डॊ. सौरभ मालवीय
रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि पर्व है. अनेकानेक श्रेष्ठतम आदर्शों उच्चतम प्रेरणाओं, महान प्रतिमानों और वैदिक वांग्मय से लेकर अद्यतन संस्कृति तक फैली हुए भारतीयता के समग्र जीवन का प्राण है. यह पर्व श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को आयोजित किया जाता जाता है, जब चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र में विचरण करते हों, तो यह पर्व आता है. इस श्रवण नक्षत्र का नाम ही मातृ–पितृ भक्ति के श्रेष्टतम बिन्दु श्रवण कुमार के नाम पर पड़ा है. यह नाम ही बताता है कि हमारे आदर्श कैसे होने चाहिए. इस नाम की गरिमा इतनी आदरणीय है कि अनेक कुलीन परिवारों में श्रावणी कर्म किया जाता है.
इसी दिन भारत की सांस्कृतिक नगरी काशी में भगवान विष्णु का हयग्रीव अवतार हुआ था. आज के ही शुभ दिन पर हमारे ऋषियों ने परम-पावन सिन्धु नदी में प्रातःकाल स्नान करके सामवेद को देखा था. इसी सामवेद में परम प्रतापी राजराजेश्वर नरेश्वर श्री लंकेश्वर महाराजा रावण ने स्वर दिया था. श्री रावण उत्तम कुल उत्पन्न ऋषि पुलत्स के वंशज थे. सामवेद की स्वर परंपरा आज भी महाराजा लंकेश्वर का अनुसरण करती है. आज ही के दिन भगवान महादेव ने श्री अमरनाथ में परमसती त्रिपुर सुंदरी भगवती को पहली बार राम कथा सुनाई थी. इसी के फलस्वरूप रामकथा इस धरती पर उतारी थी. इतना ही नहीं आज ही के दिन भगवान चंद्रमौलिस्वर विश्वेश्वर महादेव ने देवताओं की अत्मा हिमालय में भगवती जगदम्बा पार्वती को श्रीकृष्ण कथा का भी उपहार दिया था. तभी से श्रीमदभगवत कथा की भाव भूमि बनी.
पुराणों में रक्षाबंधन के संदर्भ में कथा ऐसी है कि परीक्षा के लिए स्वयं भगवान वामन अवतार लेकर राजा बली के यहां गए. रजा बली अपनी श्रेष्टतम दान कार्य के कारण प्रसिद्ध थे. भगवान वामन ने राजा बली से अपने लिए साढ़े तीन पग भूमि की याचना की. महाराज बली सहर्ष देने के लिए तैयार हो गए. यद्यपि महाराज बली के गुरु महर्षि शुक्राचार्य ने राजा बली को मना किया था कि भगवान वामन को दान नहीं देना, लेकिन अपने जीवन भर की उच्चतम परंपरा को राजा बली मलिन नहीं कर सकते थे और गुरु आदेश के विपरीत यह जानकर की स्वयं भगवान नारायण उनके यहां मांगने आए है. राजा बली ने दान देना स्वीकार कर लिया और भगवान वामन ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप दिया. आधे पग में अपनी पीठ रजा बली ने भगवान वामन के चरणों में रख दी. यह देख साक्षात् नारायण अपने मूल स्वरूप में प्रगट होकर राजा बली को आशीर्वाद दिया और वर मांगने को कहा राजा ने वरदान में भगवान की अखंड भक्ति और यह भी मांगा कि आप हमारी रक्षा सदैव करते रहें और निरंतर मेरी आंखों के सामने बने रहें. भगवान श्री हरि ने एवमस्तु कहा और राजा बली के राज भवन के मुख्य द्वार पर खड़े हो गए, क्योंकि अब तो वे राजा बली के पहरेदार भी थे और निरंतर आंखों के सामने खड़े रहने का आशीर्वाद भी दे चुके थे.
इस प्रकार बहुत समय बीत गया. भगवती नारायणी को देव वार्ताकार नारद जी ने यह पूरी सूचना दी, तो भगवती बहुत चिंतित और दुखी हुईं कि अब नारायण हमेशा राजा की रक्षा में ही रहेंगे. अनेक विचार-विमर्श के बाद देवी नारायणी स्वयं राजा बली से याचना करने और दान मांगने राजा के सम्मुख राज सभा में पहुचीं.रजा बली ने भगवती से निवेदन किया कि आप निःसंकोच अपनी इच्छा प्रकट करें. इस पर भगवती ने राजा से उस पहरेदार को ही मांग लिया, जो मूल रूप से भगवान वामन थे. यह सुनकर राजा बली ने कहा कि श्री हरि वचन दे चुके हैं कि अहर्निश मेरी आंखों के सामने ही रहेंगे. यह संकल्प कैसे पूर्ण होगा. यह सुनकर भगवती नारायणी ने आशीर्वाद दिया कि भगवन श्री हरि सदैव आपकी भावभूमि में ही रहेंगे. इसलिए निरंतर दर्शन का तो समाधान हो गया और भगवती ने अपने वस्त्र से कुछ धागे निकाल कर यह कहते हुए राजा बली के दाहिने हाथ में बांध दिया  कि इस रक्षा सूत्र से आपके और आपके राज्य की निरंतर रक्षा होती रहेगी. वह पवित्र दिन श्रवण पूर्णिमा ही था और तभी से रक्षाबंधन की परंपरा हमारे समाज में चली आ रही है.

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