फ़िरदौस ख़ान
सही पता न होने की वजह से ज़िन्दगी में कितनी बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं...  इसका ख़ामियाज़ा भुगत रहे लोगों को भी शायद इसका अंदाज़ा नहीं होगा... ग़ौर करने पर यही बातें सामने आती हैं कि सही पता न होने की वजह से डाक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाती... लोगों को घर ढूंढने में दिक़्क़त होती है... वग़ैरह-वग़ैरह... लेकिन मसला यहीं आकर ख़त्म नहीं हो जाता...
आपको यह जानकर हैरानी होगी कि सही पता न होने की वजह से बहुत से लोगों की ज़िन्दगी अज़ाब बन गई है... अफ़सोस की बात यह है कि वे ख़ुद इस बारे में नहीं जानते होंगे...

हुआ यूं कि कई बरस पहले गुमशुदा बच्चों से वाबस्ता एक स्टोरी के लिए हमने दिल्ली के कई पुलिस थानों का दौरा किया... ज़्यादातर मामलों में पुलिस ने बच्चों को बरामद कर लिया था, लेकिन इसके बावजूद बच्चे अपने घर नहीं पहुंच सके... वजह, बच्चों के वालदेन ने जो पते लिखवाए थे, वे सही नहीं थे... पुलिस उन पतों पर गई, लेकिन वहां वे लोग नहीं मिले, जिनके नाम पुलिस के रजिस्टर में दर्ज थे... आख़िरकार पुलिस ने बच्चों को अनाथ आश्रम वग़ैरह में भेज दिया... पुलिस का कहना था कि शुरू में तो लोग अपने बच्चों की खोज-ख़बर के लिए आते हैं, लेकिन कुछ वक़्त बाद आना छोड़ देते हैं...

हमें इस बात पर हैरानी हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है कि लोग अपने ही लिखवाए पते पर न मिलें... इसलिए हमने बच्चों के वालदेन को तलाशने का फ़ैसला किया... हमने पुलिस के रजिस्टर से उन बच्चों के घरों के पते लिए, जो पुलिस ने बरामद किए थे... हमने दो दिन दिल्ली के न जाने कितने इलाक़ों की ख़ाक छानी... लेकिन जब काग़ज़ पर लिखे पते पर पहुंचते, तो पता चलता कि इस इलाक़े में, इस नंबर की गली है ही नहीं... या इस गली में इस नंबर का मकान ही नहीं है... अगर कोई मकान मिल गया, तो पता चला कि उस मकान में उस नाम का शख़्स कभी रहा ही नहीं... वग़ैरह-वग़ैरह...

न जाने कितने बच्चे सही पता न होने की वजह से अनाथों की तरह पल रहे हैं... और उनके मां-बाप अपने बच्चों की याद में तड़प रहे होंगे...
बेहद तकलीफ़देह हालत है... 

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