फ़िरदौस ख़ान
ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए शायद क़िस्मत का साथ होना भी ज़रूरी होता है. सांवली सलोनी अभिनेत्री रामेश्वरी को देखकर यही बात ज़ेहन में आती है. आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में जन्मी तल्लुरी रामेश्वरी को हिंदी सिनेमा में रामेश्वरी  के नाम से जाना जाता है. वह अपनी पहली ही फ़िल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाये से लोकप्रिय हो गई थीं. 1977 में बनी राजश्री प्रोडक्शन की इस फ़िल्म में रामेश्वरी ने कम्मो का किरदार निभाया था. देश भर के सिनेमाघरों में इस फ़िल्म ने सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाई. इसी के साथ रामेश्वरी रातोरात स्टार बन गईं. इस फ़िल्म की कहानी घरेलू थी, जो जनमानस के बेहद क़रीब थी. कहानी के पात्र भी आम लोगों के बीच से लिए गए लगते थे. फ़िल्म में मदन पुरी, प्रेम किशन, इफ्त़िखार, शशि कला, श्यामली, शिवराज, सुंदर, लीला मिश्रा, सविता बजाज, पिलू वाडिया, विजू खोटे और जगदीप ने भी अभिनय किया. फ़िल्म का गीत-संगीत भी मधुर और कर्णप्रिय था. इसका संगीत रवींद्र जैन ने दिया था. गीत ले तो आये हो हमें सपनों के गांव में प्यार की छांव में बिठाए रखना सजना ओ सजना, श्यामा ओ श्यामा, अचरा में फुलवा लईके आए रे हम तोहरे द्वार आदि आज भी ख़ासे पसंद किए जाते हैं. उनकी फ़िल्म सुनयना भी ख़ासी पसंद की गई. इसमें उन्होंने एक नेत्रहीन लड़की का किरदार निभाया था. इस फ़िल्म के गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए.
सुनयना सुनयना सुनयना सुनयना
आज इन नज़ारों को तुम देखो
और मैं तुम्हें देखते हुए देखूं
मैं बस तुम्हें देखते हुए देखूं

यूं तो शुरू से ही हिंदी सिनेमा में गोरी लड़की को अभिनेत्री के लिए अच्छा माना जाता रहा है, लेकिन इसके बावजूद सांवली लड़कियों ने अपनी अभिनय प्रतिभा के दम पर बेहद लोकप्रियता हासिल की है. 70 के दशक में भी सांवले रंग की लड़कियों को स्टार मैटेरियल नहीं माना जाता था. हालांकि जया भादु़डी ने छोटा क़द और सांवला रंग होने के बाद भी कामयाबी हासिल की. रामेश्वरी ने जब हिंदी सिनेमा में करियर शुरू किया, तब जया भादु़डी अमिताभ बच्चन से विवाह करके श्रीमती बच्चन बन चुकी थीं. जया बच्चन ने फ़िल्मों से दूरी बना ली थी, क्योंकि अब वह सिर्फ़ गृहिणी बनकर ही रहना चाहती थीं. ऐसे में सांवली सलोनी रामेश्वरी में लोगों को जया बच्चन की छवि नज़र आने लगी. रामेश्वरी ने एकदम भारतीय सुसंस्कृत महिला की छवि को अपनाया. दर्शकों को उनमें आदर्श बेटी, आदर्श पत्नी और आदर्श बहू की छवि दिखने लगी, जिसने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए.

लेकिन क़िस्मत ने उनका साथ ज़्यादा दिनों तक नहीं दिया. 1979 में बनी फ़िल्म सुनयना की शूटिंग के दौरान उनकी आंख में चोट लग गई. इसकी वजह से उनकी एक आंख छोटी हो गई. इस हादसे ने उनके करियर पर ग्रहण लगा दिया. उन्हें फ़िल्में मिलना बंद हो गईं. उन्हें जो किरदार मिले वह सह अभिनेत्री के थे. उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था. रामेश्वरी ने हालात से समझौता कर सह अभिनेत्री के किरदार निभाने शुरू कर दिए. फ़िल्म आशा के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री के अवॉर्ड के लिए नामांकित किया गया. उनके करियर का एक दूसरा पहलू यह भी रहा कि उन्हें किसी नामी अभिनेता के साथ काम करने का मौक़ा नहीं मिला, जैसे दक्षिण भारत की अन्य अभिनेत्रियों वैजयंती माला, वहीदा रहमान और हेमा मालिनी को मिला. उनके बाद दक्षिण भारत से हिंदी सिनेमा में आईं जया प्रदा और श्रीदेवी ने बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया, जिससे उनके करियर को बहुत फ़ायदा हुआ. रामेश्वरी ने फ़िल्म दुल्हन वही जो पिया मन भाये में प्रेम किशन के साथ काम किया. इसी तरह फ़िल्म मान अभिमान, साजन मेरे मैं साजन की और वक़्त वक़्त की बात में राज किरण, फ़िल्म मुझे क़सम है में मुकेश खन्ना के साथ काम किया. हालांकि फ़िल्म सुनयना में उनके नायक नसीरुद्दीन शाह थे. ख़ास बात यह है कि नसीरुद्दीन शाह कलात्मक फ़िल्मों के लिए तो ठीक हैं, लेकिन कमर्शियल फ़िल्मों के लिए उन्हें सही नहीं माना जाता है. इसी फ़िल्म के दौरान उनके साथ हादसा भी हुआ, जिसने उनके करियर का रुख़ बदल दिया. रामेश्वरी को फ़िल्म अग्नि परीक्षा में अमोल पालेकर, शारदा और आशा में जितेंद्र, कालका में शत्रुघ्न सिन्हा के साथ काम करने का मौक़ा ज़रूर मिला, लेकिन इन फ़िल्मों में वह मुख्य भूमिका में नहीं थीं. फ़िल्म वक़्त वक़्त की बात में राकेश रोशन, मेरा रक्षक, आदत से मजबूर फ़िल्मों में मिठुन चक्रवर्ती सहनायक थे, लेकिन इनमें रामेश्वरी के अलावा अन्य अभिनेत्रियां भी थीं. इतना ही नहीं उन्हें अव्वल दर्जे के निर्देशकों के साथ काम करने का मौक़ा नहीं मिल पाया, जो उनकी अभिनय प्रतिभा को पहचान कर उन्हें ऐसे किरदार दे पाते जो उनके करियर को कामयाबी की बुलंदियों तक ले जाते. अरुणा ईरानी जैसी सह अभिनेत्रियों ने भी अपनी अभिनय क्षमता के बूते हिंदी सिनेमा में अपनी एक विशेष पहचान बनाई है. रामेश्वरी का हिंदी सिनेमा से मोह भंग हो गया. उन्होंने दक्षिण की राह ली और तेलुगू फ़िल्मों में अभिनय करना शुरू कर दिया. तेलुगु फ़िल्मों के प्रतिष्ठित फ़िल्मकार के विश्वनाथ की 1978 में बनी फ़िल्म सीतामालक्ष्मी उनके करियर की क्लासिक फ़िल्म मानी जाती है. इसके अलावा उन्होंने तेलुगू फ़िल्म चिन्नोडु पेड्डोडु (1988), निजाम (2003) और नंनदनावनम में भी अपनी प्रतिभा के जलवे बिखेरे. फ़िल्म चिन्नोडु पेड्डोडु के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री के नंदी सम्मान से नवाज़ा गया. लेकिन यहां भी उन्हें ज़्यादा काम नहीं मिला और उन्होंने छोटे परदे को अपना लिया. उन्होंने टेलीविजन धारावाहिक कैरी, मितवा फूल कमाल के, जब लव हुआ, बाबुल का आंगन छूटे न, प़डौसी और चमत्कार में अभिनय किया. उनकी प्रमुख हिंदी फ़िल्मों में दुल्हन वहीं जो पिया मन भाये (1977), मेरा रक्षक (1978), सुनयना (1979), आशा (1980), मान अभिमान (1980), शारदा (1981), अग्नि परीक्षा (1981), आदत से मजबूर (1981), कालका (1983), एक नया इतिहास, मान मर्यादा (1984), मुझे क़सम है (1985), भाई का दुश्मन भाई, प्यारी भाभी (1986), हम फ़रिश्ते नहीं (1987), कुछ तुम कहो कुछ हम कहें (2002), बंटी और बबली (2005), फ़ालतू (2011) आदि शामिल हैं. रामेश्वरी ने हिंदी और तेलुगू के अलावा मलयालम, कन्नड़, बंगाली, उड़िया  और भोजपुरी फ़िल्मों में भी काम किया.

रामेश्वरी ने पुणे फ़िल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट से 1975 में अभिनय में स्नातक की डिग्री हासिल की. इंस्टीट्यूट के सहपाठी और पंजाबी फ़िल्मों के अभिनेता-निर्माता दीपक सेठ से शादी की. उनके दो बेटे भास्कर प्रताप और सूर्य प्रेम हैं. रामेश्वरी ने अपने पति के साथ मिलकर 1988 में हिंदी फ़िल्म हम फ़रिश्ते नहीं का निर्माण किया. इस फ़िल्म में उन्होंने अभिनय भी किया है. उन्होंने 2007 में शेक्सपीयर के नाटक द कॉमेडी ऑफ़ एरर्स पर आधारित पंजाबी फ़िल्म भी बनाई.

फ़िल्मों से दूरी बना लेने के बारे में रामेश्वरी का कहना है, मैंने फ़िल्मों से संन्यास नहीं लिया है. फ़िल्मों में काम करने की ख्वाहिश होती है, लेकिन ऐसा लगता है फ़िल्म निर्माता-निर्देशक मुझे भूल गए हैं. प्रशिक्षित अभिनेत्री होने के बावजूद वह मानती हैं कि कामयाबी और बेहतरीन अभिनय के लिए किसी तरह के औपचारिक प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं होती.
बेशक प्रतिभा तो जन्मजात होती है. प्रशिक्षण किसी की प्रतिभा को निखार सकता है, उसे पैदा नहीं कर सकता.


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