नए रास्तों की तलाश

Posted Star News Agency Wednesday, September 24, 2014 ,


फ़िरदौस ख़ान
राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित लावा सुप्रतिष्ठित ग़ज़लकार, पटकथाकार जावेद अख़्तर का दूसरा ग़ज़ल और नज़्म संग्रह है. उनका पहला ग़ज़ल संग्रह तरकश 1995 में प्रकाशित हुआ था. क़रीब डेढ़ दशक से ज़्यादा अरसे बाद दूसरा संग्रह आने पर जावेद कहते हैं, अगर मेरी सुस्ती और आलस्य को नज़र अंदाज़ कर दिया जाए, तो इस देर की एक वजह बताई जा सकती है कि मेरे ख़्याल में एक के बाद दूसरे संग्रहों का अंबार लगा देना अपने अंदर कोई कारनामा नहीं है. मैं समझता हूं कि अगर अंबार लगे तो नए-नए विचारों का. जिस विचार को रचना का रूप मिल चुका हो, जिस विचार को अभिव्यक्ति मिल चुकी हो, उसे अगर किसी कारण कहने की ज़रूरत महसूस भी हो रही हो, तो कम से कम कथन शैली में ही कोई नवीनता, कोई विशिष्टता हो, वरना पाठक और श्रोता को बिना वजह तकलीफ़ क्यों दी जाए. अगर नवीनता सिर्फ़ नयेपन के लिए है तो कोई लाख समझे कि उसकी शायरी में सुर्ख़ाब के पर लग गए हैं, मगर उन परों में उड़ने की ताक़त नहीं हो सकती. बात तो जब है कि अ़क्ल की पहरेदारी भी मौजूद हो और दिल भी महसूस करे कि उसे तन्हा छोड़ दिया गया है. मैं जानता हूं कि इसमें असंगति है, मगर बेखु़दी-ओ-शायरी, सादगी-ओ-पुरकारी, ये सब एक साथ दरकार हैं. वह कहते हैं, दरअसल, शायरी बुद्धि और मन का मिश्रण, विचार और भावनाओं का समन्वय मांगती है. मैंने सच्चे दिल से यही कोशिश की है कि मैं शायरी की यह फ़रमाईश पूरी कर सकूं. शायद इसलिए देर लग गई. फिर भी कौन जाने यह फ़रमाईश किस हद तक पूरी हो सकी है.

लावा के बारे में यह कहना क़तई ग़लत नहीं होगा कि देर आयद, दुरुस्त आयद. बेशक जावेद साहब अपने चाहने वालों की फ़रमाईश पूरी करने में खरे उतरे हैं. अपनी शायरी के बारे में वह कहते हैं, मैं जो सोचता हूं, वही लिखता हूं-
जिधर जाते हैं सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता
ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ायदे इसमें, मगर अच्छा नहीं लगता
मुझे दुश्मन से भी खुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, क़दमों में अच्छा नहीं लगता...

17 जनवरी, 1945 को ग्वालियर में जन्मे जावेद अख़्तर के पिता जांनिसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील शायर थे. उनकी मां सफ़िया मशहूर उर्दू लेखिका एवं शिक्षिका थीं. जावेद मशहूर शायर असरारुल हक़ मजाज़ के भांजे हैं. उनके ससुर कै़फ़ी आज़मी भी मशहूर शायर थे. जावेद की शायरी में भी वही तेवर नज़र आते हैं, जो उनके पिता के कलाम की जान रहे हैं. वह कहते हैं-
खू़न से सींची है मैंने जो ज़मीं मर-मर के
वो ज़मीं, एक सितमगर ने कहा, उसकी है
उसने ही इसको उजाड़ा है, इसे लूटा है
ये ज़मीं उसकी अगर है भी तो क्या उसकी है?

उनकी पंद्रह अगस्त नामक नज़्म 15 अगस्त, 2007 को संसद भवन में उसी जगह सुनाई गई थी, जहां से 15 अगस्त, 1947 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने मुल्क की आज़ादी का ऐलान किया था.
यही जगह थी, यही दिन था और यही लम्हात
यहीं तो देखा था इक ख़्वाब, सोची थी इक बात
मुसाफ़िरों के दिलों में ख़्याल आता है
हर इक ज़मीर के आगे सवाल आता है

जावेद अख़्तर इस बात पर खु़शी का इज़हार करते हैं कि आज के दौर में भी शायरी की समाज में बहुत अहमियत है, जबकि लोगों को अपने रिश्तेदारों से मिलने तक का व़क्त नहीं मिल पाता. अपनी भागदौड़ की ज़िंदगी में भी लोग शायरी और अदब के लिए वक़्त निकालते हैं.

इंसान में सच कहने के साथ ही सच को क़ुबूल करने की भी क़ूवत होनी चाहिए. यह जज़्बा जावेद की शायरी में नज़र आता है. उनकी नज़्म एतेराफ़ यानी स्वीकारोक्ति इसी जज़्बे को बयां करती है-
सच तो ये है क़ुसूर अपना है
चांद को छूने की तमन्ना की
आसमां को ज़मीन पर मांगा
फूल चाहा कि पत्थरों पे खिले
कांटों में की तलाश खु़शबू की
आग से मांगते रहे ठंडक
ख़्वाब जो देखा
चाहा सच हो जाए
इसकी हमको सज़ा तो मिलनी थी...

उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने बीती 26 फ़रवरी को दिल्ली के इंडिया हेबिटेट सेंटर में लावा का लोकार्पण किया. बक़ौल अंसारी, जावेद अख़्तर की ग़ज़लें और नज़्में लावा शब्द के अर्थों पर पूरी तरह मुकम्मल उतरती हैं. साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष गोपीचंद नारंग का कहना था कि जावेद की ज़िंदगी की जद्दोजहद ही लावा की शायरी में बदल कर आ गई है. इस मौक़े पर शबाना आज़मी, ज़ोया अख़्तर और फ़रहान अख़्तर भी मौजूद थे.

जावेद अख़्तर ने यह किताब अपने एक दोस्त को समर्पित की है. उन्होंने लिखा, यह किताब उन तस्वीरों, गीतों और यादों के नाम, जिन्हें मेरा दोस्त फ़रहान मुजीब अपने पीछे छोड़ गया है. किताब में पहले एक नज़्म, उसके बाद एक ग़ज़ल दी गई है. ग़ज़ल के बाद ख़ाली जगह में एक शेअर दिया गया है. यह किताब उम्दा नज़्मों और ग़ज़लों का एक ऐसा संग्रह है, जिसे बार-बार पढ़ने को जी चाहेगा.
हमको तो बस तलाश नए रास्तों की है
हम हैं मुसाफ़िर ऐसे, जो मंज़िल से आए हैं

एक नज़र

कैमरे की नज़र से...

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