फ़िरदौस ख़ान   
जब नई सरकार आती है, तो उससे बहुत-सी उम्मीदें होती हैं. ऐसी व्यवस्था की उम्मीदें, जिसमें सबका फ़ायदा हो, सबको राहत मिले. यहां बात की जा रही है किसानों और आम लोगों की. उन किसानों की जिन्हें शिकायत रहती है कि उन्हें फ़सल के वाजिब दाम नहीं मिल पाते. वे दिन-रात अपने खेतों में पसीना बहाकर फ़सल उगाते हैं, लेकिन इसका सारा फ़ायदा कारोबारी ले जाते हैं. लोगों को मलाल है कि खाद्यान्न की लगातार बढ़ती क़ीमतों की वजह से पेट भरना भी मुश्किल होता जा रहा है.  दालें हमारे भोजन का एक अहम हिस्सा हैं. इनमें प्रोटीन और विटामिन बहुतायत में पाए जाते हैं. भारत में एक बड़ी आबादी शाकाहारी है और प्रोटीन के लिए वह दाल आदि जैसे खाद्य पदार्थों पर ही निर्भर करती है, लेकिन लगातार बढ़ती महंगाई की वजह से दालें थाली से ग़ायब होती जा रही हैं. हालत यह है कि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में दलहन का संकट बरक़रार है. दालों की बढ़ती क़ीमतों पर क़ाबू पाने के लिए सरकार ने साल 2006 से दालों के निर्यात पर पाबंदी भी लगा रखी है. यहीं नहीं दालों का आयात भी किया गया, लेकिन इससे जनमानस को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ. दालों की क़ीमतें आज भी आसमान छू रही हैं. दालों के कम इस्तेमाल से बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है. ग़ौरतलब है कि  साल 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 61 ग्राम थी, जो 2009-10 तक आते-आते घटकर महज़ 34 ग्राम रह गई. विश्व खाद्य व कृषि संगठन ने प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 80 ग्राम दाल की खपत का मानक तय किया है. हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व खाद्य और कृषि संगठन द्वारा प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 104 ग्राम दालों की सस्तुति की गई है. वैश्विक स्तर पर दालों की उपयोगिता को समझते हुए और इसके कारोबार एवं उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने साल 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किया है. भारत को भी इस तरफ़ ख़ास तवज्जो देनी होगी.

क़ाबिले-ग़ौर है कि भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. यहां दुनिया की 90 फ़ीसद अरहर, 75 फ़ीसद चना और 37 फ़ीसद मसूर का उत्पादन होता है. विश्व में दालों की खेती 70.6 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है. इससे 61.5 मिलियन टन दालों का उत्पादन होता है. दलहनों की विश्व औसत उपज 871 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. भारत की प्रमुख दलहनी फ़सलों में चना, मटर, मूंग, मसूर, अरहर, उड़द, मोठ और लोबिया शामिल है. ग़ौरतलब है कि भारत एक बड़ी आबादी वाला देश है और दालें यहां के लोगों के भोजन का एक अहम हिस्सा हैं. इसलिए यहां दालों की बहुत ज़्यादा खपत होती है. मगर अफ़सोस की बात यह है कि हमारे देश में दालों का उत्पादन मांग के मुताबिक़ बढ़ नहीं पा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़ देश में दालों की सालाना खपत तक़रीबन 180 लाख टन है, जबकि उत्पादन 130 से 148 लाख टन के बीच रहता है. इसलिए देश को हर साल 25 से 30 लाख टन दालों का आयात करना पड़ता है. इस साल दालों के आयात में गिरावट आ सकती है. भारतीय दलहन एवं अनाज संघ के चेयरमैन प्रवीण डोंगरे का कहना है कि दालों के आयात में गिरावट की वजह से देश में दालों का अच्छा उत्पादन होने के बावजूद क़ीमतों में वर्तमान स्तर से कम से कम 10 फ़ीसद तेज़ी आ सकती है. साल 2012-13 में ऑस्ट्रेलिया से चने का आयात तक़रीबन छह लाख टन का हुआ था, जो 2013-14 में घटकर तक़रीबन एक लाख 20 हज़ार से एक लाख 30 हज़ार टन रहने का अनुमान है. वहीं रूस से चने का आयात एक लाख टन से घटकर 80 से 90 हज़ार टन रहने की संभावना है. आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने 2013 में अप्रैल से सितंबर तक तक़रीबन 14 लाख टन दालों का आयात किया था.

दाल कारोबारी  सरकार से दलहन संबंधी नीतियों में बदलाव की मांग कर रहे हैं.   प्रवीण डोंगरे का कहना है कि दालों के निर्यात से पाबंदी हटाई जानी चाहिए.  साथ ही चने की तरह दूसरी प्रमुख दलहन फ़सलों का वायदा कारोबार शुरू किया जाए.  भारत दुनिया में दलहन का सबसे बड़ा उत्पादक और आयातक देश है, लेकिन इसका किसानों को फ़ायदा नहीं हो रहा है. पिछले पांच सालों से दलहन की क़ीमतें जहां की तहां बनी हुई हैं, जबकि महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है. चना न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर बिक रहा है. सरकारी नीति की वजह से चने का बहुत ज़्यादा निर्यात नहीं किया जा सकता है. निर्यात पर करों की वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार मंल टिक पाना मुश्किल होता जा रहा है. दूसरी तरफ़ कुछ कारोबारियों का मानना है कि वायदा कारोबार की वजह से खाद्यान्नों की क़ीमतों में बढ़ोतरी होती है. वायदा कारोबार से सिर्फ़ सट्टेबाज़ों को ही फ़ायदा होता है.  जब किसानों की फ़सल बाज़ार में आने वाली होती है, तो वायदा बाज़ार के तहत कम दाम कर सौदे किए जाते हैं और जैसे ही माल खलिहान से निकलकर कमोडिटी एक्सचेंजों द्वारा वायदा कारोबार में लगे सट्टेबाज़ों के पास पहुंचता है, तो वे क़ीमतें बढ़ानी शुरू कर देते हैं. वायदा कारोबार में जो महंगे दामों पर सौदे हो जाते हैं, अमूमन उनकी क़ीमतों को कम नहीं किया जाता.  ऐसे में न तो किसानों को कोई फ़ायदा होता है और न ही उपभोक्ताओं को, जबकि कारोबारी चांदी कूटते हैं. 

ग़ौरतलब है कि सरकार ने दलहन के निर्यात पर पाबंदी की अवधि अगले आदेश तक बढ़ा दी है, लेकिन काबुली चना, जैविक दलहनों और मसूर के निर्यात को कुछ शर्तों के साथ इस पाबंदी से बाहर रखा गया है. विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) द्वारा जारी एक अधिसूचना में कहा गया है कि दलहनों के निर्यात पर रोक को अगले आदेश तक बढ़ा दिया गया है, लेकिन इसके दो अपवाद हैं जिसमें से एक काबुली चना का निर्यात भी शामिल है. दूसरा अपवाद जैविक दलहनों और मसूर का है, लेकिन इसके लिए सीलिंग अधिकतम सीमा 1,0000 टन वार्षिक की है और इसमें कुछ शर्तें शामिल हैं. दलहनों के निर्यात को शुरू में छह महीने के लिए साल 2006 मंा रोक दिया गया था, जिसे समय-समय पर बढ़ाया गया. आख़िरी वक़्त का विस्तार 31 मार्च, 2014 तक के लिए था. अब इस पाबंदी को अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया गया है. भारत अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए 30 लाख टन सालाना दालों का आयात करता है.

इस बार दलहन के क्षेत्र में इज़ाफ़ा हुआ है. चालू सीजन में दलहन फ़सलों की बुआई 161.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हो चुकी है, जबकि पिछले साल दलहन फ़सलों का रक़बा 152.65 लाख हेक्टेयर ही था. चने का रक़बा 103 लाख हेक्टेयर के पार पहुंच चुका है. केंद्र सरकार के दूसरे अग्रिम अनुमान के मुताबिक़ इस साल दलहन की पैदावार बढ़कर 197.7 लाख टन होने का अनुमान है, जबकि पिछले साल 183.4 लाख टन दलहन फ़सलों की पैदावार हुई थी. चने का रिकॉर्ड 97.9 लाख टन उत्पादन होने का अनुमान है, जबकि पिछले साल चने का उत्पादन 88.3 लाख टन हुआ था. इसी तरह अरहर की भी रिकॉर्ड 33.4 लाख टन पैदावार होने का अनुमान है. इस साल चने की बुआई पिछले 53 साल का रिकॉर्ड तोडऩे के क़रीब पहुंच चुकी है. साल 2005-06 के दौरान देश में दलहनों का कुल उत्पादन 134 लाख टन था, जो 2006-07 में बढ़कर 142 लाख टन और 2007-08 में 148 लाख टन हो गया. लेकिन इसके बाद दलहनों का उत्पादन बढ़ने की बजाय कम हो गया, जो साल 2008-09 में 145.7 लाख टन और साल 2009-10 में 147 लाख टन रह गया. लेकिन अब फिर से दलहन के उत्पादन में इज़ाफ़ा हुआ है. लेकिन इस दौरान कुछ राज्यों के पिछले साल के सूखे की वजह से कुल खाद्यान्न उत्पादन 1.5 फ़ीसद घटकर 25 करोड़ 53.6 लाख टन रहा. कृषि मंत्रालय के मुताबिक़ साल 2011-12 में दलहन उत्पादन एक करोड़ 70.9 लाख टन का हुआ था. दलहन उत्पादन का बढ़ना देश के लिए शुभ संकेत है, क्योंकि घरेलू खपत के लिए सालाना 30.40 लाख टन दलहन के आयात की ज़रूरत पड़ती है. दलहन उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम होगी और क़ीमतों का दबाव भी कम होगा. दलहन का समर्थन मूल्य बढ़ाने से किसान अधिक दलहन उत्पादन करने को प्रोत्साहित हुए हैं.

हालांकि भारत में दलहनी फ़सलों की पैदावार विकसित देशों के मुक़ाबले काफ़ी कम है. साल 1971-2010 तक देश में दलहनी फ़सलों के तहत महज़ 10 फ़ीसद क्षेत्र  में बढ़ोतरी हुई है. पिछले 20 सालों से दलहनों की औसत उपज में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया. साल 1990 में प्रति हेक्टेयर 580 किलोग्राम दलहन का उत्पादन होता था, जो साल 2010 तक 607 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ही पहुंच पाया. देश में सबसे ज़्यादा यानी 77 फ़ीसद दालों का उत्पादन मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में होता है, जबकि बाक़ी 23 फ़ीसद उत्पादन करने वाले राज्यों में गुजरात, छत्तीसगढ़, बिहार, उड़ीसा और झारखंड शामिल हैं.  सरकार ने 1991 में दलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए तिलहन, दलहन और मक्का प्रौद्योगिकी मिशन के तहत राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना (एनपीडीपी) शुरू की है. भारत में प्रति व्यक्ति कम से कम दालों की न्यूनतम उपलब्धता 50 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन और बीज आदि के लिए 10 फ़ीसद दलहन मुहैया कराने के मक़सद से साल 2030 तक 32 मिलियन टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है. दलहन की फ़सलों को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को बीज, खाद आदि कृषि विभाग की ओर से मुफ़्त दिए जाते हैं.

बहरहाल, सिर्फ़ योजनाएं बनाने से कुछ होने वाला नहीं है. योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाना भी बहुत ज़रूरी है. सरकार को दलहन क्षेत्र के लिए ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे उत्पादक किसानों को उनकी फ़सल की सही क़ीमत मिले और जनता को भी रियायती दामों पर दालें उपलब्ध हो सकें. मौजूदा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए दलहन का क्षेत्र भी बढ़ाना होगा. चूंकि दलहनी फ़सलों को ज़्यादा उपजाऊ भूमि की ज़रूरत नहीं होती, इसलिए सरकार ख़ाली पड़ी ज़मीन को गांव-देहात के बेरोज़गार युवाओं को लीज़ पर देकर दलहनी फ़सलों को प्रोत्साहित कर सकती है. इससे एक पंथ कई काज होंगे, मसलन बेरोज़गारों को काम मिल जाएगा, कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी होगी और दलहनी पैदावार में भी इज़ाफ़ा हो हो सकेगा.  

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