फ़िरदौस ख़ान
ग़रीब हमेशा अपनी मेहनत की कमाई खाता है. वह किसी से क़र्ज़ लेगा, तो ब्याज़ समेत उसे देगा. ग़रीबों का क़र्ज़ से बहुत पुराना नाता है. घर बनवाना हो, छोटा-मोटा काम-धंधा शुरू करना हो, खेती-किसानी के लिए बीज-खाद ख़रीदनी हो, बैल ख़रीदना हो, शादी-ब्याह हो या फिर इलाज के लिए पैसे की ज़रूरत हो, अमूमन वह अपनी तमाम बड़ी ज़रूरतें क़र्ज़ लेकर ही पूरी करता है. महंगाई के दौर में दिन-रात मेहनत करके वह जो कमाता है, उसमें दो वक़्त की रोटी मिलना भी मुश्किल होता जा रहा है. ऐसे में दूसरे ख़र्च वह कहां से पूरे करेगा. मजबूरन उसे क़र्ज़ लेना पड़ता है. कभी वह किसी साहूकार से क़र्ज़ लेता है, तो कभी किसी बैंक से. साहूकार से लिया क़र्ज़ कभी पूरा नहीं होता. ब्याज़ पर ब्याज़ यानी चक्रवृद्धि ब्याज़ के चंगुल में फंसा व्यक्ति बरसों क़र्ज़ चुकाता रहता है, लेकिन क़र्ज़ है कि कभी ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता. क़र्ज़ पर उठाई गई रक़म का ब्याज़ चुकाने में उसकी ज़िन्दगी बीत जाती है. पीढ़ी-दर-पीढ़ी क़र्ज़ क़ायम रहता है. एक व्यक्ति क़र्ज़ लेता है और उसकी आने वाली पीढ़ियां क़र्ज़ चुकाने में अपनी ज़िन्दगी बिता देती हैं. साहूकर के क़र्ज़ के चक्कर में व्यक्ति का घर, पशु और खेत सब बिक जाते हैं. आज़ादी के बाद सरकार ने लोगों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए बैंकों के ज़रिये क़र्ज़ देना शुरू किया. लेकिन ग़रीबों की ज़िन्दगी में कोई ज़्यादा बदलाव नहीं आया. साहूकार भी ग़रीबों को उनके गहने, घर, खेत वग़ैरह गिरवी रखकर क़र्ज़ देते हैं और बैंक भी ठीक ऐसा ही करते हैं. क़र्ज़ न चुकाने पर साहूकार क़र्ज़दार की गिरवी रखी चीज़ें और जायदाद हड़प कर जाता है और बैंक भी इससे कुछ ज़्यादा अलग नहीं करते. बैंक क़र्ज़दार की जायदाद नीलाम करके अपनी रक़म की भरपाई कर लेते हैं. ऐसे में उसे फिर कभी दोबारा क़र्ज़ नहीं मिल सकता. इतना ही नहीं क़र्ज़ न चुकाने पर क़र्ज़दार सज़ा भी हो सकती है, जिसमें जुर्माना और क़ैद दोनों ही शामिल है.

जब बारिश और ओलों के क़हर या किसी अन्य वजह से किसानों की लहलाती फ़सलें बर्बाद हो जाती हैं, तो क़र्ज़ के बोझ तले दबे किसान मौत को गले लगा लेते हैं. हर साल किसानों द्वारा ख़ुदकुशी करने के मामले सामने आते हैं. किसानों पर किसी को कोई रहम नहीं आता. कोई उनके क़र्ज़ माफ़ नहीं करता, भले ही वे अपनी जान से चले जाएं.

लेकिन अमीरों की बात अलग है. उन्हें सब माफ़ है. देश के अमीर घराने सारी उम्र ऐश की ज़िन्दगी गुज़ारते हैं. अपने बर्थ डे पर करोड़ों रुपये ख़र्च करते हैं, लेकिन क़र्ज़ नहीं चुकाते. इनका बाल-बाल क़र्ज़ में डूबा होता है. सरकार ऐसे उद्योगपतियों के अरबों रुपये के क़र्ज़ ख़ुशी-ख़ुशी माफ़ कर देती है. और वे फिर से नया क़र्ज़ लेकर ऐश की ज़िन्दगी बसर करते हैं.  रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बैंकों के डूबे क़र्ज़ पर चिंता ज़ाहिर करते हुए अपनी शानो-शौकत पर करोड़ों रुपये ख़र्च करने वालों पर तीखी टिप्पणी की थी. उन्होंने किंगफ़िशर एयरलाइंस के मालिक विजय माल्या द्वारा बर्थडे पार्टी में जमकर ख़र्च करने पर बिना नाम लिए कटाक्ष करते हुए कहा था कि गंभीर रूप से क़र्ज़ में डूबे होने के बावजूद ऐसे लोगों को जन्मदिन की बड़ी-बड़ी पार्टियों जैसे फ़िज़ूलख़र्च से बचना चाहिए. इससे ग़लत संदेश जाता है.

एक अंग़्रेज़ी अख़बार को सूचना के अधिकार के तहत रिजर्व बैंक से मिली जानकारी के मुताबिक़
पिछले तीन वित्तीय सालों में (मार्च, 2015 तक) में सार्वजनिक क्षेत्र के 29 बैंकों ने बड़ी कंपनियों के 1,14,182 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया है. इनमें से 85 फ़ीसद क़र्ज़ सिर्फ़ पिछले साल के दौरान माफ़ किया गया है. यह रक़म इन तीन सालों के पहले के नौ वित्त वर्षों में माफ़ की गई रक़म से बहुत ज़्यादा है. मार्च, 2012 में कुल 15,551 करोड़ रुपये ख़राब क़र्ज़ के तौर पर फंसे थे, जो पिछले साल बढ़कर 52,542 करोड़ रुपये हो गए थे. साल 2004 से 2012 के बीच इस ख़राब क़र्ज़ में बढ़ोतरी की दर महज़ चार फ़ीसद थी, जो साल 2013 से 2015 के बीच 60 फ़ीसद तक पहुंच गई. इससे पता चलता है कि सरकारी बैंक उद्योगपतियों पर किस हद तक मेहरबान हैं.

इस वक़्त देश के सरकारी बैंकों की हालत बहुत ख़राब है. इसकी सबसे बड़ी वजह है, ख़राब क़र्ज़ (एनपीए) यानी ऐसे क़र्ज़ जिनके मिलने की कोई उम्मीद नहीं है. सरकारी बैंकों में एनपीए (नॉन परफ़ॊर्मिंग एसेट) बढ़कर 4.04 लाख करोड़ रुपये हो गया है. क़र्ज़ डुबोने वालों में 23.70 फ़ीसद बड़े उद्योगों की हिस्सेदारी है, जबकि 31.5 फ़ीसद मझोले उद्योग, 16.8 फ़ीसद छोटे उद्योग, 12.3 फ़ीसद कुटीर उद्योग, 7.9 फ़ीसद कृषि से संबंधित क़र्ज़ और  7.80 फ़ीसद क़र्ज़ शामिल हैं. बैंकों का कुल एनपीए चार लाख करोड़ रुपये का है. इसमें से विलफुल डिफ़ॊल्टर पर 64 हज़ार करोड़ रुपये का क़र्ज़ बक़ाया हैं. देश के 29 सरकारी बैंकों ने 1.14 लाख करोड़ का क़र्ज़ डूबा हुआ मान लिया है. ये क़र्ज़ पिछले तीन सालों में डूबे हैं. पिछले 10 साल के डूबे क़र्ज़ का 50 फ़ीसद पिछले तीन सालों में डूब गया. सितंबर 2015 तक बैंकों का एनपीए 1.74 लाख करोड़ रुपये था. 31 मार्च 2015 तक बैंकों ने 7035 डिफ़ॊल्ट घोषित किए हैं. एक हज़ार मामलों के साथ एबीआई में सबसे ज़्यादा क़र्ज़ डूबे हैं. बैंकों के कुल एनपीए का 40 फ़ीसद यानी 1.20 लाख करोड़ सिर्फ़ 30 बड़े देनदारों ने ही डुबोये हैं.

सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करने के लिए जनता पर तरह तरह के टैक्स लगाती है, जिससे महंगाई और ज़्यादा बढ़ जाती है. अमीर घराने जिन पैसों से ऐश करते हैं, वे आम जनता से करों के तौर पर वसूला गया पैसा होता है. सरकार को चाहिए कि वे जनता के ख़ून-पसीने की कमाई को अमीरों पर न लुटाये. अगर सरकार को क़र्ज़ माफ़ ही करने हैं, तो उन ग़रीबों और किसानों के क़र्ज़ माफ़ किए जाने चाहिए, जिनके पास खाने तक को नहीं है, जो ग़रीबी और बदहाली से परेशान होकर आत्महत्याएं करने पर मजबूर हैं. क़र्ज़ उन्हीं के माफ़ होने चाहिए, जिन्हें क़र्ज़ माफ़ी की ज़रूरत है.

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