फ़िरदौस ख़ान
जब से इंसान ने एक दूसरे को समझना शुरू किया होगा, तभी से उसने भाषा के महत्व को भी समझा और जाना होगा. भाषा सभ्यता की पहली निशानी है. किसी भी समाज की संस्कृति और सभ्यता की जान उसकी भाषा में ही बसी होती है. किसी भाषा का ख़त्म होना, उस समाज का वजूद मिट जाना है, उस समाज की संस्कृति और सभ्यता का इतिहास के पन्नों में सिमट जाना है. इंसान के आधुनिक होने में उसकी भाषा का सबसे बड़ा योगदान रहा होगा, क्योंकि इसके ज़रिये ही उसने अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई होगी. लेखन के आविष्कार का श्रेय 4000 ईस्वी पूर्व में मेसापोटामिया के सूमेरियनों को जाता है. आज हम जिस समय की गणना करते हैं, उसकी शुरुआत सुमेरियनों-बेबलीलोनियनों के काल में हुई थी. एक घंटे को 60 मिनट और एक मिनट को 60 सेकेंड में इन्हीं लोगों ने बांटा था. लेकिन अ़फसोस की बात है कि आधुनिकता की अंधी दौ़ड में इंसान अपनी मातृभाषा को ही भूलता चला गया. नतीजतन, आज दुनिया भर में हज़ारों भाषाएं अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच गईं.

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फ़रवरी की पूर्व संध्या पर जारी संयुक्त राष्ट्र संघ के सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को की रिपोर्ट एटलस ऑफ वल्ड्‌र्स लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर-2009 में कहा गया है कि मौजूदा सभी भाषाओं में से तक़रीबन 90 फ़ीसद भाषाएं अगले 100 बरसों में अपना वजूद खो सकती हैं. दुनिया की तक़रीबन 97 फ़ीसद आबादी इनमें से सिर्फ़ चार फ़ीसद भाषाएं बोलती है. एक अंदाज़ के मुताबिक़, दुनिया भर में 6900 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें से 2500 भाषाओं की हालत बेहद चिंताजनक है. ये वह भाषाएं हैं, जो पूरी तरह से ख़त्म हो जाएंगी. दुनिया भर में 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 150 से कम है. जिन देशों में भाषाएं ख़तरे में हैं, उनमें भारत शीर्ष पर है. यहां तक़रीबन 196 भाषाएं दम तो़ड़ रही हैं. भारत के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है, जहां भाषाओं की हालत चिंताजनक है. अमेरिका में 192 भाषाएं लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. तीसरे स्थान पर इंडोनेशिया है, जहां 147 भाषाएं अपना वजूद खो रही हैं. दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें एक दर्जन से भी कम लोग बोलते हैं. इनमें कैरेम भी एक ऐसी ही भाषा है, जिसे उक्रेन के सिर्फ़ छह लोग ही बोलते हैं. ओकलाहामा में विचिता भाषा को महज़ दस लोग ही बोलते हैं. इसी तरह लेंगिलू बोलने वाले भी सिर्फ़ चार लोग ही बचे हैं. पिछले एक दशक में भाषाओं की हालत बेहद गंभीर होती चली गई है. एक दशक पहले ख़त्म होने वाली भाषाओं की संख्या 900 थी, जो अब बढ़कर 2500 हो गई है. ग़ौरतलब है कि अकेले इंडोनेशिया में 365 भाषाएं हैं. अफ्रीका में एक हज़ार से भी ज़्यादा भाषाएं बोली जाती हैं. दुनिया में अंग्रेजी के बाद मेंडारिन भाषा बोलने वाली आबादी सबसे ज़्यादा है. क्षेत्रीय भाषाओं में स्पेनिश दूसरे स्थान पर है. नई भाषाओं में अफ्रीकन ज़्यादा बोली जाती है. सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी में अफ्रीका के दक्षिण हिस्से में डच कॉलोनी की स्थापना के लिए रोमन कैथोलिक और जर्मन भाषाओं को शामिल किया गया. बीसवीं शताब्दी में अफ्रीकन को डच और जर्मन से मिलाकर नई भाषा विकसित की गई. लंदन में 700 भाषाएं बोली जाती हैं.

भारत में ख़त्म होने वाली भाषाओं में से ज़्यादातर क्षेत्रीय और क़बीलाई बोलियां हैं. फ़रवरी 2010 में अंडमान निकोबार द्वीप समूह की तक़रीबन 70 हज़ार साल से बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा का अस्तित्व ख़त्म हो गया. संस्था सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक़, अंडमान में रहने वाले बो क़बीले की आख़िरी सदस्य 85 वर्षीय बोआ सीनियर की मौत के साथ ही इस आदिवासी समुदाय की भाषा बो ने भी दम तो़ड़ दिया. इसी के साथ इस समाज की संस्कृति और सभ्यता भी ख़त्म हो गई. ग्रेट अंडमान में कुल 10 मूल आदिवासी समुदायों में से एक बो समुदाय की इस आखिरी सदस्य ने 2004 की सुनामी में अपना घरबार खो दिया था. वह स्ट्रैट द्वीप पर सरकार द्वारा बनाए गए शिविर में ज़िंदगी के आख़िरी दिन गुज़ार रही थीं. भाषाई विशेषज्ञों का मानना है कि बो भाषा अंडमान में प्री-नियोलोथिक के वक़्त से इस समुदाय द्वारा बोली जा रही थी. अंडमान पर रहने वाले आदिवासियों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है-द ग्रेट अंडमानी, जारवा, ओंग और सेंटिनीलीस. तक़रीबन 10 भाषाई समूहों में विभाजित ग्रेट अंडमान के मूल निवासियों की आबादी साल 1858 में यहां ब्रिटिश कॉलोनी बनने तक 5500 से ज़्यादा थी. फ़िलहाल ग्रेटर अंडमान में 52 मूल निवासी बचे हैं. लेकिन इनका वजूद भी ख़तरे में है. यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में ठेठ आदिवासी भाषाओं पर विलुप्ति का ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है. भारत के हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड आदि में तक़रीबन 44 भाषाएं-बोलियां ऐसी हैं, जो जनजीवन से ग़ायब हो रही हैं, जबकि ओडिसा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसी तक़रीबन 42 भाषाएं ख़त्म हो रही हैं. 1961 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 1652 भाषाएं थीं, जो 2001 में घटकर महज़ 234 ही रह गईं. पिछले चार दशक में भारत में 1418 भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं. हो सकता है कि यह संख्या कुछ कम हो, क्योंकि इसमें उन भाषाओं को बाहर रखा गया है, जिन्हें बोलने वाले लोगों की तादाद दस हज़ार से कम है. मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डी पुरंदेश्वरी के मुताबिक़, भारत की 196 भाषाओं में से 84 भाषाएं असुरक्षित श्रेणी में हैं, जबकि 62 भाषाएं निश्चित तौर पर लुप्त होने के कगार पर हैं. इसी तरह छह भाषाओं को गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में रखा गया है, जबकि 35 भाषाएं अत्यंत गंभीर रूप से लुप्त होने वाली भाषाओं की श्रेणी में शामिल हैं.

1991 की जनगना में भारत में 1956 भाषाओं के वजूद को स्वीकार किया गया, जबकि 1796 भाषाओं को मातृभाषा के तौर पर स्वीकारा गया. 2001 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में तक़रीबन 450 ऐसी भाषाएं हैं, जिनके बोलने वालों की तादाद दस हज़ार से भी कम है. बदलते वक़्त के साथ ये भाषाएं अपना अस्तित्व खो रही हैं. दुनिया भर में सिर्फ़ 65 भाषाएं ही ऐसी हैं, जिन्हें एक करोड़ से ज़्यादा लोग बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं. इनमें 11 भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं. इनमें से एक भाषा हिंदी भी है. मगर भारत में हिंदी का स्थान अंग्रेज़ी भाषा लेती जा रही है. संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है. भारत के संविधान के मुताबिक़, देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है. संविधान के अनुच्छेद-344 (1) और 351 के मुताबिक़, भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं. ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है. संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिंदी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे. विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिंदी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए. भारतीय संविधान के मुताबिक़, कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है. मगर हिंदी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल हैं. इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है. उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-343 में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. संविधान के लिए अनुच्छेद-351 के तहत हिंदी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है.
ग़ौरतलब है कि भारत में 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था. देश में हिंदी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं. दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है. दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसकी वजह से वे हिंदी का विरोध करने से भी नहीं चूकते. 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिंदी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे. उनकी मांग थी कि हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए.

संविधान सभा द्वारा 14 सितंबर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था. तब से केंद्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में हर साल 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. संविधान के अनुच्छेद-343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपी देवनागरी होगी. साथ ही अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा. संसद का काम हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं. संविधान के अनुच्छेद-120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है. यह राजभाषा अधिनियम-1963, राजभाषा अधिनियम-1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है.

दरअसल, भाषाएं आधुनिकीकरण के दौर में प्रजातियों की तरह विलुप्त होती जा रही हैं. यह गंभीर चिंता का विषय है कि देश इस तरफ़ उतनी गंभीरता से ध्यान नहीं दे रहे हैं, जितना देना चाहिए. दनिया में ऐसे भी देश हैं, जहां के बाशिंदों को अपनी भाषा अपनी जान से भी प्यारी है. बंगालियों में अपनी भाषा से बेहद लगाव है. क़ाबिले-ग़ौर है कि 1952 में बांग्ला भाषा को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग को लेकर एक मुहिम चलाई गई थी. बांग्ला भाषा की एक हज़ार साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत है, जो बेहद समृद्ध है. बंगालियों में अपनी मातृभाषा के प्रति बेहद श्रद्धा और प्रेम है. इसलिए बांग्ला साहित्य बेहद समृद्ध है. लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया. इसके ख़िलाफ़ में 21 फ़रवरी, 1952 को भाषायी जुलूस निकाला गया. यह प्रदर्शन हिंसक हो उठा और अबुल बरकत, रफ़ीकुद्दीन और शफ़ी उर्रहमान पुलिस की गोलियों का शिकार हो गए. बांग्ला देश ने इन्हें भाषायी शहीद का दर्जा देते हुए देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का ख़िताब दिया. इनकी याद में 21 फ़रवरी, 1953 से बांग्लादेश में मातृभाषा दिवस मनाया जाने लगा. बांग्लादेश की सरकार के आग्रह पर 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को की 30वीं आम सभा ने सर्वसम्मति से 2000 से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने का फ़ैसला किया, तभी यह हर साल 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा. संयुक्त राष्ट्र ने भाषाई जागरूकता बढ़ाने के मक़सद से 2008 को अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया था.

बीते साल 21 जून को गूगल ने दुनिया से ख़त्म होती भाषाओं को बचाने की मुहिम शुरू की है. इसके लिए गूगल ने भाषाविदों और रिसर्च स्कोलर्स के साथ समझौता किया है. गूगल एंडेजर्ड लैंग्वेज प्रोजेक्ट के तहत काम कर रही है. इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है-एंडेजर्डलैंग्वेजेज डॉट कॉम (www.endangeredlanguages.com). इस पर उन सभी 3054 भाषाओं की जानकारी दी गई है, जिन्हें बचाने की क़वायद जारी है. इस पर लोग भाषाओं के बारे में अपनी जानकारी दे सकते हैं और जानकारी हासिल भी कर सकते हैं. वेबसाइट पर सुविधा दी गई है कि लोग खत्म हो रही भाषाओं-बोलियों के बारे में जानकारी पाने के अलावा उनसे संबंधित पांडुलिपियां, ऑडियो, वीडियो फाइल आदि शेयर या पोस्ट कर सकते हैं. प्रोजेक्ट मैनेजर क्लारा रिवेरा रोड्रिग्वेज और जैसन रिजमैन का कहना है कि गूगल की इस पहल के ज़रिये दुनिया की तमाम भाषाओं को एक मंच मिलेगा. साथ ही उस भाषाई संस्कृति को समझने का मौक़ा मिलेगा. कोरो एक ऐसी भाषा है, जिसे विज्ञान में नहीं जाना जाता था. यह हमारे ही उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाक़ों में बोली जाती थी, लेकिन अब दुनियाभर में 1000 लोग भी इसे बोलने वाले नहीं हैं. ऐसी ही एक और भाषा है नवाजो. आज दुनियाभर में इसे बोलने वाले लोग 1,20,000 से ज़्यादा लोग नहीं हैं. ऐसी ही भाषाओं की दिलचस्प जानकारी इस वेबसाइट पर मिलती है.

किसी भी भाषा को बचाने के लिए ज़रूरी है कि लोगों में अपनी मातृभाषा के प्रति आदर और सम्मान की भावना हो, मगर यह अफ़सोस की बात है कि भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते चलन की वजह से भारतीय भाषाएं हाशिये पर जा रही हैं.

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Like On Facebook

Blog

  • तेरा हिज्र - जो रूह में बसा हो... उसका साथ होना क्या और दूर होना क्या... मुहब्बत तो दिल से हुआ करती है, रूह से हुआ करती है... ऐसे में दूरियां कोई मायने नहीं रखती... निद...
  • शबे-बारात... - शबे-बारात... यानी इबादत की रात... यह इबादत की रात है और अगले दिन रोज़ा रखकर अल्लाह की ख़ुशनूदी हासिल करने का दिन... कहते हैं कि आज रात को उन लोगों का नाम ज़ि...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं