सगीर किरमानी
औरंगजेब के बाद अब बहादुरशाह जफर …… जी नहीं, बहादुरशाह जफर रोड का नाम बदलने की बात नहीं हो रही है, बल्कि उस मशहूर गजल से बहादुरशाह जफर का नाम हटाने का जिक्र हो रहा है, जो उनकी कालजयी रचनाओं में गिनी जाती है। प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने दावा किया है कि मशहूर गजल ‘ न किसी की आंख का नूर हूं ’ के रचयिता आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर नहीं, बल्कि उनके दादा मुज्तर खैराबादी हैं। पिछले दिनों नई दिल्ली में जावेद अख्तर ने पांच भागों में संग्रहीत मुज्तर खैराबादी की रचनाओं के संकलन ‘खिरमन’ का विमोचन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथों करवाया। इसमें बाकायदा ‘ न किसी की आंख का नूर हूं ’ गजल को शामिल किया गया है। अब उर्दू साहित्य के विद्यार्थियों के सामने यह दुविधा पैदा हो गई है कि इस गजल को बहादुरशाह जफर की रचना मानें या मुज्तर खैराबादी की। जावेद अख्तर अपने दावे के सबूत के तौर पर अपने दादा की स्वरचित रचनाओं की वे पांडुलिपियां पेश करते हैं, जो मुज्तर खैराबादी के अप्रकाशित साहित्य के भंडार में मिली हैं और जिन्हें एकत्र करने में जावेद पिछले दस साल से जुटे थे। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट रहे मुज्तर खैराबादी का देहांत 1927 में हुआ, तब जावेद के पिता मशहूर शायर जांनिसार अख्तर 15 वर्ष के थे। जावेद का कहना है कि उनके दादा की पांडुलिपियों को उनके पिता ठीक से संभाल नहीं सके, जो अब जाकर उन्होंने कई लोगों के निजी संग्रहालयों से हासिल की हैं।
जावेद अख्तर का दावा उर्दू अदब से जुड़े लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह गजल बहादुरशाह जफर के कृतित्व और व्यक्तित्व की पहचान बन गई थी। बहादुरशाह जफर का नाम उर्दू के उच्चकोटि के शायरों में षुमार किया जाता है। उन्होंने मिर्जा गालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे अजीम शायरों को संरक्षण दिया। जफर की तमाम शायरी ‘कुल्लियाते-जफर’ में संकलित है।
कुछ वर्ष पहले भी जावेद अख्तर और उनसे पहले उनके पिता जांनिसार अख्तर ने दावा किया था कि यह गजल मुज्तर खैराबादी की है। उस वक्त भी उनके दावे पर काफी विवाद हुआ था मगर उस समय इस बहस को ज्यादा अहमियत नहीं दी गई और यह गजल बहादुरशाह जफर के नाम से ही जानी-पहचानी जाती रही। 1931 में भोपाल में जन्मे मशहूर शायर और अलोचक अशरफ नदीम भोपाली ने तो इसे जफर की रचना साबित करने के लिए एक किताब ही लिख डाली, जिसमें उन्होंने दावा किया कि यह गजल जफर ने रंगून में कैद के दौरान लिखी थी। अशरफ नदीम ने अपनी किताब ‘ ‘बहादुरशाह जफर की एक गजल पर तहकीकी मुजल्ला’ में लिखा कि जफर 1775 में जन्मे और 1862 में उनका देहांत हुआ, जबकि मुज्तर खैराबादी का जन्म 1865 में हुआ और देहांत 1927 में। इस प्रकार जफर की मृत्यु तक मुज्तर पैदा नहीं हुए थे। यानी वे जफर के समकालीन नहीं थे और उनकी किसी गजल के साथ जफर का नाम जुड़ने की गलती होने की संभावना न के बराबर है।
नेशनल आर्काइव आॅफ इंडिया में इतिहासकार डाॅ़ मेहदी हुसैन की पुस्तक ‘बहादुरशाह जफर और 1857 की जंग’ सुरक्षित है। 1958 में प्रकाशित इस किताब में जफर के कई शेर उद्ध्रत किए गए हैं, जिनमें इस विवादास्पद गजल के भी कई शेर हैं। अशरफ नदीम लिखते हैं कि बहादुरशाह जफर के देहांत के बाद रंगून के मुसलमानों ने उनका मकबरा बनाने की योजना तैयार की। इस योजना में हिंदुस्तान भर के लोगों से सहयोग की अपील की गई। इस जज्बाती अपील में जफर के कई शेर उद्ध्रत किए गए, जिनमें इस विवादास्पद गजल के कुछ शेर भी शामिल थे। गुलजार देहलवी, बेकल उत्साही, शमीम तारिक और मजहर इमाम जैसे अदीबों ने इसके जफर की गजल होने की तस्दीक की है, जबकि गोपीचंद नारंग, आले अहमद सुरूर और न्याज फतहपुरी जैसे अदीब जावेद के दावे के साथ रहे हैं। दिल्ली उर्दू अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष और जामिया मिल्लिया में उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष डाॅ खालिद महमूद का कहना है कि अभी तक इस मसले पर अधिकृत तौर पर संजीदगी से विचार नहीं किया गया है लेकिन अब वक्त आ गया है कि उर्दू के ‘जिम्मेदारान’ तहकीक और शोध के बाद इस बात की तस्दीक करें कि यह गजल जफर की है या मुज्तर की।

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