अमित मोहन प्रसाद
उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के जिक्र से ही अधिकांश लोगों के मन में गरीबी और पिछड़ेपन की तस्वीर उभर जाती है। यह क्षेत्र अपने विशिष्ट भौगोलिक इलाके और जलवायु की परिस्थितियों के कारण कृषि के उत्पादन के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी पिछड़ा हुआ है। बुन्देलखण्ड के उत्तर प्रदेश वाले हिस्से में झांसी और चित्रकूट डिवीजनों के 7 जिले आते हैं। इस क्षेत्र में रबी की अच्छी और अधिक कीमत वाली फसलें जैसे चना, मसूर और मटर आदि भारी मात्रा में उगाई जाती हैं, लेकिन इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से केवल एक फसल पर ही निर्भर रहते हैं। खरीद के दौरान कम क्षेत्र में बुआई हो पाती है।

परंपरागत रूप से रबी के दौरान बुआई किए गए रकबे की तुलना में बुन्देलखण्ड के किसान खरीफ सीज़न के दौरान केवल लगभग 50 प्रतिशत रकबे में बुआई करते हैं। रबी के दौरान जहां फसल बुआई का कुल रकबा लगभग 18.50 लाख हेक्टेयर है। खरीफ के दौरान फसल बुआई का रकबा लगभदग 9 लाख हेक्टेयर ही रहता है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह क्षेत्र अन्न प्रथा के कारण प्रभावित रहता है। यह एक परंपरागत प्रणाली है जिसके तहत लोग अपने दुधारू पशुओं को भी खेतों में बिना रोक-टोक के चरने के लिए छोड़ देते हैं। यह पशु फसलों को खा जाते हैं इसलिए किसान खरीफ सीजन के दौरान अपने खेतों में बुआई के इच्छुक नहीं रहते हैं। लेकिन रबी के सीज़न में यह सब नहीं होता है क्योंकि किसान अपने पशुओं को घर पर ही रखते हैं। इस घटना को समझने के लिए किसी भी व्यक्ति को बुन्देलखण्ड में प्रचलित विशिष्ट परिस्थितियों की सराहना करनी पड़ेगी। सर्वप्रथम बात यह है कि पूरा क्षेत्र परंपरागत रूप से वर्षा पर आधारित है और पानी की कमी से ग्रस्त रहता है। मानसून की अनिश्चिताओं के कारण यहां किसान अपने खेतों में फसल की बुआई करने को वरीयता नहीं देते। दूसरी बात यह है कि इस क्षेत्र में भूमि जोत का औसतन आकार राज्य के भूमि जोत की तुलना में बहुत बड़ा है क्योंकि यहां जनसंख्या का घनत्व काफी कम है। इसलिए विगत में किसानों के लिए केवल एक अच्छी फसल ही बोना संभव रहता था। लेकिन ऐसा करना लंबे समय तक संभव नहीं रहा। अब स्थिति बदल रही है क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है और इस क्षेत्र में भी औसत भूमि जोत का आकार काफी कम हो गया है। तीसरी बात यह है कि यह क्षेत्र वर्षा आधारित है। इसलिए गर्मी के मौसम के दौरान इस क्षेत्र में चारे की सामान्य रूप से कमी हो जाती है। इस कारण किसानों को मजबूरन अपने पशुओं को खेतों में जो भी मिले वही चरने के लिए खुला छोड़ना पड़ता है। धीरे-धीरे यह स्वीकार्य प्रथा बन गयी और किसानों ने बुन्देलखण्ड में खरीफ सीज़न के दौरान अपने खेतों में फसलों की बुआई बंद कर दी। लेकिन इतने बड़े क्षेत्र में फसलों की बुआई न होना देश के लिए एक तरह से राष्ट्रीय अपव्यय भी है।

रबी के पिछले दो सीजनों के दौरान बुन्देलखण्ड में बैमौसमी बारिश और ओलावृष्टि के कारण किसानों को 2014-15 में भारी नुकसान उठाना पड़ा। बुन्देलखण्ड में फसल बीमा के तहत किसानों की कवरेज लगभग 15 प्रतिशत है जो राज्य की औसत 4 से 5 प्रतिशत कवरेज की तुलना में काफी अधिक है लेकिन अभी भी यह प्रतिशत बहुत कम है क्योंकि इस क्षेत्र के किसान मुख्य रूप से रबी से प्राप्त आय पर ही निर्भर करते हैं। इस कारण उनके लिए यह बहुत बड़ा झटका था। राज्य सरकार ने एक विशिष्ट नीति की घोषणा की तो किसान कुछ अतिरिक्त आय जुटाने के लिए बहुत उत्सुक नज़र आए। बुन्देलखण्ड में खरीफ के दौरान तिल की खेती की संभावनाओँ को महसूस करते हुए इस क्षेत्र के किसानों के लिए अनुदान पांच गुणा बढ़ाकर 20 रुपये प्रति किलो से 100 रूपय प्रति किलों कर दिया गया था। तिल उत्पादन को बढ़ावा देने का निर्णय इस तथ्य को ध्यान में रखकर लिया गया था कि पशु इस फसल को नहीं खाते हैं। इस क्षेत्र के किसानों में वितरित करने के लिए तिल के बीजों की भारी मात्रा में खरीदारी की गयी। खरीफ के दौरान तिल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक आक्रामक अभियान शुरू किया गया था। विभागीय अधिकारी, गैर-सरकारी संगठन, जिला और सम्भागीय अधिकारी और अन्य संबंधित लोगों ने तिल के अधीन रकबा बढ़ाने और पिछले वर्ष के आँकड़ों की तुलना में सामान्य रूप से अधिक रकबा लाने के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाया।

इसका परिणाम बहुत उत्साहजनक रहा। खरीफ 2014 की तुलना में बुन्देलखण्ड में इस वर्ष 2 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे में बुआई की गयी जिसमें से 1.25 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त रकबे में तिल की बुआई हुई। यह वादा किया गया था कि अगर किसान अन्न प्रथा के बावजूद इस फसल से अच्छा लाभ अर्जित करने में सफल हो जाएंगे तो वे आगे फसल की बुआई करेंगे। यह वादा अब सही सिद्ध हुआ है। स्थानीय प्रशासन के सक्रिय हस्तक्षेप के कारण ही यह संभव हो पाया है। जालौन जिले की अभी हाल में की गयी यात्रा के दौरान मैंने किसानों को प्रशासन का आभारी देखा जिसने किसानों को अपने पशुओं को दूसरों के खेतों में बे-रोकटोक चरने से रोकने के लिए रोका। जिसके परिणामस्वरूप बुआई के क्षेत्र में बढ़ोत्तरी हुई। ओरई-झांसी राजमार्ग के दोनों और कई-कई किलोमीटर तक तिल के खेतों को लहराते हुए देखना एक सुःखद अनुभव रहा। पशुओं के लिए चारे का प्रबंध करना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जिसका निश्चित रूप से समाधान किए जाने की जरूरत है। जिस किसान की क्रय शक्ति है वह बाजार से निश्चित रूप आवश्यक मात्रा में चारा खरीद सकता है।

तिल उत्पादन की अर्थव्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है। यह फसल वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए है। उत्पाद को बेचने के लिए बाजार की कोई कमी नहीं है। क्योंकि तिल की खेती बहुत कम देशों में की जाता है जबकि हर एक देश में इसकी किसी न किसी रूप में खपत रहती है। तिल का तेल खाना बनाने, मिठाई बनाने, मालिश करने, दवाई के रूप में और सौंदर्य प्रसाधन उद्देश्यों के साथ-साथ अन्य बहुत सी जगह प्रयोग किया जाता है। तिल के बीजों का भारत में गज़क, रेवड़ी, लड्डू और तिलकुट जैसी मिठाइयां बनाने में प्रयोग किया जाता है जबकि मध्य-पूर्व देशों में ताहिनी सॉस और पश्चिमी देशों में बन्स और बर्गरों के ऊपर लगाने में इसका प्रयोग किया जाता है। धार्मिक अवसरों पर विभिन्न अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग किया जाता है। बाजार में किसानों को अन्य तिलहनों के मुकाबले में तिल के अधिक दाम मिलते हैं।

यह एपिसोड मुझे अलीबाबा और चालीस चोरों की कहानी की याद दिलाता है। जब अलीबाबा कहता है ‘खुल जा सिमसिम’ तो गुफा का मुंह खुल जाता है और गुफा में छिपा खज़ाना दिखाई देता है। यह बुन्देलखण्ड के लिए ‘खुल जा सिमसिम’ वाला ही क्षण हो जो बुन्देलखण्ड के लिए एक वास्तविक मोड़ है। बारिश की बहुत अधिक कमी के कारण इस वर्ष किसानों के लिए आय बहुत ज्यादा आकर्षक नहीं रही लेकिन इसने भविष्य में एक जबरदस्त आशा का संचार कर दिया है। खरीफ के दौरान कृषि की पद्धति ने इस क्षेत्र को हमेशा के लिए परिवर्तित कर दिया है।
लेखक त्तर प्रदेश के कृषि विभाग में प्रमुख सचिव हैं)

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