सदस्य रहते हैं, जिसमें उनका जन्म होता है. इस प्रकार सभी पुरुषों को एक ही समूह का सदस्य माना जा सकता है. लेकिन उस परिवार की स्त्रियों के दो समूह होते हैं, एक समूह उन स्त्रियों का होता है, जिनका जन्म उस परिवार में हुआ है और दूसरे समूह की स्त्रियां वे हैं, जो विवाह के उपरांत उस परिवार में लाई जाती हैं. ठीक इसी प्रकार जिन स्त्रियों का जन्म एक परिवार में होता है, वे वैवाहिक रीतियों द्वारा दूसरे परिवार में चली जाती हैं. जिस प्रकार पुरुषों के लिए कुछ नियम होते हैं और उनसे विशेष आचरण की अपेक्षा रखी जाती है, उसी प्रकार दोनों समूहों की स्त्रियों के लिए भी भिन्न-भिन्न नियम निर्धारित किए गए हैं और उनसे तदनुरूप आचरण अपेक्षित होते हैं.

प्राचीन समय में सामान्यत: राजकन्याओं का विवाह किसी विशेष कुल या वंश में करने का कोई न कोई विशेष कारण होता था, जैसे कभी प्रगा़ढ मैत्री के कारण, कभी राजनीतिक संबंध बनाने के लिए या कभी किसी अन्य कारण से. राजा दशरथ ने अपनी कन्या शांता का विवाह अपने मित्र लोमपाद से कर दिया था. राजा शर्याति ने च्यवन ऋृषि को प्रसन्न करने के लिए उनसे अपनी पुत्री सुकन्या को ब्याह दिया. ययाति की पुत्री माधवी का उपाख्यान मन को क्षुब्ध कर देता है. एक बार गालव ऋषि ने ययाति से इतने घो़डे मांगे जितने उसके पास नहीं थे. इसलिए उसने क्षतिपूर्ति के रूप में ऋषि को अपनी कन्या को ही दान में दे दिया. यह कथा स्त्रियों के प्रति संवेदनहीनता के कटुतम उदाहरणों में से एक है. काशीराज की तीन राजकुमारियों में अम्बा सबसे ब़डी थी और उसने मन ही मन शाल्व को अपना पति मान लिया था, लेकिन भीष्म ने अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए स्वयंवर से ही उन तीनों का हरण कर लिया था. दो छोटी बहनों का विवाह तो विचित्रवीर्य से हो गया, लेकिन अम्बा का भविष्य अधर में लटक गया. अंधे धृतराष्ट्र से गांधारी का विवाह निश्चित किया गया, तो गांधारी इस संबंध को अस्वीकार तो नहीं कर पाई, अपने भावी पति के प्रति सहानुभूति में जीवन भर के लिए उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली. पांडु से माद्री के विवाह के लिए मद्र नरेश ने भीष्म से अपार धन प्राप्त किया था. मद्र देश में पुत्री के बदले धन लेने की प्रथा थी. राजा द्रुपद अपनी पुत्री का विवाह ऐसे दक्ष धनुर्धर से करना चाहते थे, जो द्रोण से उनके अपमान का बदला ले सके.

ये सभी दृष्टांत इस तऱफ इशारा करते हैं कि प्राचीन काल में स्त्रियों को किस प्रकार जीवन के अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में निर्णय लेने का अधिकार नहीं था, उसी प्रकार वे विवाह संबंधी निर्णय लेने के अधिकार से भी वंचित थीं. पत्नी पर पति का पूरा अधिकार होता था. स्त्रियों का पतिव्रता होना उनका विशेष गुण माना जाता था. एक रोचक तथ्य पातिव्रत्य से जु़डा हुआ है. पति के आदेश पर पत्नी नियोग विधि से संतान उत्पन्न कर सकती थी. अन्य पुरुष के संसर्ग में आने पर भी उस स्त्री का सतीत्व भंग नहीं होता. पति के जीवित नहीं रहने पर उसकी मां या यानी सास भी ऐसी आज्ञा दे सकती थी. महाभारत की सत्यवती इसी श्रेणी की सास थी.

इतना ही नहीं, उस व़क्त महिलओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था. इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में उनकी पहचान स़िर्फ अपने परिवार के पुरुषों के संबंधों पर आधारित थी, मसलन किसी की बेटी, किसी की बहन और किसी की पुत्री. इसके अलावा उनका अपना कोई वजूद नहीं था. यह किताब महाभारत के विभिन्न पात्रों के चरित्र को बहुत ही अच्छे तरीक़े से पेश करती है. इस किताब को एक बार हाथ में लेने पर, इसे पूरा प़ढे बिना रखना मुश्किल है.

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