किसान बने मिसाल

Posted Star News Agency Tuesday, June 02, 2015 ,

फ़िरदौस ख़ान
देश के किसान जैविक खेती कर नित नई मिसालें पेश कर रहे हैं. मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले के गांव खमरिया के प्रगतिशील किसान ताराचंद बेलजी ने जैविक खेती पर रिसर्च और प्रयोग कर एक मिसाल क़ायम की है. हाल में टाटा केमिकल्स ने ताराचंद से पैलेट कम्पोस्ट और सजीव कम्पोस्ट तकनीक से बनाई गई जैविक खाद ख़रीदी है. अब खाद बनाने की तकनीक को जल्द ही टाटा केमिकल्स द्वारा अपनाया जाएगा. ताराचंद का कहना है कि यह खाद किसानों के लिए यूरिया का विकल्प है. खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता और फ़सल उत्पादन में बढ़ोतरी होती है. उनका कहाना है कि वे पिछले एक दशक से तक़रीबन 2500 किसानों से जैविक खेती करवा रहा हैं. उन्होंने गिलकी, लौकी, पपीता समेत कई फ़सलों पर खाद का इस्तेमाल किया है. उन्होंने बताया कि खाद के इस्तेमाल और जैविक तकनीक से वे लौकी के एक पौधे में एक हज़ार लौकी उगा चुके हैं. उनके 22 एकड़ में खेत है. यहां वे जैविक और अग्निहोत्र पद्धति से खेती करते हैं, जिससे वे साल भर में तक़रीबन चार से पांच लाख रुपये कमा लेते हैं.

पंजाब के होशियारपुर ज़िले के गांव खनौड़ा के किसान अवतार सिंह भी अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं. वे गन्ने के खेत के बीच में ही मक्की, प्याज़, हल्दी और मटर की खेती करते हैं, जिससे प्रति एकड़ उन्हें दो से तीन लाख रुपये की आमदनी होती है. फूल गोभी के मौसम में यह आमदनी बढ़कर और बढ़ जाती है. फ़िलहाल वे गन्ने के खेत में लगी आधा-आधा किलो वज़नी प्याज़ की वजह से सुर्ख़ियों में हैं. अमूमन पंजाब में प्याज़ का ज़्यादातर वज़न 100 से 150 ग्राम ही होता है. महाराष्ट्र के नासिक की बात करें, तो यहां की प्याज़ 300 ग्राम तक वज़नी होती है. जैविक खेती करने वाले अवतार सिंह कहते हैं कि पंजाब में ही नहीं, बल्कि देश के अन्य राज्यों के किसानों को भी यही लगता है कि खेती के लिए पानी की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है, लेकिन ऐसा नहीं है. धान को छोड़कर अमूमन सभी फ़सलों के लिए ज़्यादा की कोई ज़रूरत नहीं, बस ज़मीन की नमी काफ़ी होती है. उनका कहना है कि पौधों को क्यारियों में लगाने से सिंचाई जल की कम इस्तेमाल होता है और मिट्टी में देर तक नमी बनी रहती है.

उत्तर प्रदेश के फ़र्रूख़ाबाद ज़िले के गांव कुइयांधीर के सुधांशु गंगवार और उनके भाई हिमांशु गंगवार जैविक खेती करके अच्छी ख़ासी आमदनी हासिल कर रहे हैं. सुधांशु गंगवार के पास 20 एकड़ कृषि भूमि है.  उनके पास तीन गाय हैं, जिनका गोबर और मूत्र वे खेती में इस्तेमाल करते हैं. उनका कहना है कि एक गाय से 30 एकड़ खेती की जा सकती है. वे बताते हैं कि जैविक उपज की बाज़ार में अच्छी क़ीमत मिलती है. सामान्य आलू खुदरा बाज़ार में आठ रुपये प्रति किलो मिलता है, जबकि जैविक खेती से पैदा हुआ आलू 50 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है. इसी तरह जैविक गेहूं की क़ीमत 40 से 45 रुपये प्रति किलो मिल रही है. दिल्ली, अलीगढ़ और कानपुर में जैविक उत्पादों के ख़रीददारों की तादाद दिनोदिन बढ़ रही है.

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के गांव गोविंदपुर के किसान जैविक खेती के ज़रिये सब्ज़ियां उगा रहे हैं. गोविंदपुर गांव के किसानों की इसी क़वायद की वजह से 18 दिसंबर 2006 को गोविंदपुर को जैविक ग्राम घोषित किया गया और भारतीय स्टेट बैंक ने इसे गोद लिया. श्रीकांत कुशवाहा लोगों को जैविक खेती का प्रशिक्षण देते हैं. इतना ही नहीं, वे पानी, मिट्टी और वायु की शुध्दता पर गोष्ठी भी करते रहते हैं. उनका कहना है कि रासायनिक खाद के इस्तेमाल से पानी की खपत ज़्यादा होती है, जबकि जैविक खेती में कम सिंचाई की ज़रूरत पड़ती है. इतना ही नहीं रासायनिक खाद और कीटनाशकों से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ख़त्म होने लगती है. इससे मित्र कीट-पतंग मर जाते हैं और परागन की क्रिया सही से नहीं हो पाती है, जिससे उपज में कमी आती है. रासायनिक खाद की जगह जैविक खाद और रासायनिक कीटनाशक की जगह नीम, लहसुन, तुलसी आदि के मिश्रण से बना कीटनाशक इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि ये कीटनाशक मित्र कीटों को नुक़सान पहुंचाए बिना पौधों को सही सुरक्षा और पोषण देता है. रविन्द्र प्रसाद, शिवनंदन श्रीवास्तव, सीताराम भगत, चिरामन पासवान और रघुनाथ प्रसाद का कहना है कि जैविक खाद से उनकी कृषि लागत में कमी आई है उपज में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है, जिससे उनकी आमदनी बढ़ गई है.







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