फ़िरदौस ख़ान
रेलमंत्री सुरेश प्रभु आए दिन रेलवे को लेकर लुभावने घोषनाएं करते रहते हैं, कभी बच्चों को विशेष सुविधाएं देने की, तो कभी महिलाओं को. वे उस सरकार के रेलमंत्री हैं, जो जनता को बुलेट ट्रेन का सब्ज़ ख़्वाब भी दिखाती रहती है. उसने इसे पूरा करने के लिए देश पर एक बड़े कर्ज़ को बोझ भी डाल दिया है. जनता की ख़ून-पसीने की कमाई से भारत को 50 साल तक जापान के 79 हजार करोड़ रुपये के क़र्ज़ की क़िस्तें चुकानी पड़ेंगी. भूखे को ताज की नहीं रोटी की ज़रूरत होती है. आख़िर ये बात सरकार की समझ में क्यों नहीं आती. या फिर अपने नाम बुलेट ट्रेन दर्ज करवाने के लालच में सरकार ने जनता को क़र्ज़ के बोझ तले दबा डाला? देश में रेल सुविधाओं की हालत कितनी बदतर है, सब जानते हैं. हालांकि सरकार यात्रियों को सुविधाएं मुहैया कराने के तमाम दावे करती है,  लेकिन हक़ीक़त यह है कि यात्री सुविधा के नाम पर सिर्फ़ किराया बढ़ जाता है, जबकि यात्रियों की परेशानी ज्यों की त्यों की बरक़रार रहती हैं. ऐसा इसलिए होता है कि जो काम पहले होना चाहिए, वह काम तो होता ही नहीं, जो बाद में होना चाहिए, उसे तरजीह दी जाती है. बहुत से काम किए ही नहीं जाते, सिर्फ़ ख़ानापूरी ही की जाती है.

देश की आबादी और यात्रियों की तादाद के हिसाब से रेलों की संख्या बहुत कम है. रेल के सामान्य कोच की संख्या भी नहीं बढ़ाई जाती. हालत यह है कि सामान्य डिब्बे यात्रियों से खचाखच भरे रहते हैं और इनमें पैर रखने तक की जगह नहीं होती. लोग रेल के शौचालयों तक में खड़े होकर सफ़र करते देखे जा सकते है. कितने ही यात्री डिब्बों के दरवाज़ों में लटक कर सफ़र करते हैं. यात्री जान की परवाह किए बिना रेल की छत पर भी चढ़ जाते हैं. कई बार हादसों में उनकी जान तक चली जाती है. इसके बावजूद रेलवे कोई बेहतर इंतज़ाम नहीं करता. महिला डिब्बे की हालत भी कुछ अच्छी नहीं है. इनमें पुरुष यात्री घुस जाते हैं, जिससे महिलाओं को काफ़ी परेशानी होती है. अगर कोई महिला यात्री उनका विरोध करती है, तो वे झगड़ना शुरू कर देते हैं. कई बार मामला गाली-गलौच तक पहुंच जाता है.  इसके अलावा महिला डिब्बा कभी आगे लगाया जाता है, तो कभी सबसे पीछे और कभी बीच में. ऐसी हालत में महिलाओं को डिब्बे तक पहुंचने में दिक़्क़त का सामना करना पड़ता है. इस चक्कर में उनकी रेल तक छूट जाती है.

रेलों में सुरक्षा व्यवस्था की हालत भी ख़स्ता ही है. महिलाओं की सुरक्षा का भी कोई ख़ास इंतज़ाम नहीं है. रेलों में आपराधिक घटनाएं होती रहती हैं.  कई मामलों में रेलवे कर्मी और आरपीएफ़ तक शामिल पाए गए हैं. किन्नर व अन्य मांगने वाले लोग भी मुसाफ़िरों को तंग करते देखे जा सकते हैं. पैसे न देने पर वे यात्रियों के साथ अभद्रता पर उतर आते हैं. इन लोगों पर रेलवे प्रशासन को कोई अंकुश नहीं है.

रेलवे में तत्काल टिकट का गोरखधंधा बदस्तूर जारी है. लोगों को शिकायत रहती है कि वे तत्काल टिकट लेने जाते हैं, तो दलालों के आगे उनकी एक नहीं चलती. लोगों को लाइन में लगने के बाद भी टिकट नहीं मिलता, जबकि दलाल काउंटर की बजाय सीधे बुकिंग क्लर्क के केबिन में जाकर टिकट बुक करा लेते हैं और बाद में इन्हें मुंह मांगे दाम पर बेचते हैं. कहने के लिए रेलवे ने सीसीटीवी कैमरे भी लगा रखे हैं, इसके बावजूद दलालों पर कोई शिकंजा नही कसा जाता. वेटिंग टिकट की समस्या से भी यात्री परेशान हैं. ऐसे में दलाल यात्रियों की मजबूरी का भरपूर फ़ायदा उठाते हैं.  दलाल पहले ही टिकट बुक करा लेते हैं, ऐसे में यात्रियों के हिस्से में आए टिकट वेटिंग लिस्ट में रहते हैं. टिकट कंफ़र्म कराने के लिए भी दलाल यात्रियों से अच्छे ख़ासे पैसे लेते हैं.

बर्थ के किराये को लेकर भी असमानता है. मसलन अगर कोई यात्री एसी 2 में सफ़र करता है, तो उसे साइड बर्थ मिल जाने पर भी वही किराया देना पड़ता है, जो इनर बर्थ के मुसाफ़िर देते हैं,  जबकि एसी 2 और एसी 3 दोनों की साइड बर्थ एक समान असुविधाजनक होती हैं. दोनों की ही साइड बर्थ का किराया एक सामान एसी 3 की तरह ही होना चाहिए.
इसके अलावा बुज़ुर्ग यात्रियों के लिए सुविधाजनक बर्थ होनी चाहिए. कंप्यूटरीकृत आरक्षण व्यवस्था में यह इंतज़ाम होना चाहिए कि 60 साल से ज़्यादा के सीनियर सिटिज़न को स्लीपर, एसी 1, 2, 3 सभी जगह लोअर बर्थ ही मिले. ऊपर की बर्थ में बुज़ुर्गों को काफ़ी दिक़्क़त होती है.

प्रीमियम तत्काल में रेलवे का टिकट हवाई जहाज़ से भी महंगा है. मसलन बीते सोमवार को भोपाल एक्सप्रेस से हबीबगंज से दिल्ली का एसी सेकेंड स्लास का किराया 4456  रुपये था, जबकि एयर इंडिया की फ़्लाइट का किराया 3679 रुपये था.
रेल यात्रियों को तीन से पांच गुना ज़्यादा किराया देना पड़ रहा है. जिस स्लीपर क्लास का साधारण किराया 265 रुपये लगता है, प्रीमियम तत्काल में उसके पांच गुना ज़्यादा यानी 1000 रुपये तक चुकाने पड़ सकते हैं. इसी तरह भोपाल एक्सप्रेस में 1500 का एसी टिकट 4500 रुपये में और पुष्पक एक्सप्रेस में 2300 का टिकट 7200 रुपये में यानी तीन गुना ज़्यादा दाम पर मिल रहा है. ग़ौरतलब है कि प्रीमियम तत्काल कोटा अक्टूबर 2014 में शुरू किया गया था. यह टिकट रेल का चार्ट बनने से पहले तक बुक कराया जा सकता है. यह टिकट सिर्फ़ ऑनलाइन ही बुक होता है. इसे रद्द करने पर पैसे नहीं मिलते. इसमें सामान्य तत्काल में स्लीपर किराये पर दूरी के हिसाब से 90 से 175 रुपये ज़्यादा देने पड़ते हैं. इसमें एसी 3 में साधारण किराये से 250 से 300 रुपये और एसी 2 में 300 से 400 रुपये ज़्यादा चुकाने पड़ते हैं. प्रीमियम तत्काल के दाम कम होती सीटों के हिसाब से बढ़ जाते हैं.

सरकार ने स्वच्छता का नारा देते हुए जनता पर कर के तौर पर आर्थिक बोझ डाल दिया है. इसके बाद भी रेलवे स्टेशनों और रेलों में गंदगी कम नहीं हुई. रेलवे स्टेशनों पर कूड़ेदान होने के बावजूद स्टेशनों पर यहां-वहां कूड़ा-कर्कट देखा जा सकता है. स्टेशनों पर पीने के पानी की भी व्यवस्था न के बराबर है.  कहीं पेयजल के प्याऊ बने हैं, तो उनका पानी पीने लायक़ नहीं होता. प्याऊ और उसके आसपास काफ़ी गंदगी होती है. लोग वहीं कुल्ला करते हैं, बर्तन धोते हैं. ऐसे में बोतल बंद पानी बेचने वाली कंपनियों को ख़ूब फ़ायदा होता है.
रेलवे की असली समस्याएं यही हैं, पर रेलमंत्री का इनकी तरफ़ ध्यान नहीं है. वे सिर्फ़ ऐसी घोषणाएं करते हैं, जिनसे उन्हें प्रचार मिले. दरअसल वे यात्रियों को सुविधाएं मुहैया कराने से ज़्यादा प्रचार पाने में यक़ीन करते हैं. किसी ने बच्चे के दूध के लिए उन्हें ट्वीट किया, तो उन्होंने चलती ट्रेन में दूध मुहैया करा दिया और वक़्ती वाहवाही लूट ली. क्या रेल मंत्री को मालूम नहीं कि यात्री हर रोज़ किन परेशानियों से जूझते हैं. यात्रियों को इन परेशानियों से निजात दिलाने के लिए उन्होंने क्या कार्रवाई की ? यह सही है कि बच्चों को दूध मिलना चाहिए. ट्वीट पर यात्रियों की समस्याओं का समाधान होना चाहिए. लेकिन सच यह भी है कि इससे पहले रेलगाड़ियों को वक़्त पर चलाया जाना चाहिए. उनमें साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था होनी चाहिए और रेलयात्रियों को सुरक्षा भी मिले. उनकी सीट पर कोई क़ब्ज़ा न कर पाए. सामान्य डिब्बों की संख्या भी बढ़े. मगर ऐसा कुछ नहीं होता, रेल बजट में घोषणाएं करने के बाद भी. रेलमंत्री सुरेश प्रभु वही काम करते हैं, जिससे उनकी तारीफ़ हो. इसलिए रेलवे की समस्याएं बढ़ती चली जा रही हैं.

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