फ़िरदौस ख़ान
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज सीआईआई के वार्षिक अधिवेशन को संबोधित किया. अपने पूरे भाषण में उन्होंने देश के समग्र विकास पर ज़ोर दिया. उन्होंने कहा कि यह एक आम धारणा है कि भारत को एक देश के रूप में देखा जाता है. अगर हम थोड़ा पीछे यानी सौ दो सौ साल या फिर उससे भी पीछे जाएं, तो पाते हैं कि भारत को एक शक्ति के रूप में देखा जाता था. अगर एक हज़ार-दो हज़ार साल पीछे जाएं, तो हम पाते है कि हमारी ये शक्ति या क्षमता गंगा, यमुना आदि नदियों के किनारे से निकलकर आती थी. इसका कारण है कि उन दिनों यही वह स्थान था, जो शक्ति का केंद्र था. लेकिन आज के दिनों में हमने एक स्थाई ढांचे का निमाण कर लिया और विकास के दौड़ में होड़ लगा रहे हैं. और अपने केंद्र से आगे निकलकर देश के बाहर भी अपने कौशल का प्रदर्शन कर रहे हैं. कारण आपको अपने को निखारने और बढ़ाने का मौक़ा मिला है. और यही बात आपकी तरफ़ से भी आती है. इसका सीधा जबाब है कि आप लोग ही पहली पंक्ति के वे लोग हैं, जो हमारे नेता हैं, हमारे राजदूत हैं. जो देश के बाहर दुनिया को ये बताने का काम करते हैं कि हमारी क्षमता क्या है? मैं अपने यूनिवर्सिटी के दिनों को याद करूं, तो पाता हुं कि उन दिनों आज के भारत के बारे में किसी ने नहीं उम्मीद की थी. बाहर के लोग देश के बारे में मज़ाक़ किया करते थे, लेकिन इधर पिछले कुछ सालों में आपने जो कर दिखाया है, वह वाक़ई क़ाबिले-तारीफ़ है. इसके लिए मैं आप सभी को दिल से धन्यवाद देता हूं कि आपने वह कर दिखाया, जिसके बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

कई साल पहले की उस अंधेरी रात के बारे में मैं जब भी सोचता हूं, तो दंग रह जाता हूं, जब मै अपने सहयोगियों के साथ देश को जानने के लिए निकला था. हम लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस से यात्रा कर रहे थे. अपने 24 घंटे की जगह 36 घंटे तक चली लंबी यात्रा के दौरान अधिकांश समय अपने सहयात्रियों से बात करता था और और यह जानना चाहता था कि किस तरह हमारे युवा अपने भविष्य को संवारना चाहते हैं और उसके लिए वे क्या कर रहे हैं? इसे जानने के लिए मैं ट्रेन में घूम-घूमकर लोगों से बात कर रहा था. मुझे याद है कि पूर्वांचल के एक युवक गिरीश, जो पेशे से कारपेंटर था और पहली बार अपने गांव से निकलकर मुंबई काम की खोज में जा रहा था. एक अन्य मुस्लिम लड़का भी मुंबई जा रहा था, उससे जब मैंने पूछा कि जब तुम मुंबई पहुंचोगे और तुम्हे वहां काम नहीं मिलेगा, तो तुम क्या करोगो? उसका सीधा-सा जवाब था कि मैं वहां से फिर ट्रेन पकड़ कर बंगलोर चला जाऊंगा. कहीं तो काम मिलेगा ही. ये है भारतीयों का जज़्बा. ये था उनका अवसर तलाशने का दौर जिसमें आशा थी. जबकि सफ़र कर रहे सभी युवा वर्ग संघर्ष के दौर से गुज़र रहे थे, फिर भी उन्हें आशा थी कि काम हो जाएगा. यह एक बहादुरी भरा विचार था. जब हम मुंबई पहुंचे, तो गिरीश के दोस्त उसे लेने आए थे. वे कह रहे थे- चलो सब अच्छा हो जाएगा. और वे उसके साथ चलने लगे. उस समय सुबह के चार बजे थे, मैं भी उसके साथ हो लिया यह देखने के लिए कि वे किस तरह अपने को आगे बढ़ाने की सोच रखते हैं. मानसून के उस मौसम में अपने पैरों को भिंगोते हम मुंबई की गलियों से होते हुए उस जगह पहुंचे, जहां वे रहते थे. एक छोटा-सा कमरा था, जिसमें छह लड़के सोए थे. हमें देखते ही सभी उठकर बैठ गए. ये सभी लड़के गोरखपुर के ही थे और सभी ने उस दौर को झेला था, जिसमें आज गिरीश आया था. सभी ने आग्रह किया कि एक चाय लें और मैंने उस आग्रह को स्वीकार कर लिया. बातचीत के दौरान उनके जज़्बे से रूबरू हुआ. गिरीश की ये कहानी आज किसी एक की नहीं, बल्कि ऐसे हज़ारों हज़ार यवाओं की है, जो अपने भविष्य को संवारने में लगे हैं और उसके लिए रोज़ हर कोई अपने तरीक़े से बिना थके संघर्ष कर रहे हैं और देश को आगे बढ़ा रहे हैं और दुनिया में वे अपना और अपने देश का नाम रौशन कर रहे हैं. एक अरब से अधिक जनसंख्या वाला भारत जिसे विश्व मानव की राजधानी कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, जहां लाखों लोग घरों से निकलकर विश्व पटल पर अपना स्थान तो बना ही रहे हैं और देश की तरक्की में योगदान कर रहे हैं. और यही महत्त्वपूर्ण जन आंदोलन देश के विकास को गति देने का काम कर रहा है. ये लोग ही इक्कीसवीं सदी के भारत का निर्माण कर रहे हैं. यही वह शक्ति है, जो फ़ैक्ट्रियों में मज़दूर की भूमिका निभा रहे हैं, बाज़ार में उपभोक्ता हैं और तकनीक के वाहक भी हैं. ये युवा टेलेंट आपके व्यवसाय को आगे बढ़ा रहा है और स्टाक मार्केट को संचालित कर रहा है. आज हम न रुकने और थकने वाले मानव शक्ति की उस श्रृंखला के शिखर पर हैं, जो देश के चहुंमुखी विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और जिसे रोकना दुनिया के लिए नामुमकिन है. लेकिन आज हमारी ये ज़रूरत है कि इस युवा शक्ति को, इनके बौद्धिक कौशल को, इनकी क्षमता को किस तरह बेहतर उपयोग में लाया जाए. किसी एक के लिए नहीं, बल्कि बहुतायत को ध्यान में रखते हुए कुछ बेहतर किया जाए. इसके लिए सबसे पहली चीज़ जो करने की ज़रूरत है वह ये कि यहां वहां काम की तलाश में भागने वाली युवा शक्ति के बेहतर उपयोग की व्यवस्था उसके नज़दीकी क्षेत्रों में किया जाए, जिसके लिए गांवों और शहरों के बीच के संपर्क को और मज़बूत किया जाए. नज़दीक में रोजगार के अवसर उप्लब्ध कराए जाएं. साथ ही गावों, शहरों और देश के अन्य भागों के बीच के संपर्क को मज़बूत किया जाए, ताकि बेहतर उत्पादन सुनिश्चित हो सके. हमें इसके लिए सड़क बनाने की ज़रूरत है. ये सड़कें छोटी नहीं, बल्कि लंबी और मज़बूत होनी चाहिए, ताकि वह बृहद पैमाने पर काम में आ सके. हमें ज़रूरत है रेल मार्ग के नेटवर्क को बढ़ाने की, नए उद्योग लगाने की, बेहतर बिजली की व्यवस्था करने की, ताकि वह हमारे हर कामों में सहायक हो सके. हमारे बच्चों को पढ़ने के लिए रोशनी मिल सके, ताकि वे अपने भविष्य को चमका सकें. हमें ज़रूरत है पोर्ट तैयार करने की, ताकि उत्पादनों को निर्यात करने में सुविधा हो. सरकार अकेले ये सारा काम नहीं कर सकती. हमें ज़रूरत है आपके सहयोग की, ताकि हम साथ मिलकर देश का विकास कर सकें.

दूसरा ये कि बौद्धिक क्षमता का बेहतर उपयोग और उसके विकास और तीव्र संचरण की बेहतर व्यवस्था हो, ताकि उस पर तेज़ी से काम हो सके. यहां भी तकनीकि शिक्षा की उत्तम व्यवस्था हो जिससे कि हमें औद्योगिक विकास को गति देने में मदद मिले, ताकि विदेशी लोग हमारा अनुकरण करना चाहें और कहें कि हमें भारतीयों की तरह बनना है. इसके लिए विश्व स्तर की शिक्षण व्यवस्था की आज ज़रूरत है. हमारी सबसे बड़ी विडंबना ये है कि हमारे पास प्रशिक्षित युवा शक्ति नहीं है जैसा कि लोकमान्य तिलक एक्स. में मैंने पाया था. इसे आप बेहतर ढंग से समझाते हैं, क्योंकि आप ये पाते हैं कि आपको उसे पहले प्रशिक्षित करना पड़ता है. हमारी समस्या रोज़गार की कमी नहीं, बल्कि प्रशिक्षित कामगार की कमी है. क्या वजह है कि एक मां अपने तीव्र बुद्धि बच्चे का किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन दिलाने के लिए दुखी रहती है, क्यों मेडिकल कोर्स करने के लिए कोई हारवर्ड यूनिवर्सिटी जाना चाहता है, जबकि लखनऊ मेडिकल कॉलेज की फ़ीस भी वही है? क्यों कोई पायलट बनने के लिए अमेरिका जाना चाहता है और जब डीजीसीए के पास नौकरी के लिए जाता है, तो उसे प्रथमिकता दी जाती है. लेकिन पायलट की ट्रेनिंग लेना और प्लेन उड़ाना दोनों अलग बात है. आपमें से कितने ऐसे हैं, जो उड़ती प्लेन से मेल डाल सकते हैं. क्या वजह है कि हमारे युवा ऐसा करने में अक्षम हैं. क्या कभी आपने इस बारे में सोचा है और इसे सुधारने के लिए कुछ करने की कोशिश की है? क्या कभी आपने शिक्षा तंत्र को बदलने के लिए पहल की है? क्या आपके पास यूनिवर्सिटी के लिए कोई ख़ाका है, भले ही वह आईआईटी हो? नहीं. यूनिवर्सिटी आज एक संस्थान मात्र नहीं रह गई है, वह एक नेटवर्क है जिसका संबंध उद्योगों से जुड़ चुका है.

मैं आपको अपने एक मित्र की कहानी सुनाता हूं, जो कुछ साल पहले अमेरिका से आया था. उसके पास इंजीनियरिंग से संबंधित एक समस्या थी. उसने उसके समाधान के लिए मझसे पूछा कि वे कहां जाए. मैंने उसे आईआईटी जाने कहा. वहां के एक प्रोफ़ेसर ने उसकी समस्या का समाधान कर दिया, जिसके लिए उस महाशय ने कुछ हज़ार रूपये ही लिए. जब वह लौटकर मेरे पास आया, तो वह हैरान था. उसने बताया कि जिस समस्या के लिए अमेरिका में उससे 30 हज़ार डॉर मांगा गया था वह कुछ हज़ार रूपये में ही समाप्त हो गई. वजह उस प्रोफ़ेसर को अपनी क़ीमत का पता नहीं था. ये हाल है हमारे देश के विद्वानों का. जिसे अपनी क़ीमत का कुछ अंदाज़ा नहीं है कि वह कितना महंगा है? उसे नहीं पता होता है कि उसके ज्ञान की बाज़ार में क्या क़ीमत है, वजह वह बाज़ार से कटा है, वह उसे ज्ञान के पैमाने से देखता है. सलिए हमें इसे बदलना होगा.

नौजवानों के लिए बौद्धिक कौशल और उसका संवर्धन नौकारी का एक ज़रिया है. आप लोगों के पास वह क्षमता है, जो नौकरियों का सृजन करने में समर्थ है. और इसके लिए आपको आगे बढ़कर क़दम उठाना पड़ेगा. और इसके साथ ही हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि पक्षपातहीन और एक सैद्धांतिक सरकार दें, जो सबके साथ मिलकर काम करे. जैसा कि मैं अनुभव करता हूं कि यह युवा शक्ति भविष्य की एक चुनौती हो सकती है. इसका कारण इनमें प्रशिक्षण का अभाव नहीं, बल्कि बाहर करने की परंपरा है, चाहे वह दलित का हो या आदिवासियों का या मध्यवर्ग का या फिर. हमें इसे रोकना होगा. राष्ट्रपति केनेडी ने कहा था कि समुद्रों में लहरों के उठने से सभी नाव ख़ुद उपर उठ जाते हैं. हमें उसी नाव की व्यवस्था करनी है. लेकिन यहां आधारभूत संरचना क्या है? यह आधारभूत संरचना यूपीए सरकार तैयार कर रही है जिसके तहत सभी परिवारों को जीवन यापन के लिए न्यूनतम ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कई लाभकारी योजनाएं चलाई गई हैं. ग़रीब लोगों की सबसे बड़ी समस्या क्या है? उनकी समस्या है उसकी पहचान. आप गांवों में जाइए, वहां हर व्यक्ति एक दूसरे को जनता है, लेकिन जैसे ही वह ग्रामीण अपने गांव से बाहर आता है, वह अपनी पहचान खो देता है. जैसा कि हमने आपसे कहा कि यह पहचानहीनता ही सबसे बड़ी समस्या है. जब हम महिलाओं से बात करते हैं, तो वे कहती हैं कि उनके पास कोई नाव नही है, यानी कोई उपाय नहीं है. लेकिन समाज की ये आधी आवादी न केवल ग़रीब परिवारो की या फिर धनाढ्य परिवारों की बल्कि सभी समुदाय की महिलाएं समाज निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं. वे न केवल नाव को बनाने का काम करती हैं, बल्कि तरंगों का भी सृजन करती हैं. वे जो काम करती हैं, पूरे परिवार का सहारा होता है. हमारा आर्थिक विकास उनके बिना संभव ही नहीं है. हमारा प्रयास है कि आने वाले दिनों में न तो कई पुरुष और न ही कोई महिला बना छत के हों. कहना बहुत आसान है. लेकिन प्रजातंत्र में ग़रीबों के पास बहुत बड़ी ताक़त है और हमें उसे साथ लेकर चलना है. भारत सही मायने में तेज़ी से तभी विकास कर सकता है, जब सभी को साथ लेकर चला जाए चाहे वह इस कमरे के भीतर बैठे हों या फिर यहां से काफ़ी दूर. इस आंदोलन के दो मार्ग हैं, जिनमें पहला विकास के रास्ते पर जा सकता है, तो दूसरा विध्वंस के रास्ते पर. कांग्रेस का विचार है कि हर कोई साथ मिलकर इस विकास यात्रा को तय करें. यूपीए के शासनकाल में भारत तेज़ी से विकास कर रहा है. कारण इस दौरान देश में सामाजिक सौहार्द्र है और हम इसी सामंजस्य को बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं. जब इसमें किसी तरह की राजनीति शामिल होती है, तो इसका विध्वंस के रास्ते पर जाने का ख़तरा बढ़ जाता है. और यह विध्वंस समाज को काफ़ी पीछे धकेल देता है. और विकास बाधित हो जाता है, साथ ही रोज़गार भी प्रभावित होता है. सामूहिक विकास सभी के लिए जीत की स्थिति है. कांग्रेस पार्टी देश में एक ऐसा वातावरण तैयार करने का प्रयास कर रही है, जिससे लोगों को ग़रीबी से निजात मिले, उनका सर्वांगीन विकास हो. यह हमारी विडंबना रही है कि हम एक साथ सभी समस्याओं का समाधान करना चाहते हैं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि हर समस्या का अलग-अलग समाधान करना आसान होता है. और कम समय भी लगता है. हरित क्रांति, श्वेत क्रांति आईटी क्रांति आदि आंदोलनों की सफलता इसका उदाहरण है.

यह युवाओं का देश है और उनके विकास के लिए काफ़ी कुछ करना है. अगर हम आईटी क्रांति की बात करें, तो इसमें कालाहांडी ज़िले का ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है, जहां एक के बाद एक घरों को जोड़ने की मंशा के साथ इसे शुरू किया गया था, जिसका परिणाम आज आपके सामने है और इसके गवाह सेम पित्रोदा सामने बैठे हैं. सेम पित्रोदा, नंदन नीलकाणी जैसे लोगों ने सरकार के साथ मिलकर समाज के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत कुछ किया है और उसे नहीं भुलाया जा सकता है. कांग्रेस ही एक मात्र ऐसी संस्था है, जो सबके हित में काम करती है. यही एकमात्र पार्टी है, जो देश के हित की बात करती है और उसके लिए नीतियों का न केवल निर्माण करती है, बल्कि उसे समाज के निचले स्तर तक पहुंचाने का भी काम करती है. हम उस राजनीतिक संरचना के लिए समर्पित हैं, जिसमें समान रूप से सबके हित की बात की जाती है. आज की ये ज़रूरत है कि एक ऐसे वातावरण को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें लघु, मध्यम और बड़ी औद्योगिक इकाइयों को पनपने का समान अवसर मिले तथा समाज के विकास में वे अपना योगदान दे सकें. ऐसे वातावरण की व्यवस्था करनी है, जिसमें व्यवसाय शहरों की गलियों में तो सुरक्षित चले ही, गांवों तक उसे किसी प्रकार का ख़तरे का अनुभव न हो. ऐसे वातावरण के लिए मैं सभी से सहयोग की अपील करता हूं और औद्योगिक घरानों को उपक्रम लगाने और नई नौकरियों के सृजन की अपील करता हूं. इसके लिए हम ऐसे राजनीतिक वातावरण की व्यवस्था करने में लगे हैं, जो सुरक्षा की गारंटी दे, ताकि व्यवसायी वर्ग निर्भय होकर काम कर सकें. मैं यहां इसलिए आया हूं, क्योंकि मुझे विश्वास है कि हम देश के निर्माण में लंबे समय तक साथ चलें. देश को विकास का रफ्तार दे सकें. आइए हम साथ मिलकर एक नए भारत का निर्माण करें. जैसा कि आदिगोदरेज जी ने कहा कि मैंने ग़रीबों के साथ लंबे समय तक काम किया है, लेकिन मैं आपको एक बात साफ़ कर दूं कि भारत के विकास में किसी एक पहलु को ध्यान में रखकर काम नहीं किया जा सकता है. ग़रीब अगर इसके एक पहलु हैं, तो व्यवसायी दूसरे, मध्य वर्ग तीसरा. इन सभी पहलुओं के साथ मिलकर चलने पर ही देश का सर्वांगीण विकास हो सकेगा. आप सभी का मैं तहे-दिल से धन्यवाद करता हूं कि आप यहां आए और मुझे सुना.

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