फ़िरदौस ख़ान
छंदमुक्त कविताओं का भी अपना ही रंग होता है. छंदों से मुक्त शब्द भावों की लहरों में बहते जाते हैं और साथ ही पाठकों को भी अपने साथ बहा ले जाते हैं, एक ऐसे संसार में, जिसकी फ़िज़ा में कविताएं गूंजती हैं. शिखा वार्ष्णेय का कविता संग्रह मन के प्रतिबिम्ब भी कुछ ऐसा ही है, जिसे कानपुर के सुभांजलि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. इस काव्य संग्रह में पचास कविताएं और कुछ क्षणिकाएं संग्रहीत हैं. शिखा छंदमुक्त कविताएं लिखती हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि हर कवि या कवयित्री छंदशास्त्र में पारंगत ही हो. ग़ौरतलब है कि छंदमुक्त कविताएं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की देन हैं. कविताएं दो तरह की होती हैं, एक छंदयुक्त और दूसरी छंदमुक्त. छंदयुक्त कविता में छंद शास्त्र के नियमों का पालन किया जाता है, जबकि छंदमुक्त कविया में छंद शास्त्र का कोई नियम नहीं होता.

बक़ौल कवयित्री उनके लिए कविता कोई विधा नहीं है. उनके लिए कविता ज़िंदगी है, धड़कन है, जो हर दिल में होती है, रग-रग में समाई रहती है. ख़ूबसूरत शब्दों के वे मोती जो दिल की गहराइयों से निकलते हैं, अहसास के धागों में पिरोये जाते हैं और फिर भावों की माला-सी बनकर किसी के गले लग जाते हैं, तो वह कविता है. बेशक, मन की कोमल भावनाओं को शब्दों में पिरोना ही काव्य कहलाता है.
शिखा की कविताओं में ज़िंदगी के कई रंग नज़र आते हैं, जो देश और समाज के विभिन्न तबक़ों के हालात बख़ूबी बयां करते हैं. कविता संग्रह की पहली कविता आख़िर को ही लीजिए, जिसमें एक महिला की अभिलाषाओं और उनके पूरे होने के बाद बचे उसके अकेलेपन को बयां किया गया है.
एक ज्योतिषी ने एक बार कहा था
उसे वह मिलेगा सब
जो भी वह चाहेगी दिल से
उसने मांगा
पिता की सेहत
पति की तरक़्क़ी
बेटे की नौकरी
बेटी का ब्याह
एक अदद छत
अब उसी छत पर अकेली खड़ी
सोचती है वो
क्या मिला उसे
ये पंडित भी कितना झूठ बोलते हैं...

इसी तरह अमृत रस में किसान की हालत और उसकी भावनाओं का सजीव चित्रण किया गया है कि किस तरह फ़सल के साथ उसके सपने जुड़ जाते हैं.
देख लहलहाती फ़सल क सपना
आंखें किसान की भर आई थीं
इस बरस ब्याह देगा बिटिया
वर्षा यह संदेश लाई थी

उनकी कविताओं में जहां विषय पारंपरिक हैं, वहीं शैली आधुनिक है. उन्होंने नानी और मुन्नी कविता के ज़रिये तेज़ी से बदल रही दुनिया के परिवर्तन को पेश किया है. चीख़ते प्रश्न और प्रलय... बाक़ी है, के ज़रिये जहां समाज के नैतिक पतन पर सवाल उठाए हैं, वहीं नारी कविता के ज़रिये महिलाओं के ज़िंदगी पर भी रौशनी डाली गई है. ख़ास बात यह है कि उन्होंने अपनी कविताओं में आज के दौर के बिम्ब-प्रतिबिम्बों का इस्तेमाल किया गया है, जैसे-
काश ज़िंदगी में भी
गूगल जैसे ऑप्शन होते
जो चेहरा देखना गवारा नहीं
उन्हें शो नैवर किया जा सकता
और अनावश्यक तत्वों को ब्लॉक 

यह देखकर ख़ुशी होती है कि आज ब्लॉग लेखन को गंभीरता से लिया जा रहा है और ब्लॉग लेखक अब सिर्फ़ ब्लॉग लेखन तक ही सीमित नहीं हैं, वे इससे इतर भी अपने लेखन से पाठकों को प्रभावित कर रहे हैं. शिखा की रचनाएं भी उनके ब्लॉग स्पंदन और पत्र- पत्रिकाओं से होते हुए आज दो-दो किताबों के रूप में सबके सामने हैं. स्वतंत्र लेखन से जुड़ी शिखा की यह दूसरी किताब है. इससे पहले उनकी एक किताब स्मृतियों में रूस (यात्रा संस्मरण) प्रकाशित हो चुकी है. फ़िलहाल वह कथा लेखन में भी हाथ आज़मा रही हैं. बहरहाल, उनकी यह किताब भी पाठकों को पसंद आएगी. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

समीक्ष्य कृति :  मन के प्रतिबिम्ब
कवयित्री : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : सुभांजलि प्रकाशन, कानपुर 
क़ीमत : एक सौ रुपये

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

Loading...

ई-अख़बार

Blog

  • उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए... - कुछ ख़्वाब इस तरह से जहां में बिखर गए अहसास जिस क़द्र थे वो सारे ही मर गए जीना मुहाल था जिसे देखे बिना कभी उसके बग़ैर कितने ज़माने गुज़र गए माज़ी किताब ह...
  • अल्लाह और रोज़ेदार - एक बार मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला से पूछा कि मैं जितना आपके क़रीब रहता हूं, आप से बात कर सकता हूं, उतना और भी कोई क़रीब है ? अल्लाह तआला ने फ़रमाया- ऐ म...
  • राहुल ! संघर्ष करो - *फ़िरदौस ख़ान* जीत और हार, धूप और छांव की तरह हुआ करती हैं. वक़्त कभी एक जैसा नहीं रहता. देश पर हुकूमत करने वाली कांग्रेस बेशक आज गर्दिश में है, लेकिन इसके ...

Like On Facebook

एक झलक

Search

Subscribe via email

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

इसमें शामिल ज़्यादातर तस्वीरें गूगल से साभार ली गई हैं