अम्बरीश कुमार
उत्तर प्रदेश में बहराइच जिले के कतरनिया घाट से करीब दस कोस दूर एक नदी है, जो नेपाल से आती है- गेरुआ. आगे जाकर यह नेपाल से ही आई एक अन्य नदी कौडियाला से मिलकर दो धाराओं में बंट जाती है. बाद में ये घाघरा के नाम से जानी जाती हैं और कुछ दूरी तक इसका पानी बहुत साफ भी रहता है.

इसी से कुछ दूरी पर सरयू नदी भी है. इन दोनों नदियों का पानी इस अंचल में बहुत साफ नजर आता है. खासकर गेरुआ नदी का पानी. बहुत से लोगों को इस बात पर हैरत हो सकती है कि इस नदी के उद्गम के आसपास अब भी नदी का पानी लोग सीधे पीते हैं. जरवल रोड के करीब घाघरा घाट पर इस नदी का करीब एक किलोमीटर  चौड़ा पाट इसका असली रूप भी दिखाता है. यहां तक यह नदी बहुत स्वच्छ नजर आती है. इसका पानी चूंकि पेट की बीमारियों के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है, इसलिए लोग सीधे इसे पीते हैं.

अपने उद्गम स्थल से लेकर आगे तक गेरुआ नदी सिर्फ जंगल के बीच से गुजरती है और किसी भी शहर से इसका कोई वास्ता नहीं पड़ता. यही वजह है कि इस नदी में किसी शहर का कोई नाला नहीं गिरता, और वनक्षेत्र से गुजरने की वजह से बहुत-सी जड़ी बूटियां इसके पानी में गिरकर इसे और समृद्ध करती है. एक गौर करने वाली बात यह भी है कि इस नदी में मछली के शिकार पर रोक है, क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में मगरमच्छ और घडि़याल रहते है. वन्य जीव अभयारण्य के बीच से निकलने की वजह से इस पर अभयारण्य के नियम-कायदे भी लागू हैं. इस नदी में डॉल्फिन से लेकर रोहू, टेंगन, भाकुर और महाशीर जैसी मछलियां पाई जाती हैं, जिनका शिकार घडि़याल और मगरमच्छ से लेकर बड़े परिंदे करते हैं. नदी का पानी पारदर्शी है और ऊपर से देखने पर हरा नजर आता है. इसकी स्वच्छता का आलम यह है कि इसे नाव से पार करने वाले लोग बोतल में इसका पानी भरकर पीते हैं.

नदी से कुछ किलोमीटर बाद ही नेपाल का बर्दिया जिला शुरू हो जाता है. इसलिए नदी पर आवाजाही बनी रहती है. हर कोई इस नदी को देखकर देश की दूसरी नदियों से तुलना करना नहीं भूलता. जैसे, लखनऊ  से गुजरने वाली गोमती नदी का पानी बुरी तरह जहरीला हो चुका है और इसे लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल भी कई बार चेतावनी दे चुका है. बावजूद इसके सीतापुर में चीनी मिलों का जहरीला कचरा इसमें डाला जा रहा है, तो बाराबंकी में बूचड़खानों का कचरा इसमें मिलता है.
ऐसे में, करीब 150 किलोमीटर दूर गेरुआ नदी को देखने से एक असली नदी की कल्पना की जा सकती है. जाहिर है, जो भी नदी किसी शहर से बची रही, वह आज भी जिंदा है. देश में दूसरा उदाहरण चंबल नदी का है, जिसका पानी आज भी साफ है. गौर से देखें, तो यह कहानी दरअसल नदियों की नहीं है, बल्कि उन तमाम शहरों की है, जो अपने आसपास से गुजरने वाली नदियों को जिंदा रहने लायक नहीं छोड़ते.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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