डॉ. सौरभ मालवीय
भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा और हिन्दी भाषा को लेकर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा भम्र की स्थिति उत्पन्न की जा रही है. सच तो यह है कि हिन्दी भारत की आत्मा, श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, संस्कृति और सभ्यता से जुड़ी हुई है. हिन्दी के अब तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाने के कारणों के बारे में सामान्यतः आम भारतीय की सहज समझ यही होगी कि दक्षिण भारतीय नेताओं के विरोध के चलते ही हिन्दी देश की प्रतिनिधि भाषा होने के बावजूद राष्ट्रभाषा के रूप में अपना वाजिब हक नहीं प्राप्त कर सकी, जबकि हकीकत ठीक इसके विपरीत है. मोहनदास करमचंद गांधी यानी महात्मा गांधी सरीखा ठेठ पश्चिमी भारतीय और राजगोपालाचारी जैसा दक्षिण भारतीय नेता का अभिमत था- कि हिन्दी में ही देश की राष्ट्रभाषा होने के सभी गुण मौजूद है. वर्धा के राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की अध्यक्षा करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने साफ शब्दों मे कहा था कि देश कि बहुसंख्यक आबादी न सिर्फ हिन्दी लिखती-पढ़ती, बल्कि भाषाई समझ रखती है, इसलिए हिन्दी को ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए. उनका मानना था कि आजादी के बाद अगर हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाया जाता है, तो देश की बहुसंख्यक जनता को आपत्ति नहीं होगी. साथ ही सी. राजगोपालाचारी और खां अब्दुल गफ़्फ़ार खां भी हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप मे अधिष्ठापित होना देखना चाहते थे. अखंड भारत और हर उस मुद्दे की तरह राष्ट्रभाषा के रूप मे हिन्दी को लेकर यदि राष्ट्रीय स्वीकार्यता नहीं बन पाई, तो उसके पीछे अंग्रेजी से ज्याद अंग्रेजीवादी सोच वाले भारतीय नेता अधिक जिम्मेदार थे. दरअसल इन नेताओं का विभाजन जाति, क्षेत्र, भाषा के आधार पर न करके उनके सोच के धरातल (मैकाले पद्धति) पर एक समूह मे रखा जाना चाहिए.
मौजूदा समय मे विस्तार, प्रसार और प्रभावी बाजारू उपस्थिति को देखते हुए ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता जिसके आधार पर कहा जा सके कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं होना चाहिए सिवाय राजनीतिक कुचक्र के. भारत का दुर्भाग्य यह रहा है कि सहृदयता के नाम पर कुछ प्रतिनिधि भारतीय ही उसकी स्मिता की जड़ों मे मट्ठा डालने का कम करते आए हैं. हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप मे राष्ट्रीय स्वीकृति नहीं मिलने के पीछे भी इसी तरह के सोच वाले नेताओं की प्रमुख भूमिका रही है. दुर्भाग्यवस उसी मानसिकता के लोगों का बाहुल्य आज भी कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक निर्णायक स्थिति में है. बोली की दृष्टि से संसार की सबसे दूसरी बड़ी बोली हिन्दी हैं.पहली बड़ी बोली मंदारीन है जिसका प्रभाव दक्षिण चीन के ही इलाके में सीमित है. चूंकि उनका जनघनत्व और जनबल बहुत है. इस नाते वह संसार की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है, पर आचंलिक ही है. जबकि हिन्दी का विस्तार भारत के अलावा लगभग 40 प्रतिशत भू-भाग पर फैला हुआ है, लेकिन किसी भाषा की सबलता केवल बोलने वाले पर निर्भर नहीं होती, वरन उस भाषा में जनोपयोगी और विकास के काम कितने होते हैं, इस पर निर्भर होता है. उसमें विज्ञान तकनीकि और श्रेष्ठतम् आदर्शवादी साहित्य की रचना कितनी होती है. साथ ही तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उस भाषा के बोलने वाले लोगों का आत्मबल कितना महान है. लेकिन दुर्भाग्य है इस भारत का कि प्रो. एम.एम. जोशी के शोध ग्रंथ के बाद भौतिक विज्ञान में एक भी दरजेदार शोधग्रंथ हिन्दी में नहीं प्रकाशित हुआ. जबकि हास्यास्पद बाद तो यह है कि अब संस्कृत के शोधग्रंथ भी देश के सैकड़ों विश्वविद्यालय में अंग्रेजी में प्रस्तुत हो रहे है.
भारत में पढ़े-लिखे समाज में हिन्दी बोलना दोयम दर्जे की बात हो गई है और तो और सरकार का राजभाषा विभाग भी हिन्दी को अनुवाद की भाषा मानता है.संसार के अनेक देश जिनके पास लीप के नाम पर केवल चित्रातक विधियां हैं, वह भी विश्व में बड़े शान से खड़े हैं जैसे जापानी, चीनी, कोरियन, मंगोलिन इत्यादि, तीसरी दुनिया में छोटे-छोटे देश भी अपनी मूल भाषा से विकासशील देशो में प्रथम पक्ति में खड़े हैं. इन देशों में वस्निया, आस्ट्रीया, वूलगारिया, डेनमार्क, पुर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, वेलजियम, क्रोएशिया, फिनलैंड, फ्रांस, हंग्री, नीदरलैंड, पोलैंड और स्वीडन इत्यादि प्रमुख हैं.
भारत में अंग्रेजी द्वारा हिन्दी को विस्थापित करना यह केवल दिवास्वपन है, क्योंकि भारतीय फिल्मों और कला ने हिन्दी को ग्लोबल बना दिया है और भारत दुनिया में सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार होने के नाते भी विश्व वाणिज्य की सभी संस्थाएं हिन्दी के प्रयोग को अपरिहार्य मान रही हैं. हमें केवल इतना ही करना है कि हम अपना आत्मविश्वास जगाएं और अपने भारत पर अभिमान रखें. हम संसार में श्रेष्ठतम् भाषा विज्ञान बोली और परंपराओं वाले है. केवल हीन भाव के कारण हम अपने को दोयम दर्जे का समझ रहे हैं, वरना आज के इस वैज्ञानिक युग में भी संस्कृत का भाषा विज्ञान कंप्यूटर के लिए सर्वोत्तम पाया गया है.

कुछ वर्ष पहले देश के एक उच्च न्यायालय ने चर्चित फैसला सुनाया था, जिसके अनुसार हिन्दी को देश की राष्ट्रभाषा नहीं सिर्फ राजभाषा बताया गया था. आजादी के लगभग सात दशक बाद भी राष्ट्रभाषा का नहीं होना दुखद है. जब देश का एक राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक है यहा तक कि राष्ट्रीय पशु-पक्षी भी एक है. ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि देश की अपनी राष्ट्र भाषा क्यों नहीं होनी चाहिए ? भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी की पिछलग्गू भाषा के रूप में क्यों बने रहना चाहिए ? 10 सितंबर से 13 सितंबर 2015 तक भोपाल मे आयोजित हो रहे विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान विद्वानों को अन्य जवलंत मुद्दों के साथ इन पर भी विचार करना चाहिए साथ ही इस दौरान हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान के साथ ही सभी विषयों की व्यवहारिक भाषा के रूप में विकसित करने के उपायों के साथ ही उसे अनुवाद के स्थान पर मौलिक भाषा के रूप मे अधिष्ठापित करने के उपाय पर भी विचार होना चाहिए. हिन्दी को लेकर कार्यपालिका और प्रभावी ताकतों की सोच को कैसे बदला जाए कि वे उसे मौलिक भाषा के रूप में स्थान दिलाने के लिए प्रभावी और सर्व सम्मति नीति बनाए.


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