फ़िरदौस ख़ान
रात में कुछ देर के लिए बिजली चले जाए, तो लोग बेहाल हो जाते हैं. रौशनी के लिए वे क्या कुछ नहीं करते. रौशनी के बिना ज़िन्दगी का तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता है. लेकिन इस दुनिया में करोड़ों लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने कभी रौशनी नहीं देखी, वे नहीं जानते कि रौशनी होती कैसी है या रौशनी किस चीज़ को कहते हैं.
महाराष्ट्र के वर्धा शहर के रहने वाले सुरेश मूलचंद चौधरी ने कभी उजाला नहीं देखा. वह जन्मजात नेत्रहीन हैं.  क़रीब 56 साल के सुरेश संगीत शिक्षक हैं. उनके माता-पिता की आंखें बिल्कुल सही थीं. उनकी दो बहनें और चार भाई भी ठीक हैं. वह बताते हैं कि नेत्रहीनता की वजह से उन्हें बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़े. हालांकि उनके माता-पिता और भाई-बहनों ने उनका बहुत साथ दिया, लेकिन इसके बावजूद वह अकसर ख़ुद को अलग-थलग महसूस करते थे.
उन्होंने संगीत को अपनी ज़िन्दगी बना लिया और फिर इसी में खो गए. उन्होंने संगीत में विशारद की उपाधि हासिल की. उनका विवाह हुआ. उनकी पत्नी ने उन्हें ज़िन्दगी की हर ख़ुशी देने की कोशिश की. एक तरह से वही उनकी आंखें बन गई और वह अपनी पत्नी की आंखों से ही दुनिया देखने लगे. साल 1997 में उनकी पत्नी का निधन हो गया और एक बार फिर से वह अकेले हो गए. वह घर में ही एक संगीत विद्यालय चला रहे हैं. वह बताते हैं कि वह अपनी पोती और अपने विद्यार्थियों के साथ बहुत ख़ुश रहते हैं. उन्होंने संगीत का जो ज्ञान पाया है, उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के काम में लगे हुए हैं. इससे उन्हें जहां कुछ आमदनी हो जाती है, वहीं दिली सुकून भी हासिल होता है.
वह बताते हैं कि उन्हें आंखें मिल रही थीं, लेकिन चिकित्सकों ने कहा कि वह जन्मजात नेत्रहीन हैं, इसलिए उन्हें किसी और की आंखें नहीं लगाई जा सकतीं. वह ईश्वर का शुक्र अदा करते हुए कहते हैं कि उनके बच्चे नेत्रहीन नहीं हैं. नेत्रहीन लोगों से वह यही कहना चाहते हैं कि वे अपने मन की आंखों से दुनिया को देखें.

दुनियाभर में तक़रीबन पांच करोड़ लोग नेत्रहीन हैं. भारत में नेत्रहीनों की तादाद सवा करोड़ के आसपास है, जबकि 80 लाख लोग ऐसे हैं, जिनकी एक आंख ठीक है और दूसरी आंख से वह नहीं देख पाते. कई करोड़ लोग नेत्र संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं. देश में क़रीब 60 फ़ीसद मामलों में मोतियाबिंद इसके लिए ज़िम्मेदार है, 20 फ़ीसद मामलों में बिम्ब में कमी और 6 फ़ीसद मामलों में कालामोतिया नेत्रहीनता की अहम वजह है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी ‘विज़न 2020 पहल’ में मोतिया और बाल नेत्र रोग को नेत्रहीनता का प्रमुख कारण माना है.

क़ाबिले-ग़ौर है कि दान में मिली 30 फ़ीसद आंखों की नेत्रहीनों को लगाई जाती हैं, जबकि बाक़ी 70 फ़ीसद आंखें बेकार चली जाती हैं. इसकी वजह यह है कि गंभीर बीमारियों के शिकार लोगों की आंखें किसी दूसरे नेत्रहीन व्यक्ति को नहीं लगाई जा सकतीं. राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीसीबी) की 2012-13 की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2012-13 में केवल 4,417 कार्निया उपलब्ध थे, जबकि हर साल तक़रीबन 80 हज़ार से एक लाख के बीच लोगों को इनकी ज़रूरत होती है.  चिकित्सकों का कहना है कि आज के दौर में एक व्यक्ति की दो आंखों से 6 लोगों की आंखों की रौशनी लौटाई जा सकती है. एक आंख के अलग-अलग हिस्सों को तीन लोगों की आंखों में इस्तेमाल कर सकते हैं. कॉर्निया आंख की पुतली के ऊपर शीशे की तरह की एक परत होती है. कॉर्निया आंख में संक्रमण, चोट लगने और बचपन में पोषण की कमी की वजह से क्षतिग्रस्त हो सकती है. कॉर्निया के क्षतिग्रस्त होने से जिसकी आंखों की रौशनी चली जाती है, उसे कॉर्निया प्रत्यारोपण के बाद रौशनी लौटाई जा सकती है.

देश में नेत्रदान को प्रोत्साहित करने के लिए मुहिम चलाई जा रही है, ताकि मृतकों की आंखें उन लोगों को लगाई जा सकें, जो किसी भी वजह से अपनी आंखों की रौशनी खो चुके हैं. हालांकि मुहिम कुछ  हद तक कामयाब भी हो रही है और लोग अपनी आंखें दान भी कर रहे हैं. लेकिन इस मुहिम को उतनी कामयाबी नहीं मिल पा रही है, जितनी मिलनी चाहिए. इसकी सबसे बड़ी वजह रूढ़िवादिता और अंधविश्वास है. कुछ लोगों का मानना है कि आंखें दान करना गुनाह है. जब वे अपनी क़ब्रों से उठाए जाएंगे, तो वे अंधे उठेंगे. इसलिए वे आंखें या अन्य अंग दान करने के ख़िलाफ़ हैं. भावनात्मक कारणों से भी लोग आंखें दान नहीं करते. वे नहीं चाहते कि उनके परिजन की आंखें निकाली जाएं.
ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिनमें अमुक व्यक्ति ने तो अपनी आंखें दान कर दी थीं, लेकिन मरणोपरांत उसके परिजन नेत्रदान के लिए तैयार नहीं होते. कई मामलों में परिवार वाले अंगदान केंद्रों को इस बारे में कोई जानकारी मुहैया नहीं कराते. अंग दान के मामले में सबसे पहला काम डोनर कार्ड पर हस्ताक्षर करना है. इस कार्ड में दान कर्ता का नाम और पता लिखा होता है. यह कार्ड इस बात का गवाह है कि व्यक्ति अपना अंग दान करना चाहता है. यह भी ज़रूरी है कि अंगदान की इच्छा के बारे में व्यक्ति अपने परिवार के लोगों और अपने मित्रों को इसकी जानकारी दे, वरना उसकी मौत के बाद उसकी अंगदान की इच्छा पूरी नहीं हो पाएगी. ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी हो जाता है, ताकि व्यक्ति की मौत के बाद परिवार के सदस्य अंगदान केंद्र को सूचना दे सकें और अंगदान की सहमति भी दे सकें. दरअसल, परिवार की मंज़ूरी मिलने के बाद ही अंग दान के फ़ैसले को आख़िरी माना जाता है.

ग़ौरतलब है कि केंद्र सरकार ने साल 1976 में नेत्रहीनता को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया था. इसका मक़सद कुल आबादी की 0.3  फ़ीसद की व्यापकता दर हासिल करना था. नेत्रहीनता को नियंत्रित करने के लिए, देश भर में ज़िला स्तर पर अंधता नियंत्रण संस्थाओं को भी स्थापित किया गया और कई ग़ैर सरकारी संगठन भी भारत में अंधता नियंत्रण के लिए अहम किरदार निभा रहे हैं. इससे मोतियाबिंद का ऑपरेशन करने, स्कूली बच्चों की आंखों का परीक्षण करने और दान में दी गई आंखों को इकट्ठा करने के मामले में कामयाबी मिली है.

चिकित्सकों के मुताबिक़ आंखों को दुष्प्रभावित करने वाले कई प्रमुख रोग हैं, जैसे मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, आयु संबंधित मैक्यूलर ह्रास, भेंगापन, अलग हो गया रेटिना, निकट दृष्टि और दीर्घ दृष्टि.  चूंकि आंखें हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं, इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि इन्हें स्वस्थ और रोग मुक्त रखने के लिए सावधानियां बरती जाएं. मसलन, अगर आप कोई ध्यान लगाने वाला क्रियाकलाप कर रहे हों यथा पढ़ाई सिलाई या कंप्यूटर पर काम, तो आधे घंटे के अंतरालों पर अपनी आंखों को कुछ देर के लिए आराम दें. अपनी आंखें बंद करने, अपने काम से हट कर देखने या आकाश में टकटकी लगाने से आंखों का तनाव कम किया जा सकता है. आंखों को हथेलियों से ढक लेने से भी थकी हुई आंखों को आराम मिलता है. पढ़ते वक़्त या कंप्यूटर की स्क्रीन पर देखते वक़्त बार-बार आंखें मिचकाने से भी आंखों पर ज़्यादा ज़ोर नहीं पड़ता. सूरज की तेज़ रौशनी, धुएं, धूल और आंखों को नुक़सान पहुंचाने वाली अन्य चीज़ों से दूर रहकर भी आंखों को सही रखा जा सकता है.

देशभर में समय-समय पर आंखों की जांच और आंखों के ऒपरेशन के लिए शिविर लगाए जाते हैं. ऐसे शिविरों में ग़लत ऒपरेशन से लोगों की बची-खुची रौशनी भी ख़त्म हो जाने के मामले सामने आते रहते हैं. इसलिए बेहतर है कि आप इन शिविरों में आंखों की जांच भले ही करा लें, लेकिन ऒपरेशन किसी अस्पताल में चिकित्सक से ही कराना चाहिए.

बहरहाल, अंधता निवारण के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की ज़रूरत है. आंखों की सही देखभाल से जहां आंखों की बीमारियों से बचा जा सकता है, वहीं आंखें दान करने से उन लोगों की ज़िन्दगी में फिर से उजाला किया जा सकता है, जो किसी भी वजह से अपनी आंखों की रौशनी खो चुके हैं.

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