नज़्म
जाड़ों की सहर
कितनी दिलकश होती है
जाड़ों की
कोहरे से ढकी सहर
जब
सुर्ख़ गुलाबों की
नरम पंखुरियों पर
ओस की बूंदें
इतराती हैं
और फिर
किसी के
लम्स का अहसास
रूह की गहराई में
उतर जाता है
रग-रग में
समा जाता है
जाड़े बीतते रहते हैं
मौसम-दर-मौसम
वक़्त की, परतों की तरह
मगर
अहसास की वो शिद्दत
क़ायम रहती है
दूसरे पहर की
गुनगुनी धूप की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान

एक नज़र

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