फ़िरदौस ख़ान
एक नई पार्टी बनी है. इस पार्टी के उदघाटन समारोह में एक क्रिश्चियन पादरी ने गायत्री मंत्र पढ़ा तो आश्चर्य हुआ, क्योंकि इस पार्टी की जड़ में जमात-ए-इस्लामी हिंद है, जिसके बारे में लोग यह मानते हैं कि यह एक कट्टर मुस्लिम संगठन है. यह सच है कि कोई सियासी पार्टी मुसलमानों के विकास के बारे में ईमानदारी से नहीं सोचती, बस नारे ही देती है. भारतीय राजनीति में मौजूदा घोर अवसरवाद के बीच यह मुसलमानों की ज़रूरत बन गई थी कि एक ऐसा राजनीतिक दल हो, जो उनके दर्द को समझे, उनकी चुनौतियों को जाने, मुस्लिम युवाओं के रोज़गार के लिए लड़े, उनके सवालों को संसद में उठाए. अब सवाल यह है कि क्या जमात-ए-इस्लामी की वेलफ़ेयर पार्टी मुसलमानों की इस ज़रूरत को पूरा कर पाएगी.

प्रजातंत्र की संसदीय प्रणाली में राजनीतिक दलों की सबसे अहम भूमिका होती है. देश भर में क़रीब 1200 राजनीतिक दल हैं. इनमें 6 राष्ट्रीय, 44 राज्यस्तरीय और 1152 क्षेत्रीय पार्टियां हैं. हाल में बाबा रामदेव ने भी पार्टी बनाने की घोषणा की है. भारत की राजनीति में एक और पार्टी ने जन्म लिया है. यह पार्टी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश के प्रमुख मुस्लिम संगठन जमात-ए-इस्लामी हिंद की पार्टी है. जमात ने इस पार्टी का नाम वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया रखा है. जमात-ए-इस्लामी को राजनीतिक दल बनाने की क्या ज़रूरत पड़ी, इस पार्टी की विचारधारा क्या है, क्या यह पार्टी स़िर्फ मुसलमानों की पार्टी है, क्या यह पार्टी स़िर्फ मुसलमानों के कल्याण के लिए काम करेगी, क्या यह चुनाव लड़ेगी, किन-किन पार्टियों से यह गठबंधन कर सकती है, इस पार्टी का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नज़रिया क्या है, इस पार्टी से किन पार्टियों को फायदा होगा और किन पार्टियों को नुक़सान पहुंचेगा आदि जैसे कई सवाल हैं, जिनके बारे में देश की जनता और खासकर मुसलमानों को जानना ज़रूरी है.

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 26 अगस्त, 1941 को लाहौर में हुई थी. देश के बंटवारे के बाद जमात-ए-इस्लामी भी बट गई. पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज भी जमात-ए-इस्लामी है. राजनीति में हिस्सा भी लेती है. भारत में जमात पर सरकार ने दो बार प्रतिबंध भी लगाया है. पहली बार इमरजेंसी के दौरान और दूसरी बार 1992 में. पहली बार इमरजेंसी ख़त्म होते ही प्रतिबंध हट गया और दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी से प्रतिबंध हटाया. सुप्रीम कोर्ट ने उस वक़्त यह कहा था कि जमात-ए-इस्लामी एक राजनीतिक, सेकुलर और धार्मिक संगठन है. देश में जमात-ए-इस्लामी के लाखों समर्थक हैं, इसके दस लाख से ज़्यादा सदस्य हैं. धारणा यह है कि जमात-ए-इस्लामी के सदस्य काफ़ी अनुशासित और ईमानदार हैं. यह देश में कई कल्याणकारी योजनाओं को चलाती है. जमात-ए-इस्लामी का महिला मोर्चा भी है, जो आंध्र प्रदेश और केरल में काफ़ी सक्रिय है. जमात-ए-इस्लामी की एक शा़ख़ा है ह्यूमन वेलफ़ेयर ट्रस्ट, जो कई एनजीओ के बीच समन्वय स्थापित करता है. जमात से जुड़े एनजीओ समाज कल्याण और मानवाधिकार के लिए काम कर रहे हैं. स्टूडेंट्‌स इस्लामिक ऑरगेनाइजेशन ऑफ़ इंडिया इसकी छात्र विंग है, जो आंध्र प्रदेश और केरल में सक्रिय है. जमात-ए-इस्लामी हिंद देश में मुसलमानों का सबसे बड़ा संगठन है.

नई पार्टी के ऐलान के बाद यह समझना ज़रूरी है कि पार्टी की विचारधारा क्या है, क्या यह सिर्फ़ मुसलमानों के मुद्दे उठाएगी या फिर मुसलमानों को राष्ट्रीय मुद्दों से जाडे़गी. जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा को समझने के लिए इसके 2006 के दस्ताव़ेज-विज़न 2016 को जानना ज़रूरी है. जमात ने 550 करोड़ रुपये के बजट से ग़रीब मुसलमानों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास के लिए एक एक्शन प्लान तैयार किया था. इस प्लान के तहत 58 पिछड़े ज़िलों को चुना गया. इन ज़िलों में स्कूल, अस्पताल, व्यवसायिक प्रशिक्षण केंद्र, लघु उद्योग और सस्ते घरों के लिए क़र्ज़ देने की सुविधा है. जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा बाज़ारवाद, उदारवाद और वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ है. यह विदेशी पूंजी, सेज, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी सेवाओं, कृषि में सब्सिडी ख़त्म किए जाने की सरकारी नीतियों का विरोध करती है. जमात का मानना है कि देश के लोगों को बुनियादी सुविधाएं देना सरकार का दायित्व है. जमात हर क़िस्म के आतंकवाद का भी विरोध करती है. जमात-ए-इस्लामी की विदेश नीति अमेरिका विरोध की है. जमात-ए-इस्लामी चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाती है. अलग-अलग राज्यों में यह चुनाव के दौरान रणनीति बनाती है. किस पार्टी को समर्थन देना है, यह जमात सोच समझ कर फ़ैसला लेती है. इस बार के विधानसभा चुनाव में केरल में माकपा के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट को जमात का खुला समर्थन मिला है. जमात अब तक के चुनावों में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को समर्थन देती रही है, जबकि इस पर भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में समर्थन दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं.

जमात-ए-इस्लामी का राजनीति से रिश्ता कोई नया नहीं है. पहले यह एक प्रेशर ग्रुप की तरह काम करती थी, अब राजनीतिक दल बन गई है. फर्क़ बस इतना है कि पहले चुनाव नहीं लड़ती थी, अब चुनाव लड़ेगी. तो अब सवाल यह उठता है कि जमात-ए-इस्लामी के नेताओं को चुनाव लड़ने की ज़रूरत क्यों पड़ी. इस सवाल पर जमात-ए-इस्लामी का कहना है कि आज़ाद देश में मुसलमान ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और किसी भी सियासी दल ने उनकी कभी सुध नहीं ली. इसलिए यह ज़रूरी है कि कोई ऐसी सियासी पार्टी बने, जो मुसलमानों के लिए ईमानदारी से काम करे. जमात के वरिष्ठ सदस्य एवं वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष मुज्तबा फ़ारूख़ का कहना है कि मुसलमानों की बदतर हालत को देखते हुए जमात को पहले ही अपनी सियासी पार्टी बना लेनी चाहिए थी. नई पार्टी का मक़सद मुसलमानों को उनके अधिकार दिलाने के लिए सत्ता में हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है. वह कहते हैं कि हम पार्टियों की क़तार में जुड़ने के लिए सियासत में नहीं आ रहे हैं. हमारा मक़सद मुल्क की अवाम को एक नया विकल्प मुहैया कराने का है. यह पार्टी सबकी है. हम सभी की आवाज़ बनना चाहते हैं.

वेलफ़ेयर पार्टी की कार्यकारिणी में फ़िलहाल 31 सदस्य होंगे. इलियास आज़मी, फ़ादर अब्राहम जोसेफ़, मौलाना अब्दुल वहाब खिलजी, मौलाना ज़फ़रुल इस्लाम ख़ान और ललिता नायर को उपाध्यक्ष बनाया गया है. एसक्यूआर इलियास, सुहैल अहमद, प्रो. रमा पांचल, ख़ालिदा परवीन और पीसी हम्ज़ा को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया है. इसके अलावा प्रो. रमा सूर्य राव, अख्तर हुसैन अख्तर, ओमर रशीद और प्रो. सुब्रमण्यम पार्टी के सचिव होंगे. अब्दुस सलाम इस्लाही को कोषाध्यक्ष बनाया गया है. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ गठबंधन कर सकती है. भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन के सवाल पर उनका कहना है कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि वह एक सांप्रदायिक पार्टी है. कश्मीर के अलगाववादी दलों के बारे में भी उनका यही जवाब रहा, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए. जम्मू और कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों की तऱफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि किसी को इतना मजबूर भी नहीं किया जाना चाहिए कि वह हथियार उठा ले. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी युवाओं और महिलाओं को भी चुनाव मैदान में उतारेगी तथा ग़ैर मुसलमानों को भी पार्टी के टिकट दिए जाएंगे. उनका कहना है कि आज़ादी के बाद से अब तक मुसलमानों को एक भारतीय नागरिक होने के नाते जो अधिकार मिलने चाहिए, सही मायनों में वे अभी तक नहीं मिल पाए हैं. मुसलमानों में असुरक्षा की भावना है. उन्हें नहीं पता कि कब हालात बदलें और उनकी जान व माल को ख़तरा पैदा हो जाए. देश की मौजूदा व्यवस्था का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसने अमीर को और अमीर तथा ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाने का ही काम किया है. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी मुसलमानों के अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करेगी. मुसलमानों को आरक्षण दिलाने, इस्लामिक बैंक प्रणाली की स्थापना, सच्चर समिति की सिफ़ारिश को लागू कराने आदि पर भी ज़ोर दिया जाएगा. इसके अलावा महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे भी उठाए जाएंगे.

जमात-ए-इस्लामी की वेलफेयर पार्टी के निशाने पर सबसे पहले उत्तर प्रदेश का चुनाव है. फ़िलहाल इस पार्टी का दख़ल दक्षिण के राज्यों और उत्तर प्रदेश की राजनीति में होगा. अगर जमात-ए-इस्लामी उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपनी ताक़त लगा दे और अगर इसे मुसलमानों का समर्थन मिला, तो देश की राजनीति में सुनामी आ सकती है, जिसका असर हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल पर पड़ेगा. इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा और सबसे बड़ा नुक़सान समाजवादी पार्टी को होगा. यही वजह है कि पार्टी की घोषणा होते ही समाजवादी पार्टी से तीखी प्रतिक्रिया मिली. समाजवादी पार्टी के महासचिव एवं प्रवक्ता सांसद मोहन सिंह ने कहा कि यह सब भारतीय जनता पार्टी का खेल है और कुछ नहीं. जनता बेवकू़फ़ नहीं है. लोग सब समझते हैं. अगर वेलफ़ेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया चुनाव लड़ती है, तो जनता इसके उम्मीदवारों को ख़ारिज कर देगी. उनका यह भी कहना है कि मज़हबी संगठनों का सियासत में कोई काम नहीं है. इसलिए बेहतर है कि वे अपने धार्मिक कार्यों पर ही ध्यान दें. ग़ौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर मुसलमान समाजवादी पार्टी के समर्थक रहे हैं. ऐसे में नई पार्टी के आ जाने से समाजवादी पार्टी के मुस्लिम वोट बैंक पर असर पड़ सकता है. नुक़सान सिर्फ़ समाजवादी पार्टी का ही नहीं होगा. राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को फिर से मज़बूत करने में लगे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा था. इसकी वजह यह थी कि पूर्वांचल के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में कांग्रेस को मुसलमानों का भारी समर्थन मिला. समझने वाली बात यह है कि जमात की ताक़त भी इन्हीं इलाक़ों में हैं. दूसरी वजह यह है कि कांग्रेस सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग के सुझावों को लागू करने में अब तक नाकाम रही है, जिससे उसका मुस्लिम समर्थन घटना तय है. फ़तेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मुफ्ती मुक़र्रम का कहना है कि अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए मुसलमानों का सियासत में आना बेहद ज़रूरी है. इसके लिए लाज़िमी है कि मुसलमानों का अपना एक सियासी दल हो. ऐसा दल, जो ईमानदारी के साथ क़ौम की तरक्क़ी के लिए काम करे. जब तक मुसलमानों की सत्ता में हिस्सेदारी नहीं होगी, तब तक उनकी हालत बेहतर होने वाली नहीं है. उनका यह भी कहना है कि ख़ुद को सेकुलर कहने वाले कांग्रेस जैसे सियासी दलों ने मुसलमानों के लिए कोई संतोषजनक काम नहीं किया है. मुसलमानों की स्थिति दलितों से ज़्यादा अच्छी नहीं है. देश में दलितों के कई राजनीतिक दल हैं. ऐसे में मुसलमानों की आवाज़ उठाने के लिए एक राजनीतिक दल की ज़रूरत है, इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है, लेकिन इस पार्टी के चुनाव में उतरते ही इसे सेकुलर पार्टियों का विरोध झेलना पड़ जाएगा. कल तक जो नेता जमात-ए-इस्लामी के साथ चुनावी फ़ायदे के लिए अच्छा रिश्ता रखते थे, वही इस पार्टी के सबसे बड़े दुश्मन बन जाएंगे. इस पार्टी को मुस्लिम नेताओं का विरोध झेलना पड़ेगा. ख़ासकर उन मुस्लिम नेताओं का, जो मुस्लिम वोटों का सपना दिखाकर पार्टी में मज़बूत ओहदे पर पहुंचे हैं. इस पार्टी पर आरोप भी लगेंगे. मुस्लिम नेता ही कहेंगे कि जमात ने कभी मुसलमानों का भला नहीं किया, तो उसकी पार्टी कौन सा क़ौम को निहाल कर देगी. इस पार्टी पर यह भी आरोप लगेगा कि जमात ने चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी का साथ दिया है. इन सब सवालों का जवाब देना मुश्किल होगा. मुश्किल इसलिए, क्योंकि यह पार्टी जितनी मज़बूत होगी, भारतीय जनता पार्टी को उतना ही फ़ायदा होगा.

वेलफ़ेयर पार्टी की शुरुआत अच्छी है. विचारधारा के नाम पर अमेरिका, वैश्वीकरण, उदारवाद और बाज़ारवाद का विरोध इसे जनता से जोड़ेगा. जमात के पास मज़बूत संगठन है. इसका भी फ़ायदा मिलेगा. कार्यकर्ताओं की कमी नहीं होगी, लेकिन इस पार्टी को अभी कई मुश्किलों का सामना करना है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि पार्टी के पास कोई सर्वमान्य नेता नहीं है. पार्टी ने मुस्लिम समुदाय के बड़े-बड़े लोगों को अपने बैनर में शामिल तो किया है, लेकिन राजनीति की विशेषता है कि बिना लीडरशिप के पार्टी बिखरने लगती है. पार्टी का नेता बनने की प्रतिस्पर्धा में नेता आपस में लड़ने लगते हैं. ऐसे में पार्टी का अस्तित्व दांव पर लग जाता है. वेलफेयर पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट है. किसी भी मुस्लिम पार्टी के लिए यह ज़रूरी है कि उसके पास ऐसा नेता हो, जो न सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय का नेता हो, बल्कि उसे देश के दूसरे समुदाय के लोग भी अपना नेता मानें. अब ऐसा नेता कहां से आएगा, यही जमात-ए-इस्लामी की सबसे बड़ी चुनौती है.

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